What is samskara importance: मानव जीवन केवल भौतिक उपलब्धियों का नाम भर नहीं है, बल्कि उसका वास्तविक उद्देश्य आत्मिक, नैतिक और सामाजिक विकास में निहित है. इस सर्वांगीण विकास की आधारशिला संस्कार है. जीवन से जुड़े तमाम प्रकार के संस्कार वे सूक्ष्म मूल्य हैं, जो मनुष्य के विचार, व्यवहार और दृष्टिकोण को दिशा देने का काम करते हैं. जिनके जीवन में भक्ति, निस्वार्थ सेवा, सहजता, सत्संग, संत-संग और सत्साहित्य में रुचि जैसे उत्तम संस्कार होते हैं, उनका जीवन स्वयं तो प्रकाशमय होता ही है, साथ ही समाज के लिए भी आदर्श बन जाता है. आइए किसी भी मनुष्य में संस्कार के होने का क्या महत्व होत है, उसे जाने-माने संत स्वामी श्री चिदम्बरानन्द सरस्वती जी महाराज से विस्तार से समझते हैं.
क्यों जरूरी हैं संस्कार?
संस्कारों की उत्पत्ति केवल जन्म से नहीं होती, बल्कि वे परिवार, समाज, शिक्षा, संतों और शास्त्रों के संपर्क से विकसित होते हैं. बाल्यकाल में जो बीज बोए जाते हैं, वही आगे चलकर व्यक्तित्व का वृक्ष बनते हैं. यदि यह बीज भक्ति, सेवा और सत्य के हों, तो जीवन फलदायी बनता है; और यदि संस्कारों का अभाव हो, तो वही जीवन दिशाहीन होकर व्यर्थ के कार्यों करते हुए खत्म हो जाता है.
जब होता है सत्य के साथ संग
सत्संग और संत-संग का महत्व भारतीय संस्कृति में विशेष रूप से बताया गया है. सत्संग का अर्थ है-सत्य के साथ संग. जब मनुष्य श्रेष्ठ विचारों, उत्तम चरित्र वाले लोगों और संतों के संपर्क में आता है, तो उसके भीतर स्वतः ही शुभ परिवर्तन होने लगता है. संतों का जीवन स्वयं एक चलता-फिरता शास्त्र होता है. उनके अनुभव, वाणी और आचरण जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं. इसी प्रकार सत्साहित्य का अध्ययन मन को शुद्ध करता है, विवेक को जाग्रत करता है और जीवन के उद्देश्य को स्पष्ट करता है. सत्संग के महत्व को दर्शाती हुई गोस्वामी तुलसीदास जी की अत्यंत प्रसिद्ध चौपाई है -
'बिनु सतसंग विवेक न होई.
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥'
सत्संग के बिना मनुष्य में सही-गलत का विवेक उत्पन्न नहीं होता. और विवेक के बिना भगवान श्रीराम की कृपा सहज रूप से प्राप्त नहीं होती. इसलिए जीवन में संतों का संग और सत्संग अत्यंत आवश्यक है.
जब जुड़ता है भक्ति का संस्कार
भक्ति जीवन का वह संस्कार है जो मनुष्य को अहंकार से मुक्त कर ईश्वर से जोड़ता है. भक्ति से मन में विनम्रता, धैर्य और करुणा का विकास होता है. भक्ति-भाव से किया गया प्रत्येक कार्य सेवा बन जाता है और जीवन में आंतरिक शांति का संचार होता है. इसी से निस्वार्थ सेवा का संस्कार जन्म लेता है. सेवा वह गुण है जो व्यक्ति को 'मैं' से निकालकर 'हम' की भावना से जोड़ता है. निस्वार्थ सेवा करने वाला व्यक्ति समाज का बोझ नहीं, बल्कि उसका आधार बनता है.
'सेवा से ही मानव बने, सेवा से बढ़े मान,
निस्वार्थ भाव जो करे, पावे प्रभु पहचान.'
समाज में सकारात्मक ऊर्जा
सहजता भी एक महत्वपूर्ण संस्कार है. आज के प्रतिस्पर्धा भरे युग में मनुष्य बनावटीपन या फिर कहें दिखावे की ओर बढ़ रहा है, जिससे तनाव और असंतोष जन्म लेता है. सहज जीवन, सादगी और संतोष का मार्ग दिखाता है. सहज व्यक्ति कम में भी प्रसन्न रहना जानता है और यही प्रसन्नता समाज में सकारात्मक ऊर्जा फैलाती है.
सर्वांगीण विकास के लिए क्यों जरूरी संस्कार?
इसके विपरीत, संस्कारविहीन जीवन केवल स्वार्थ, भोग और तात्कालिक सुखों तक सीमित रह जाता है. ऐसा जीवन बाहर से चाहे कितना ही सफल क्यों न दिखे, भीतर से खोखला होता है. संस्कारों के अभाव में मनुष्य नैतिक पतन की ओर बढ़ता है, रिश्तों में कटुता आती है और समाज में असंतुलन पैदा होता है. इसलिए शास्त्रों में बार-बार चेतावनी दी गई है कि बिना संस्कार के ज्ञान और संपत्ति भी बोझ बन जाती है.
Sant Ki Seekh: क्या होता है ईश्वरीय विधान जो अक्सर हमारे कल्याण का कारण बनता है?
जीवन को संस्कारी बनाने के लिए संत और शास्त्रों का संग अत्यंत आवश्यक है. शास्त्र हमें शाश्वत सत्य से परिचित कराते हैं और संत उस सत्य को जीवन में उतारने की प्रेरणा देते हैं. जब शास्त्र और संत-दोनों का समन्वय होता है, तब जीवन वास्तव में सार्थक बनता है. अतः यह स्पष्ट है कि जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए संस्कार अनिवार्य हैं. भक्ति, निस्वार्थ सेवा, सहजता, सत्संग, संत-संग और सत्साहित्य के संस्कार मनुष्य को श्रेष्ठ नागरिक, आदर्श मानव और समाज का पथप्रदर्शक बनाते हैं. संस्कारयुक्त जीवन ही सच्चे अर्थों में सफल और सार्थक जीवन है.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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