कोरोना के कठिन काल में गुरु की मदद से धर्म और पुरुषार्थ के मार्ग को प्रज्वलित रखें : स्वामी निरंजानंद

स्वामी निरंजानंद सरस्वती ने कहा कि कोरोना के इस कठिन दौर में जरूरी है कि आस्था और विश्वास की डोर थामे रखें. धर्म और पुरुषार्थ की राह को प्रज्वलित करें. कठिन परिस्थिति में स्वयं को मजबूत बनाए रखने का ये सर्वश्रेष्ठ उपाय है.

कोरोना के कठिन काल में गुरु की मदद से धर्म और पुरुषार्थ के मार्ग को प्रज्वलित रखें : स्वामी निरंजानंद

मुंगेर, बिहार के विश्व योग पीठ गंगा दर्शन के स्वामी निरंजानंद सरस्वती एक कार्यक्रम में लोगों को संबोधि‍त करते हुए.

नई दिल्‍ली :

पिछले दो सालों से कोरोना महामारी के रूप में संपूर्ण मानवता एक त्रासदी झेल रही है. इन दो सालों में ऐसा लगता है कि किसी ने हम सभी की जिंदगी में पॉज (Pause) का बटन दबा दिया है और सबकी जिंदगी थम सी गई है. ऐसी स्थिति में हमारी जिंदगी में आशावादिता कम हुई है और निराशावाद अब आशावाद पर हावी होता दिखाई दे रहा है. सबसे बड़ा सवाल है कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाए? इस प्रश्न का उत्तर मुंगेर, बिहार के विश्व योग पीठ गंगा दर्शन के स्वामी निरंजानंद सरस्वती ने बहुत आसान शब्दों में दिया है. गुरू पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में स्वामीजी ने अपने उद्बोधन में ऐसे सभी सवालों के तर्कसंगत उत्तर दिए.

हर मनुष्य अपनी सामजिक जिम्मेदारी समझे

स्वामी जी ने कहा कि सबसे पहले तो हर मनुष्य को अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझनी चाहिए और उसका पालन करना चाहिए. सभी लोग सोशल और फिजिकल डिस्टेंसिंग का पालन करें. अपने आस-पास स्वच्छता यानि हाइजीन का ख्याल रखें. मास्क पहनें और वैक्सीनेशन करवाएं. ये केवल खुद को सुरक्षित करने के लिए नहीं है, बल्कि हमारे परिवार, समाज और देश की सुरक्षा के लिए है.


स्वयं को शारीरिक व मानसिक तौर पर मजबूत बनाएं

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इस दौरान स्वामीजी ने ये भी कहा कि हर शख्स को अपनी सेहत की देखभाल स्वयं पूरी गंभीरता से करनी चाहिए. आमतौर पर लोग इस संबंध में लापरवाह हो जाते हैं और खुद को ऐसी स्थिति में ले आते हैं कि उन्हें इलाज के लिए अस्पतालों और डॉक्टरों के चक्कर काटने पड़ते हैं. आखिर ऐसी स्थिति आने ही क्यों दी जाए. बेहतर होगा कि ऐसी स्थिति आने ही न दी जाए और स्वयं को शारीरिक और मानसिक रूप से आने वाली स्थिति के लिए तैयार रखा जाए. अपने मानसिक और भावनात्मक एक्सप्रेशन के संतुलन का ध्यान रखें. आस्था और विश्वास की डोर थामे रखें. धर्म और पुरुषार्थ की राह को प्रज्वलित करें. कठिन परिस्थिति में स्वयं को मजबूत बनाए रखने का ये सर्वश्रेष्ठ उपाय है.