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भारत-ओमान CEPA लागू: किसके लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है ये समझौता?

भारत और ओमान के बीच 01 जून से लागू हुआ CEPA बेहद महत्वपूर्ण है. जानकार आने वाले दिनों में इसे भारत के ट्रेड, एनर्जी और जियो पॉलिटिक्स की रणनीति के लिहाज से अहम बता रहे हैं. समझिए कैसे और किस सेक्टर के लिए ये गेमचेंजर साबित हो सकता है.

भारत-ओमान CEPA लागू: किसके लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है ये समझौता?
AFP
  • भारत-ओमान सीईपीए के तहत भारत के 99% से अधिक निर्यात को ओमान में ड्यूटी-फ्री पहुंच मिलेगी.
  • टेक्सटाइल, फार्मा, इंजीनियरिंग, MSME और जेम्स एंड ज्वेलरी जैसे सेक्टर्स के निर्यात में तेजी आने की उम्मीद है.
  • इससे IT, हेल्थकेयर, शिक्षा और प्रोफेशनल सेवाओं में भारतीय युवाओं और पेशेवरों के लिए रोजगार के नए अवसर खुलेंगे.
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भारत और ओमान के बीच हुआ Comprehensive Economic Partnership Agreement (CEPA) 1 जून से लागू हो गया है. लेकिन इसे सिर्फ एक Free Trade Agreement (FTA) मानना बड़ी भूल होगी. यह समझौता उससे कहीं आगे जाकर निवेश, सेवाओं, पेशेवरों की आवाजाही, नियामकीय सहयोग और रणनीतिक साझेदारी तक फैला हुआ है. ऐसे समय में जब ईरान- इजराइल-अमेरिका तनाव और होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते जोखिमों ने वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित किया है, भारत-ओमान के बीच सीईपीए का महत्व और बढ़ गया है. 

इस बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को एक ट्वीट किया, इसमें उन्होंने उस आर्टिकल का जिक्र किया जिसे वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने अखबार में लिखा है. यह भारत और ओमान के बीच CEPA समझौते के बारे में है. 

10.61 अरब डॉलर तक पहुंचा द्विपक्षीय व्यापार

भारत और ओमान के आर्थिक संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं. वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच कुल व्यापार 10.61 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष के 8.94 अरब डॉलर से काफी अधिक है. भारत ने ओमान को 4.06 अरब डॉलर का निर्यात किया, जबकि ओमान से 6.55 अरब डॉलर का आयात किया.

सेवा क्षेत्र में भी दोनों देशों के रिश्ते तेजी से बढ़े हैं. भारत की सेवा निर्यात आय 2020 के 397 मिलियन डॉलर से बढ़कर 2023 में 617 मिलियन डॉलर हो गई. इसमें आईटी, टेलीकॉम, बिजनेस सर्विसेज, ट्रांसपोर्ट और ट्रैवल सेक्टर की बड़ी भूमिका रही. यही बढ़ता व्यापार CEPA की नींव बना.

CEPA क्या है और यह FTA से अलग कैसे है?

आमतौर पर FTA को लोग केवल आयात-निर्यात शुल्क घटाने वाले समझौते के रूप में देखते हैं. लेकिन CEPA उससे कहीं व्यापक है. यह समझौता केवल वस्तुओं के व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें  वस्तुओं का व्यापार, सेवा क्षेत्र, निवेश, प्रोफेशनल मोबिलिटी, नियामकीय सहयोग, विवाद समाधान व्यवस्था, पारस्परिक मान्यता समझौते (अंतरराष्ट्रीय व्यापार में आने वाली तकनीकी बाधाओं को दूर करना ताकि समय और लागत की बचत हो) शामिल हैं. यानी इसके तहत दोनों अर्थव्यवस्थाओं को गहराई से जोड़ने की कोशिश है.

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99.38% निर्यात पर जीरो ड्यूटी

इस समझौते की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि भारत को ओमान के बाजार में 98.08 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर 100 प्रतिशत ड्यूटी-फ्री एक्सेस मिल गया है. यह भारत के कुल निर्यात मूल्य के लगभग 99.38 प्रतिशत हिस्से को कवर करता है. सबसे अहम यह कि इसका लाभ पहले दिन से लागू हो गया है.

जबकि पहले स्थिति बिल्कुल अलग थी. पहले, मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) व्यवस्था के तहत भारत के केवल 15.33 प्रतिशत निर्यात को ही जीरो ड्यूटी का लाभ मिलता था. अब लगभग पूरा भारतीय निर्यात बिना शुल्क के ओमान पहुंच सकेगा. इससे भारतीय उत्पादों की कीमत कम होगी और वे अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में अधिक मजबूत बनेंगे.

किन क्षेत्रों को होगा सबसे ज्यादा फायदा?

ओमान का आयात बाजार 28 अरब डॉलर से अधिक का है. CEPA भारतीय कंपनियों को इस विशाल बाजार तक पहले से कहीं आसान पहुंच देता है.

इसमें सबसे अधिक लाभ पाने वाले क्षेत्रों में शामिल हैं- इंजीनियरिंग सामान, मशीनरी, फार्मास्यूटिकल्स, कृषि उत्पाद, प्रोसेस्ड फूड, समुद्री उत्पाद, टेक्सटाइल, केमिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, प्लास्टिक और रबर उत्पाद, ऑटोमोबाइल और ट्रांसपोर्ट उपकरण, जेम्स ऐंड ज्वेलरी.

जानकारों का मानना है कि भारत के श्रम-प्रधान उद्योगों को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा.

MSME सेक्टर के लिए क्यों है गेमचेंजर?

भारत के निर्यात का बड़ा हिस्सा छोटे और मध्यम उद्योगों से आता है. सरकार का मानना है कि CEPA भारतीय MSME क्षेत्र के लिए परिवर्तनकारी साबित हो सकता है. आयरन एंड स्टील, टेक्सटाइल, लेदर, ऑटो पार्ट्स, इंजीनियरिंग उपकरण और फूड प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों की हजारों MSME इकाइयों को अब नया बाजार मिलेगा. इससे उत्पादन बढ़ेगा, निवेश आएगा और रोजगार सृजन को गति मिलेगी.

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किसानों के हितों की भी सुरक्षा

अक्सर FTA को लेकर किसानों में चिंता रहती है कि सस्ते विदेशी उत्पाद बाजार में आ जाएंगे. लेकिन भारत ने इस समझौते में संतुलित रणनीति अपनाई है. भारत ने कुल 12,556 टैरिफ लाइनों में से 77.79 प्रतिशत को ही इससे जोड़ा है. इसमें कई संवेदनशील उत्पादों को पूरी तरह बाहर रखा गया है.

जिन क्षेत्रों को सुरक्षा दी गई है उनमें डेयरी उत्पाद, खाद्य तेल, ऑयलसीड्स, शहद, फल और सब्जियां, चाय और कॉफी, मसाले, पशु आधारित उत्पाद शामिल हैं. यानी सरकार ने व्यापार बढ़ाने के साथ-साथ किसानों और घरेलू उद्योगों की सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी है.

ओमान भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

इस सवाल का जवाब केवल व्यापार में नहीं बल्कि भूगोल में छिपा है. खाड़ी क्षेत्र के अधिकांश देश होर्मुज स्ट्रेट पर निर्भर हैं.

लेकिन ओमान की स्थिति अलग है.

ओमान का बड़ा समुद्री तट सीधे अरब सागर और ओमान की खाड़ी पर स्थित है. इसके प्रमुख बंदरगाह सालाह और होर्मुज स्ट्रेट के बाहर स्थित हैं.

इसका मतलब है कि यदि होर्मुज में किसी कारण से तनाव या व्यवधान आता है, तब भी ओमान के बंदरगाहों के जरिए व्यापार जारी रह सकता है.

ईरान-इजराइल संकट ने दिखा दी ओमान की अहमियत

हाल के वर्षों में खाड़ी क्षेत्र में बढ़े तनाव ने इस रणनीतिक महत्व को और स्पष्ट कर दिया. ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के अनुसार, जब क्षेत्रीय तनाव के कारण भारत का खाड़ी देशों से व्यापार प्रभावित हुआ, तब ओमान अपवाद बनकर उभरा. भारत का खाड़ी क्षेत्र से आयात जहां तेज गिरावट का शिकार हुआ, वहीं ओमान से आयात में 246 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई.

जीटीआरआई के मुताबिक भारत ने ओमान से वित्त वर्ष 2025 के दौरान कच्चे तेल, एलएनजी और यूरिया की खरीदारी एक समान 1.1 बिलियन डॉलर की हुई. इस दौरान भारत का ओमान को निर्यात भी अपेक्षाकृत स्थिर बना रहा.

जीटीआरआई ने NDTV प्रॉफिट से कहा कि इस अनुभव ने साबित कर दिया कि संकट के समय ओमान भारत के लिए एक भरोसेमंद व्यापार और ऊर्जा गलियारे के रूप में काम कर सकता है.

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ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा पहलू

भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर है. ओमान पहले से भारत को बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, एलएनजी, यूरिया, अमोनिया, मेथनॉल जैसे उत्पादों की आपूर्ति करता आ रहा है.

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने ओमान से लगभग 7.2 अरब डॉलर का आयात किया, जिसमें ऊर्जा और उर्वरक उत्पादों का दबदबा रहा.

भारतीय प्रोफेशनल्स को भी होगा फायदा

यह समझौता सेवाओं और प्रोफेशनल मोबिलिटी को भी कवर करता है. इससे भारतीय आईटी विशेषज्ञ, इंजीनियर, डॉक्टर, शिक्षक, आर्किटेक्ट, अकाउंटेंट और कंसल्टेंट जैसे प्रोफेशनल्स के लिए भी ओमान में अवसर बढ़ सकते हैं. सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) पहले ही दोनों देशों के बीच तेजी से बढ़ रहा है और सीईपीए इस सहयोग को नई गति दे सकता है.

यह समझौता ऐसे समय में लागू हुआ है जब दुनिया युद्ध, सप्लाई चेन संकट और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं से जूझ रही है. ऐसे माहौल में भारत ने एक ऐसा साझेदार चुना है जो व्यापार, ऊर्जा और रणनीतिक दृष्टि से समान रूप से महत्वपूर्ण है.

भारत-ओमान CEPA को केवल एक FTA के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. यह भारत के लिए एक साथ कई मोर्चों पर अवसर लेकर आया है. एक तरफ भारतीय निर्यातकों को 99.38 प्रतिशत निर्यात पर जीरो-ड्यूटी पहुंच मिलेगी, दूसरी तरफ MSME, किसान, मछुआरे, टेक्सटाइल उद्योग और जेम्स एंड ज्वेलरी सेक्टर को नए बाजार मिलेंगे.

साथ ही, ऊर्जा सुरक्षा, खाड़ी क्षेत्र में रणनीतिक मौजूदगी और संकट के समय वैकल्पिक व्यापार मार्ग उपलब्ध कराने की ओमान की क्षमता इस समझौते को और अधिक महत्वपूर्ण बनाती है.

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