पितृ पक्ष में पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है. श्राद्ध कर्म के दौरान भोजन का एक हिस्सा कौए को भी खिलाया जाता है. धार्मिक मान्यता में कौए को पितरों का प्रतीक माना गया है. लेकिन आज शहरों में कई जगह कौए आसानी से दिखाई नहीं देते. ऐसे में अगर श्राद्ध के दिन कौआ भोजन खाने न आए तो क्या करना चाहिए. आचार्य मदनमोहन ने बताया कि ऐसी स्थिति में पंचबलि की परंपरा के तहत दूसरे जीवों को भोजन कराया जा सकता है.
पितरों से जुड़ा माना जाता है कौआ
आचार्य मदनमोहन ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं में कौए को पितृ-दूत और यम से जुड़ा प्रतीक माना गया है. इसी वजह से श्राद्ध के भोजन में कौए को हिस्सा देने की परंपरा रही है. मान्यता है कि कौए के माध्यम से दिया गया भोजन पितरों तक पहुंचता है. हालांकि, यह धार्मिक आस्था और परंपरा का विषय है.
कौआ न आए तो क्या करें
अगर श्राद्ध के दिन कौआ दिखाई न दे या भोजन खाने न आए तो परेशान होने की जरूरत नहीं है. आचार्य मदनमोहन ने बताया कि कौए के नाम से रखा गया भोग गाय या कुत्ते को खिलाया जा सकता है. धार्मिक परंपरा में गाय, कुत्ते, कौए, चींटी और देवताओं को भोजन अर्पित करने की बाात कही गई है. इसे पंचबलि भोग कहा जाता है.
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पंचबलि भोग का क्या है महत्व
श्राद्ध कर्म में पितरों के निमित्त भोजन अर्पित करने के साथ जीव-जंतुओं को भी अन्न देने की परंपरा बताई गई है. श्राद्ध की सामान्य विधियों में पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोजन के साथ कौओं को भोजन कराने का भी उल्लेख मिलता है. इसका उद्देश्य अन्न का दाान और सभी जीवों के प्रति सम्मान की भावनाा से भी जोड़ा जाता है. इसलिए कौआ न मिलने पर गाय, कुत्ते या चींटियों को भोजन देना परंपरा के अनुसार एक विकल्प माना जाता है.
कौए को भोजन कराने से जुड़ी कथा
आचार्य मदनमोहन ने बताया कि एक धार्मिक कथा में बताया जाता है कि त्रेतायुग में इंद्र के पुत्र जयंत ने कौए का रूप धारण कर माता सीता को चोंच मारी थी. भगवान श्रीराम ने उसे दंड दियाा. बाद में क्षमा मांगने पर कौए को वरदान मिलने की कथा कही जाती है. इसी मान्यता के आधार पर कौए को पितरों से जोड़कर देखा जाताा है.
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