Interesting story of Lord Hanuman: सनातन परंपरा में भगवान शिव के अंशावतार (रुद्रावतार) हनुमान जी को शक्ति, भक्ति, बुद्धि और विद्या का अतुलित धाम माना जाता है. असीम शक्ति के सागर हनुमान जी अष्ट सिद्धि और नवनिधि के दाता हैं, जो समुद्र लांघने और पर्वत उठाने जैसे कार्य चुटकी बजाकर करने में समर्थ हैं. हिंदू मान्यता के अनुसार हनुमान जी के पास तमाम शक्तियों के साथ अपने स्वामी प्रभु श्री राम की भक्ति सबसे बड़ा बल है, जिसकी मदद से वे असंभव से असंभव कार्य को सरलता से करके दिखा देते हैं.
सबसे खास बात ये कि वे इतने विनम्र हैं कि हर छोटे से छोटे कार्य का श्रेय अपने स्वामी प्रभु श्री राम को देते हैं. तमाम गुणों की खान कहलाने वाले हनुमान जी द्वारा महाबली भीम के अभिमान को दूर करने की कथा तो आपने सुनी होगी, लेकिन आज हम आपको एक ऐसी कथा बताने जा रहे हैं, जिसमें बजरंगी ने एक दिन में एक नहीं, दो नहीं बल्कि तीन लोगों का एक साथ घमंड तोड़ दिया था. आइए बजरंगी की इस रोचक कथा को विस्तार से जानते हैं.
जब सत्यभामा, सुदर्शन और गरुण को हुआ अभिमान

Photo Credit: AI Generated Image @ gemini
द्वारपयुग में एक बार भगवान श्री कृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ राजमहल के सिंहासन पर विराजमान थे. अचानक से उनकी पत्नी सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से पूछा कि, प्रभु त्रेतायुग में जब आपने राम अवतार लिया तो आपकी धर्मपत्नी सीता जी थीं. क्या वे मुझसे ज्यादा सुंदर थीं? इससे पहले कि श्रीकृष्ण कुछ कह पाते, उतने में गरुण देवता बोल उठे, प्रभु क्या इस संसार में मुझसे भी ज्यादा किसी की गति है? इन बातों को सुनकर सुदर्शन चक्र से भी न रहा गया और वे भी अभिमान में बोल उठे कि — हे प्रभु मैंने आपको कई युद्ध में विजयश्री दिलाई है, क्या कोई मेरी भी काट है इस दुनिया में?
तब कृष्ण ने चली ये बड़ी चाल

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तीनों की बात सुनकर श्रीकृष्ण को अहसास हो गया कि इनके भीतर अभिमान आ गया है. फिर भगवान श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए गरुण से कहा कि तुम उत्तर दिशा की ओर हिमालय पर्वत पर जाओ. वहां गंधमादन पर्वत पर हनुमान जी साधना कर रहे होंगे. तुम वहां पर जाकर उन्हें संदेश दो कि उन्हें मैंने बुलाया है. इसके बाद उन्होंने सुदर्शन चक्र को आदेश दिया कि मेरी आज्ञा के बगैर कोई महल में प्रवेश न कर सके. सुदर्शन चक्र महल के बाहर पहरा देने लगे. इसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने महारानी सत्यभामा को सीता का स्वरूप बनाकर आने को कहा और वे स्वयं भगवान राम का स्वरूप बनाकर बैठ गये.
अनजाने में गरुण ने हनुमान जी से कही ये बात

भगवान श्री कृष्ण की आज्ञा पाकर गरुण देवता उड़ते हुए हिमालय पर उस स्थान पर पहुंचे जहां हनुमान जी ध्यान लगाए हुए भगवान श्री राम के नाम का मंत्र जप कर रहे थे. गरुण देवता ने हनुमान जी को प्रणाम करके कहा हे कपिराज आपको प्रभु श्रीराम ने मिलने के लिए बुलाया है. तब हनुमान जी ने गरुण देवता से कहा कि मैं प्रभु के नाम का जप कर रहा हूं. आप चलिए मैं इसे समाप्त करके आता हूं. तब गरुण देवता ने वृद्ध हनुमान जी के स्वरूप को देखते हुए कहा. हे रामदूत हनुमान आप काफी वृद्ध हो गये हैं और हिमालय से द्वारका नगरी काफी दूर है. आइए मैं आपको अपनी पीठ पर बिठाकर ले चलता हूं. हनुमान जी ने विनम्रता से उनकी मदद के लिए आभार प्रकट किया और एक बार फिर अपने आराध्य का नाम जप करने के लगे. इसके बाद गरुण देवता अपनी पूरी गति से वापस द्वारका को लौट पड़े.
तब गरुण को समझ आया बजरंगी का बल

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गरुण देवता जब द्वारका पहुंचे तो उन्हें द्वार पर सुदर्शन चक्र के मौजूद नहीं रहने पर आश्चर्य हुआ. जब वे महल के भीतर पहुंचे तो उनके आश्चर्य का तो ठिकाना ही नहीं रहा क्योंकि वहां पर हनुमान जी उनसे पहले पहुंच गये थे. उनके मन में सिर्फ एक ही सवाल था कि मैं तो पूर्ण गति से आ रहा हूं, फिर वृद्ध हनुमान मुझसे पहले कैसे द्वारका पहुंच गये? बजरंगी के बल और तेज का दर्शन करने के बाद गरुण देवता को अपनी गलती का अहसास हो गया था.
कुछ ऐसे टूटा सत्यभामा और सुदर्शन का घमंड
तभी भगवान श्रीकृष्ण ने हनुमान जी से पूछा कि हनुमान तुम महल के भीतर कैसे आए? तुम्हें किसी ने रोका नहीं. तब हनुमान जी ने अपने मुंह के भीतर से सुदर्शन चक्र को बाहर निकालते हुए कहा स्वामी माफ करें आपके दर्शन में यह चक्र बाधक बन रहा था, इसलिए मैंने इसे अपने दांतोंं में दबा लिया था.
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गरुण और सुदर्शन चक्र के बाद अब महारानी सत्यभामा की बारी थी, जो कि उस समय सीता जी के स्वरूप में श्रीकृष्ण के साथ सिंहासन पर बैठी थीं. हनुमान जी ने उनकी ओर संकेत करते हुए श्री कृष्ण से पूछा कि प्रभु माता सीता कहां हैं और ये स्त्री कौन हैं जो उनके स्थान पर आपके साथ विराजमान हैं. हनुमान जी के इस वचन ने महारानी सत्यभामा के कृष्ण के सबसे प्रिय होने और माता सीता से अधिक सुंदर होने का अभिमान एक पल में दूर कर दिया.
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