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Mahabharat Mystery: आखिर अश्वत्थामा के माथे की दिव्य मणि में क्या था रहस्य? जिसे श्रीकृष्ण ने भी निकलवा दिया

Mahabharata: महाभारत में अश्वत्थामा के मस्तक पर मौजूद दिव्य मणि को अद्भुत शक्तियों का स्रोत माना गया है. जानिए ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पांडेय से इसका रहस्य और श्रीकृष्ण ने इसे क्यों निकलवाया.

Mahabharat Mystery: आखिर अश्वत्थामा के माथे की दिव्य मणि में क्या था रहस्य? जिसे श्रीकृष्ण ने भी निकलवा दिया
अश्वत्थामा को मणि बनाती थी अजेय योद्धा
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महाभारत केवल एक युद्ध की कहानी नहीं, बल्कि ऐसे अनगिनत रहस्यों का ग्रंथ भी है जिन पर आज भी चर्चा होती है. इन्हीं रहस्यमयी पात्रों में एक नाम है गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का. मान्यता है कि उनके मस्तक पर जन्म से ही एक दिव्य मणि थी, जिसने उन्हें साधारण मनुष्य से अलग और लगभग अजेय बना दिया था. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर उस मणि में ऐसी कौन-सी शक्ति थी और भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के बाद उसे क्यों निकलवा दिया. ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पांडेय से आइए जानते है इस रहस्य के बारे में...

जन्म से ही मिली थी दिव्य शक्ति

ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पांडेय के अनुसार, अश्वत्थामा भगवान शिव के अंश माने जाते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उनके मस्तक पर जन्म से ही एक दिव्य मणि थी. कहा जाता है कि यह मणि उन्हें असाधारण शक्ति और अलौकिक सुरक्षा प्रदान करती थी.

मणि बनाती थी अजेय योद्धा

ऐसी मान्यता है कि इस दिव्य मणि के प्रभाव से अश्वत्थामा को दैत्य, दानव और किसी भी अस्त्र-शस्त्र से भय नहीं था. यही नहीं, उन्हें भूख, प्यास, थकान और बुढ़ापे का प्रभाव भी नहीं होता था. इस कारण उन्हें महाभारत का सबसे शक्तिशाली और लगभग अजेय योद्धा माना जाता था.

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आखिर श्रीकृष्ण ने क्यों निकलवाई मणि?

पंडित कौशल पांडेय बताते हैं कि महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद अश्वत्थामा ने क्रोध और प्रतिशोध में आकर रात के समय सोते हुए द्रौपदी के पांच पुत्रों का वध कर दिया. इस अधर्म से भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत क्रोधित हुए. दंड स्वरूप उन्होंने अश्वत्थामा के मस्तक से दिव्य मणि निकलवा दी और उन्हें लंबे समय तक पृथ्वी पर कष्ट झेलते हुए भटकने का श्राप दिया.

क्या सीख देती है यह कथा

ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पांडेय के अनुसार, यह प्रसंग बताता है कि चाहे किसी के पास कितनी भी दिव्य शक्ति या वरदान क्यों न हो, यदि उसका उपयोग अधर्म और निर्दोषों के विरुद्ध किया जाए तो उसका अंत निश्चित होता है. धर्म, संयम और सदाचार ही मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति माने गए हैं.

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