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Sant Ki Seekh: आध्यात्मिकता और भौतिकवाद एक ही सिक्के के दो पक्ष हैं

Bhautik Aur Adhyatmik: अध्यात्म और भौतिकवाद जीवन के दो ऐसे विपरीत दृष्टिकोण हैं, जिसमें एक का संबंध आत्मा से तो दूसरे का इंद्रिय सुख से है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इनके बीच कोई संतुलन बनाया जा सकता है? क्या इन दोनों का लक्ष्य एक हो सकता है? विस्तार से बता रहे हैं जाने-माने आध्यात्मिक गुरु, योगी, लेखक और विचारक सद्गुरु.

Sant Ki Seekh: आध्यात्मिकता और भौतिकवाद एक ही सिक्के के दो पक्ष हैं
Spirituality and materialism: भौतिकता और अध्यात्म के बीच संतुलना कैसे बनाएं?
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How to balance spiritual and material life: मनुष्य निरंतर अपनी वर्तमान स्थिति से कुछ अधिक होने की लालसा करता है. यदि वह केवल धन से परिचित है, तो वह थोड़े और धन का विचार करता है; यदि वह सत्ता जानता है, तो थोड़ी और सत्ता; यदि वह प्रेम जानता है, तो और अधिक प्रेम. उसके भीतर कुछ ऐसा है जो उसे अपनी वर्तमान स्थिति में स्थिर नहीं होने देता. आप जिस भी तरीके को सबसे अच्छा जानते हैं, उसी से स्वयं का थोड़ा अधिक विस्तार करने का प्रयास कर रहे हैं. किंतु यदि आप अपनी जागरूकता का प्रयोग करके इसे देखें, तो आप स्पष्ट रूप से देखेंगे कि आप धन, संपत्ति, प्रेम या सुख नहीं चाह रहे हैं; आप जो चाह रहे हैं वह 'विस्तार' है. 

जीवन का कैसा विस्तार तलाश रहे हैं?

अब कितना विस्तार आपको पूर्णतः संतुष्ट कर पाएगा? यदि आप इस पर विचार करें, तो देख सकते हैं कि आप 'अनंत' विस्तार को तलाश रहे हैं. निश्चित रूप से, यह रुककर उस पर गौर करने का समय है जो हमें पागल बना रहा है, पूरे समय विस्तार करने, अधिक जमा करने, और ज्यादा कार्य करने को प्रेरित कर रहा है, क्योंकि हम वास्तव में 'चीजों' के पीछे नहीं हैं. आपके भीतर कुछ ऐसा है जिसे सीमाएं स्वीकार्य नहीं हैं, जो एक असीम अनुभव की खोज में है.

जब आप करते हैं 'अनंत' की खोज

यह शानदार है कि आप 'अनंत' की खोज कर रहे हैं, किंतु समस्या यह है कि आप इसे किस्तों में चाह रहे हैं. यदि आप किश्तों में आगे बढ़ेंगे, तो पूरे जीवन से गुजरने के बाद, आपको एहसास होगा कि आप अभी भी अतृप्त हैं. आप 1, 2, 3 गिनते हुए कभी अनंत तक नहीं पहुँच सकते; यह केवल एक अंतहीन गणना बनकर रह जाएगी. जब तक आप सही साधन का उपयोग नहीं करेंगे, तब तक ऐसा नहीं होगा. तो यदि आप भौतिक माध्यम से असीम होने का प्रयास कर रहे हैं, तो यह बस एक अंतहीन प्रक्रिया बन जाएगी. भौतिकता की परिभाषा ही 'सीमाओं' द्वारा निर्धारित होती है. यदि आप किसी असीम चीज की खोज कर रहे हैं, तो उसे 'अभौतिक' ही होना चाहिए. जिस क्षण आप उसकी खोज करते हैं जो भौतिक नहीं है, तो हम कहते हैं कि आप 'आध्यात्मिक' हैं. 

मूलतः, मनुष्य जीवन का एक अधिक विशाल अंश पाने का प्रयास कर रहे हैं. आपके पास केवल यही विकल्प है कि आपको इसकी 'सचेतन' अभिव्यक्ति मिलती है या 'अचेतन' अभिव्यक्ति मिलती है. यदि आपको इसकी अचेतन अभिव्यक्ति मिलती है, तो इस पर 'भौतिकवाद' का ठप्पा लगता है. यदि आपको इसकी सचेतन अभिव्यक्ति मिलती है, तो हम इसे 'आध्यात्मिक प्रक्रिया' कहते हैं. 

कैसे मिलेगा आध्यात्मिक आनंद?

जब हम आध्यात्मिक प्रक्रिया कहते हैं, तो हम वहां ऊपर या वहां बाहर किसी चीज की बात नहीं कर रहे हैं; हम अपने भीतर किसी चीज की बात करते हैं. इससे पहले कि आपका जीवन समाप्त हो, आपके भीतर जो है, कम से कम जीवन के इस अंश को आपको पूर्ण रूप से जान लेना चाहिए, क्या ऐसा नहीं है? अन्यथा, यह जीवन व्यर्थ सिद्ध होगा.

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तो आध्यात्मिक प्रक्रिया का अर्थ है - जीवन के इस अंश को इसके आदि से अंत तक जानना और बस सतही स्तर पर न जीना. जब आप स्वयं के केवल एक हिस्से का अनुभव करते हैं, तो जीवन का प्रत्येक पहलू कष्टकारी और यातनापूर्ण बन जाता है. किंतु यदि आप इस जीवन को पूर्णता में जान लेते हैं, तो आपके जीवन का प्रत्येक क्षण आनंदमय होता है. 

भारत के पचास सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्तियों में गिने जाने वाले सद्गुरु एक योगी, रहस्यवादी, दूरदर्शी और 'न्यूयार्क टाइम्स' के बेस्टसेलिंग लेखक हैं. असाधारण और विशिष्ट सेवा के लिए भारत सरकार द्वारा उन्हें वर्ष 2017 में 'पद्म विभूषण' से अलंकृत किया गया था, जो कि सर्वोच्च वार्षिक नागरिक पुरस्कार है. वह विश्व के सबसे बड़े जन-अभियान, 'कॉन्शियस प्लैनेट – मिट्टी बचाओ' (Conscious Planet – Save Soil) के संस्थापक भी हैं, जिसने 4 अरब से अधिक लोगों के जीवन को स्पर्श किया है. 
 

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