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Sant Ki Seekh: जीवन में कब प्रशंसा परेशानी और आलोचना सफलता की सीढ़ी बन जाती है?

Appreciation and Criticism: जीवन में हर किसी को आलोचना बुरी और प्रशंसा हमेशा अच्छी लगती है. लोग हमारी तारीफ करें इसके लिए हम अक्सर तमाम तरह के कार्य करते हैं, लेकिन कई बार यही प्रशंसा आपकी कैसे नाकामी और आलोचना आपकी बड़ी सफलता का कारण बन जाती है, जानने के लिए पढ़ें ये लेख.

Sant Ki Seekh: जीवन में कब प्रशंसा परेशानी और आलोचना सफलता की सीढ़ी बन जाती है?
Sant Ki Seekh: जीवन में प्रशंसा और आलोचना का क्या महत्व है?
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Impact of appreciation and criticism: 'प्रशंसा में पिघलना मत और आलोचना में उबलना मत...जीवन में ये दो बातें कभी भूलना मत.' जाने-माने संत स्वामी श्री चिदम्बरानन्द सरस्वती जी महाराज की यह सूक्ति जीवन की संतुलित सोच को बहुत सरल और प्रभावी ढंग से समझाती है. इसका अर्थ है कि न तो प्रशंसा मिलने पर अहंकार में बह जाना चाहिए और न ही आलोचना होने पर क्रोध या निराशा से भर जाना चाहिए. जीवन में स्थिरता, विवेक और आत्म-संयम बनाए रखने के लिए इन दोनों से बचना आवश्यक है. आइए जानते हैं कि जीवन में किसी के द्वारा की जाने वाली तारीफ कब आपके लिए बड़े नुकसान और आलोचना बड़ी सफलता का कारण बनती है.

तब तारीफ विकास में बनती है बाधक

मनुष्य का स्वभाव है कि वह अपनी प्रशंसा को सुनकर खुश होता है. जब कोई हमारी तारीफ करता है तो हमें अच्छा लगता है और आत्मविश्वास बढ़ता है. लेकिन यदि हम प्रशंसा में 'पिघल' जाते हैं, यानी खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगते हैं, तो यह हमारे लिए हानिकारक हो सकता है. उदाहरण के लिए, मान लीजिए एक छात्र परीक्षा में अच्छे अंक लाता है. शिक्षक और माता-पिता उसकी खूब तारीफ करते हैं. यदि वह छात्र यह सोचने लगे कि अब उसे मेहनत करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह पहले से ही बहुत होशियार है, तो अगली परीक्षा में उसका प्रदर्शन गिर सकता है. यहां प्रशंसा में पिघलना उसके विकास में बाधा बन गया, इसलिए प्रशंसा को प्रेरणा की तरह लेना चाहिए, न कि अहंकार का कारण बनाना चाहिए.

ऐसी आलोचना अक्सर सफलता की सीढ़ी बनती है

आलोचना हमारे जीवन का दूसरा पक्ष है. कोई भी व्यक्ति हर काम में पूर्ण नहीं हो सकता. गलतियां होती हैं और लोग उन पर टिप्पणी भी करते हैं. यदि हम आलोचना में 'उबल' जाते हैं, यानी तुरंत क्रोधित हो जाते हैं या निराश हो जाते हैं, तो हम सीखने का अवसर खो देते हैं. उदाहरण के तौर पर, एक कर्मचारी ने कार्यालय में कोई काम ठीक से नहीं किया और उसके वरिष्ठ ने उसे सुधार के लिए टोका. यदि कर्मचारी गुस्से में आकर यह सोच ले कि सब उसके खिलाफ हैं या वह अपमानित हो गया है, तो उसका मन काम में नहीं लगेगा. लेकिन यदि वह शांत होकर आलोचना को समझे और अपनी गलती सुधारे, तो वही आलोचना उसके लिए सफलता की सीढ़ी बन सकती है.

दोनों के बीच संतुलन जरूरी है

जीवन में संतुलन बहुत आवश्यक है. प्रशंसा हमें आगे बढ़ने की ऊर्जा देती है और आलोचना हमें बेहतर बनने का रास्ता दिखाती है. जैसे एक सिक्के के दो पहलू होते हैं, वैसे ही ये दोनों अनुभव जीवन का हिस्सा हैं. जो व्यक्ति न प्रशंसा से अत्यधिक प्रभावित होता है और न आलोचना से विचलित, वही वास्तव में परिपक्व और समझदार कहलाता है.

भावनाओं पर रखें नियंत्रण

एक सरल घरेलू उदाहरण लें. मान लीजिए किसी गृहिणी ने नया व्यंजन बनाया. परिवार के सदस्य उसकी तारीफ करते हैं, लेकिन साथ ही यह भी कहते हैं कि नमक थोड़ा ज्यादा है. यदि वह केवल तारीफ सुनकर खुश हो जाए और कमी को अनदेखा कर दे, तो अगली बार भी वही गलती दोहराएगी और यदि वह कमी सुनकर नाराज हो जाए, तो दुबारा कुछ नया बनाने का मन ही नहीं करेगा.

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सही रास्ता यह है कि वह तारीफ से उत्साहित हो और आलोचना से सीख ले. इस तरह यह सूक्ति हमें सिखाती है कि जीवन में भावनाओं पर नियंत्रण रखना बहुत जरूरी है. प्रशंसा और आलोचना दोनों को समान रूप से स्वीकार कर, उनसे सीख लेना ही सच्ची बुद्धिमत्ता है. यही संतुलन हमें सफल, विनम्र और मजबूत बनाता है.

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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