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Sant Ki Seekh: कर्म और फल के बीच का सेतु है प्रतीक्षा, जानें यह कब बन जाती है वरदान

जीवन में प्रतीक्षा करने का अर्थ सिर्फ समय बिताना या फिर रुकना नहीं होता है, बल्कि यह तो आपके कर्म और फल का सेतु है. धैर्य और विश्वास के साथ की गई प्रतीक्षा किस तरह आपके लिए वरदान बन जाती है, विस्तार से बता रहे हैं महामंडलेश्वर स्वामी श्री चिदंबरानंद सरस्वती जी महाराज.

Sant Ki Seekh: कर्म और फल के बीच का सेतु है प्रतीक्षा, जानें यह कब बन जाती है वरदान
Importance of waiting: इंतजार कब बन जाता है वरदान?
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When waiting time become boon: जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता, शांति और सार्थकता के लिए उचित समय की प्रतीक्षा अत्यंत आवश्यक है. चाहे वह भक्ति का मार्ग हो या सामाजिक जीवन का संघर्ष, बिना धैर्य और प्रतीक्षा के न तो ईश्वर की कृपा पूर्ण रूप से प्राप्त होती है और न ही प्रार्थनाएँ फलित होती हैं. भारतीय संस्कृति और धार्मिक ग्रंथों में इस सत्य को अनेक उदाहरणों के माध्यम से समझाया गया है. इन्हीं में से एक अत्यंत प्रेरणादायक कथा है - शबरी का जीवन, जो प्रतीक्षा, धैर्य, श्रद्धा और अटूट विश्वास का प्रतीक है.

गुरु वचन पर कायम रही निष्ठा

शबरी एक साधारण, वनवासी स्त्री थीं. सामाजिक दृष्टि से वे न तो उच्च कुल की थीं और न ही विद्वान, किंतु उनके हृदय में प्रभु श्रीराम के प्रति अनन्य भक्ति थी. उन्होंने अपने गुरु मतंग ऋषि की सेवा पूरी निष्ठा से की. मतंग ऋषि ने अपने अंतिम समय में शबरी से कहा था कि एक दिन स्वयं भगवान राम उनके आश्रम में पधारेंगे और उन्हें दर्शन देकर कृतार्थ करेंगे. यह वचन शबरी के जीवन का आधार बन गया.

प्रतीक्षा में श्रद्धा और धैर्य जरूरी है 

इसके बाद शबरी का पूरा जीवन प्रतीक्षा में बीता. वर्षों बीत गए, ऋतुएँ बदलती रहीं, शरीर वृद्ध होता गया, किंतु शबरी की श्रद्धा और धैर्य में कोई कमी नहीं आई. वे प्रतिदिन आश्रम की सफाई करतीं, मार्ग बुहारतीं और यह सोचकर प्रसन्न होतीं कि आज नहीं तो कल प्रभु अवश्य आएँगे. यह प्रतीक्षा किसी अधीरता से भरी नहीं थी, बल्कि पूर्ण विश्वास और समर्पण से युक्त थी.

तब सब्र का फल बन गया अमृत

जब भगवान श्रीराम वनवास के दौरान शबरी के आश्रम पहुँचे, तब शबरी का जीवन सार्थक हो गया. उन्होंने प्रभु का स्वागत प्रेमपूर्वक किया और उन्हें बेर अर्पित किए. कथा के अनुसार, शबरी ने पहले स्वयं बेर चखकर देखे कि वे मीठे हैं या नहीं, ताकि प्रभु को कड़वे फल न मिलें. बाह्य दृष्टि से यह आचरण साधारण या अनुचित लग सकता है, किंतु श्रीराम ने इसे शुद्ध प्रेम और भक्ति का सर्वोच्च उदाहरण माना और प्रेमपूर्वक उन बेरों को स्वीकार किया.यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर की कृपा समय से पहले नहीं मिलती, बल्कि तब मिलती है जब साधक पूर्ण रूप से तैयार होता है. शबरी की भक्ति में कोई दिखावा नहीं था, केवल निरंतर प्रतीक्षा, सेवा और विश्वास था. इसी कारण उनकी प्रार्थना सफल हुई.

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हमेशा बनाए रखें विश्वास

सामाजिक जीवन में भी यही सिद्धांत लागू होता है. शिक्षा, करियर, संबंध या किसी लक्ष्य की प्राप्ति - हर क्षेत्र में अधीरता हमें गलत निर्णयों की ओर ले जाती है. जो व्यक्ति धैर्यपूर्वक सही समय की प्रतीक्षा करता है, वही स्थायी सफलता प्राप्त करता है. जैसे शबरी ने वर्षों तक बिना शिकायत किए प्रतीक्षा की, वैसे ही हमें भी कठिन परिस्थितियों में विश्वास बनाए रखना चाहिए. अंततः शबरी का जीवन यह संदेश देता है कि प्रतीक्षा कमजोरी नहीं, बल्कि आस्था की शक्ति है. जब प्रतीक्षा भक्ति, कर्म और विश्वास से जुड़ी होती है, तब ईश्वर की कृपा निश्चित रूप से प्राप्त होती है और जीवन धन्य हो जाता है.

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