Dilli Gao Jai Hanuman: भारत के सबसे बड़े कन्वेंशन सेंटर, यशोभूमि में उस समय एक ही अलग ही आध्यात्मिक चेतना देखने को मिली जब वहां पर बच्चे, बुजुर्ग और नौजवान सभी ने एक साथ इकट्ठे होकर एक स्वर में हनुमान चालीसा का दिव्य पाठ किया. यशोभूमि के ब्रह्मकमल हॉल में जिस पल हनुमान जी का गुणगान करने वाली चालीसा के स्वर लयबद्ध तरीके से गूंजे तो पूरा हॉल भक्तिमय हो गया. देश की राजधानी दिल्ली में हनुमान चालीसा का यह सामूहिक पाठ चिन्मय मिशन के 75 साल पूरे होने पर उस कालजयी संदेश को पहुंचाने के लिए किया गया था, जिसे कभी संस्था के प्रमुख स्वामी चिन्मयानंद जी ने देश-दुनिया को दिया था.
किसने और क्यों कराया चालीसा का पाठ?
चिन्मय मिशन के 75 वर्ष पूरे होने पर इन दिनों 'चिन्मय अमृत महोत्सव 2026' मनाया जा रहा है. जिसके लिए देश की राजधानी दिल्ली में 'दिल्ली गाओ जय हनुमान' का आयोजन किया गया. यह दिव्य कार्यक्रम चिन्मय मिशन की भक्ति, सेवा और सामूहिक साधना की एक जीवंत अभिव्यक्ति थी. जिसमें 5000 से अधिक लोगों ने एकत्रित होकर 11 विशिष्ट संगीत धुनों के जरिए 14 बार गाया गया. हनुमान चालीसा पाठ के गान का नेतृत्व ब्रह्मचारी सोहम चैतन्य ने किया, जिसमें श्रीयांश मणि और उनके दल ने संगीत दिया. हनुमान चालीसा के कार्यक्रम में सैकड़ों की संख्या में बच्चों ने भी चालीसा के गान की विशेष प्रस्तुति दी.

कौन थे स्वामी चिन्मयानंद?
पत्रकार से सन्यासी बने स्वामी चिन्मयानंद का जन्म केरल के एक हिंदू परिवार में हुआ था. उनका वास्तविक नाम बालकृष्ण मेनन था, जिन्होंने सन्यास लेने के बाद न सिर्फ देश बल्कि पूरे विश्व में वेदांत दर्शन को पहुंचाने का अभूतपूर्व काम किया थाऋ उन्होंने लोगों को अपने प्रवचन के माध्यम से समझाया कि वेद आदि तमाम धार्मिक ग्रंथ सिर्फ साधु-संतों के लिए नहीं हैं, बल्कि ये जीवन में प्रत्येक व्यक्ति को सही दिशा दिखाते हुए सफलता का मार्ग प्रशस्त करते हैं. स्वामी चिन्मयानंद ने चिन्मय मिशन को स्थापित करके गीता-ज्ञान-यज्ञ के जरिए दुनिया भर के लोगों को बहुत सरल तरीके से सनातन परंपरा का मर्म समझाया.
भगवान राम के अनन्य भक्त और सेवक कहलाने वाले बजरंगी के इस कार्यक्रम को किसी तीर्थ स्थल पर कराने की बजाय देश की राजधानी में क्यों कराया गया? हनुमान जी को समर्पित इस भक्तिमय कार्यक्रम के पीछे क्या उद्देश्य था? ऐसे ही तमाम सवालों को जानने के लिए एनडीटीवी ने चिन्मय मिशन के ग्लोबल अध्यक्ष स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से विस्तार से बातचीत की :

सनातन परंपरा के 33 कोटि देवता में से हनुमान जी को ही आपने क्यों चुना?
देखिए, भगवान एक ही हैं, लेकिन मेरा मानना है कि उनके तमाम स्वरूपों में सबसे ज्यादा प्रेरणा देने वाले हनुमान जी हैं. गोस्वामी तुलसीदास जी ने हनुमान जी की अलौकिक शक्ति, उनके प्रभाव और सबसे ज्यादा उनकी भक्ति और सेवा के बारे में जो कहा है, अगर उसे हम अपने जीवन में उतारें और प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य हनुमान जी जैसा हो तो सिर्फ हमारा ही नहीं बल्कि हमारे देश और इस पूरे जग का उद्धार हो जाएगा.
हनुमान जी के वो कौन से गुण हैं जो आपकी प्रेरणा बने?
हनुमान चालीसा में एक अलौकिक शक्ति, प्रेरणा, सफलता का रहस्य और भक्ति समाहित है. यदि हम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं तो निश्चित रूप से हम अपने जीवन को हनुमान जी जैसा विशाल बना सकते हैं. उसके बाद एक ऐसी स्थिति आ सकती है कि भगवान राम जिस तरह अपने भाई भरत गले लगाते हैं, कुछ वैसे ही आपको गले लगा सकते हैं. हनुमान चालीसा की चौपाई में भी इसका जिक्र आता है कि रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई.
हनुमान चालीसा से बच्चों को विशेष रूप से जोड़ने के पीछे क्या उद्देश्य है?
पूज्य गुरुदेव स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज, जिन्होंने देश और संस्कृति के लिए अपना पूरा जीवन न्योछावर किया. उन्होंने लोगों को समझाया कि अगर हमारे बच्चों को सही उम्र में सही संस्कार नहीं मिलेंगे तो वह भटक सकते हैं. वर्तमान में आप खुद ही देख सकते हैं कि दुनिया भर में क्या हो रहा है. बच्चों में से संस्कार के निकल जाने का ही कारण है कि आज की युवा पीढ़ी में डिप्रेशन, ऐडिक्शन, जैसी चीजें देखने को मिल रही हैं. जब तक हमारे जीवन में संस्कृति, संस्कार, हृदय में प्रेम भावना और करुणा नहीं रहेगी तो आखिर कैसे हमारा मन शक्तिशाली होगा. हम कैसे अपने मन की मदद से जीवन में कोई बड़ा कार्य करके दिखाएंगे.
हनुमान चालीसा का यह कार्यक्रम दिल्ली तक ही सीमित रहेगा या फिर इसे देश के दूसरे हिस्से में भी करेंगे?
पूरे देश, दुनिया और गांव में जहां हम पहुंच सकते हैं, बच्चों के बाल विहार क्लासेस लिए करेंगे. हमारे जितने भी विद्यालय और विश्वविद्यालय हैं, उनमें अपने भारतीय विज्ञान और ज्ञान को पहुंचाएंगे. हमारे गुरुदेव ने कहा था कि हमारे बच्चे यूजलेस नहीं हैं बल्कि हकीकत यह है कि उनका यूज लेस हुआ है. उन्हें जीवन में अवसर कम दिया गया है. आज हमारे न जाने कितने बच्चे हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं. लाखों बच्चे भगवद्गीता का हर साल एक-एक अध्याय पढ़ते हैं. हमारी सबसे यही प्रार्थना है कि अगर हर भारतीय हनुमान चालीसा और गीता के पांच श्लोक, जिसे हम गीतापंचामृत कहते हैं, इसे याद करके आगे लोगों तक फैलाने का काम करें तो और लोगों को यह मालूम चलेगा कि किस तरह भगवद्गगीता जीवन को सफल बनाने में मददगार साबित होती है.

अमूमन हनुमान चालीसा, कथा, प्रवचन के लिए लोग धार्मिक स्थान का चुनाव करते हैं लेकिन क्या कारण है कि आप मेट्रो सिटी और गांव आदि में जाने की बात कर रहे हैं.
हमारे जितने भी महान संत थे - वेदव्यास, शंकराचार्य, गुरुनानक जी, स्वामी विवेकानंद, स्वामी चिन्मयानंद आदि ने एक जगह बैठकर नहीं बल्कि लोगों के पास उनके घर-घर में जाकर अनमोल ज्ञान को बांटा है. यही कारण है कि चिन्मय मिशन अपने 75वें साल के अमृत उत्सव के माध्यम से यह प्रयास कर रहा है कि घर-घर में गीता का ज्ञान हो और उसका लाभ उठाकर हम देखें कि कैसे हमारा जीवन सुखमय होता है.
चिन्मय मिशन ने 75 साल में क्या पाया है और अब आगे उसकी क्या योजना है?
पूज्य गुरुदेव ने अपने जीवन में करोड़ों लोगों को भगवद् गीता का ज्ञान दिया और देश सेवा के लिए प्रेरित किया. कई ऐसे भारतीय हैं, जो विदेश में हैं और कितने ऐसे विदेशी हैं, जिनका हृदय भारत में हैं. उन तक जाकर उन्होंने वेदांत का ज्ञान पहुंचाकर यह प्रेरणा दी कि आगे की पीढ़ियों को यह अमृत ज्ञान मिलता रहे. ऐसे में बीते वषों में लाखों-करोड़ों लोगों कने हमारे प्राचीन शास्त्रों का अध्ययन किया है. ऐसा नहीं है कि किसी ने कुछ कहा और उन लोगों ने मान लिया, जैसा कि आज कर एक मिनट की रील के जरिए लोग करने की कोशिश करते हैं. स्वामी चिन्मयानंद जी ने खुद को समझने और स्वध्याय यानि अपने ग्रंथों को समझना और उसे अपने जीवन में उतारना और देखना कि यह जीवन कितना सुंदर है.
धर्म को सुनने, जानने और अपनाने को लेकर देश और विदेश में अंतर क्या पाते है?
हमारे गुरु स्वामी चिन्मयानंद ने किसी बदलाव के लिए इंतजार में विश्वास नहीं करते थे, बल्कि करके दिखाते थे.
प्रेरणा देना और लोगों को स्पष्टता के साथ समझाना यह हमारा कार्य है. हमारा तो यही विश्वास है कि प्रत्येक मनुष्य में एक दिव्यता है. बस हमें उसकी दिव्यता को जागृत करना है. इसलिए देश हो या विदेश, भारतीय हो या फिर विदेशी, उसे थोड़ा सा भी यह वेदांत पर आधिरित ज्ञान मिलता है तो उसमें प्रेरणा तो जाग ही जाती है. यह बात है कि भारत में इसे थोड़ा हल्के में लिया जाता है, यहां लोगों को लगता है कि यह तो हमारा ही है, हम इसे कभी भी प्राप्त कर लेंगे, लेकिन इसी ज्ञान को विदेश में रहने वाले लोग ज्यादा अहमियत देते हैं. वे ज्ञान धन को बहुत ज्यादा महत्व देते हैं. स्थिति कुछ ऐसी है कि जैसे विदेश का सामान हमें बहुत अच्छा लगता है, उसी प्रकार हमारा ज्ञान भी उन्हें बहुत अच्छा लगता है.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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