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ट्रंप का ईरान पर एक्शन: तेल को लेकर दुनिया में और बढ़ी टेंशन, क्या 200 डॉलर के पार जाएगी तेल की कीमतें?

ट्रंप ने होर्मुज में एक्शन लिया और कच्चे तेल की कीमतें फिर बढ़ गईं. भारत में भी तेल की कीमतें चार बार बढ़ाई जा चुकी हैं. सप्लाई चेन समेत अन्य वस्तुओं की कीमतों पर भी असर दिखने लगा है. तो क्या होर्मुज में गतिरोध के जारी रहने पर एनर्जी रिसर्च कंपनी मैकेंजी की चेतावनी अब सही साबित होने जा रही है?

ट्रंप का ईरान पर एक्शन: तेल को लेकर दुनिया में और बढ़ी टेंशन, क्या 200 डॉलर के पार जाएगी तेल की कीमतें?
  • ईरान-अमेरिका तनाव और होर्मुज स्ट्रेट पर नाकाबंदी जैसी स्थिति ने वैश्विक तेल बाजार में भारी उथल-पुथल मचा दी है.
  • भारत में पेट्रोल, डीजल, CNG और कमर्शियल LPG की कीमतें 4 बार बढ़ चुकी हैं, जिससे घरेलू खर्च तेजी से बढ़ रहा है.
  • अगर होर्मुज स्ट्रेट आगे भी प्रभावित रहा तो खाद्य पदार्थ, ट्रांसपोर्ट, डेली आइटम्स सब महंगे हो सकते हैं.
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इस फरवरी के अंत से ईरान के साथ इजरायल और अमेरिका के युद्ध ने दुनिया भर के तेल बाजारों में उथल-पुथल मचा रखी है. जिस कच्चे तेल की कीमते इस युद्ध से पहले करीब 60 रुपये प्रति बैरल थी वो लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चल रहा है. बीते दिनों जब युद्ध को समाप्त करने और होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा चालू करने के लिए ईरान के साथ एक समझौता पर बातचीत आगे बढ़ी, तो तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गईं. दो दिन पहले जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत अच्छी चल रही है तो तेल की कीमतें 7% नीचे आ गईं. पर जैसे ही ट्रंप ने ईरान को एक बार फिर हमले की चेतावनी दी, तेल की कीमतों में फिर तेजी आ गई.

तो ट्रंप जैसे ही ईरान पर किसी ऐक्शन लेने की बात पर जोर देते हैं पूरी दुनिया में तेल की कीमतों को लेकर टेंशन बढ़ जाती है. आखिर क्या है इसके पीछे वजह और क्यों ईरान इसके केंद्र में है?

28 फरवरी को ईरान पर इजरायल और अमेरिका के हमले के बाद से तेल की कीतमों में करीब 30 फीसद का इजाफा हो चुका है. ईरान ने इस हमले के बाद मार्च के महीने से ही होर्मुज के रास्ते होने वाली शिपिंग पर एक तरह से नाकाबंदी लगा दी है. वहां से गुजरने के लिए जहाजों को अनुमति लेना जरूरी कर दिया, वरना उन पर हमले का खतरा रहता है. कुछ जहाजों पर हमले भी किए गए. 

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होर्मुज का तेल बाजार पर असर

होर्मुज दुनिया के तेल बाजार के लिए सबसे अहम रास्तों में से एक है. युद्ध से पहले, दुनिया भर में तेल की कुल सप्लाई का लगभग 20% हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से होकर गुजरता था. ईरान की इस नाकाबंदी के चलते, मध्य-पूर्व से होने वाले तेल के निर्यात में भारी गिरावट आई है. इससे तेल की सप्लाई में अब तक की सबसे बड़ी रुकावट पैदा हो गई है.

ईरान के नाकेबंदी के जवाब में, अमेरिका ने भी ईरान के बंदरगाहों और जहाजों पर नाकाबंदी लगा दी है. रविवार को ट्रंप ने कहा कि अमेरिका की यह नाकाबंदी तब तक पूरी तरह से लागू और प्रभावी रहेगी, जब तक कि कोई समझौता हो नहीं जाता, और उस पर हस्ताक्षर नहीं हो जाते.

जैसे ही दोनों पक्षों की तरफ से होर्मुज पर नाकेबंदी की खबरें आईं, तेल की कीमतों में फिर इजाफा देखने को मिला. इसका असर अब सिर्फ अंतरराष्ट्रीय बाजार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई देशों समेत अब भारत में भी आम लोगों की जेब पर सीधा दिखने लगा है.

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30% बढ़ चुकी हैं तेल की कीमतें

फरवरी के अंत में ईरान पर इजरायल और अमेरिका की संयुक्त सैन्य कार्रवाई के बाद से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में करीब 30 प्रतिशत तक उछाल आ चुका है. युद्ध से पहले जो ब्रेंट क्रूड करीब 60 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था, वह कई बार 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चला गया. हालांकि बीच में जब ईरान के साथ समझौते और युद्धविराम की संभावना बनी तो कीमतें कुछ नरम पड़ीं, लेकिन जैसे ही ट्रंप ने फिर से ईरान पर संभावित कार्रवाई की चेतावनी दी, बाजार में घबराहट लौट आई और तेल फिर महंगा होने लगा.

दरअसल, पूरी दुनिया की नजर जिस जगह पर टिकी है, वह है होर्मुज स्ट्रेट. यह समुद्री रास्ता वैश्विक ऊर्जा सप्लाई की लाइफलाइन माना जाता है. दुनिया की कुल तेल सप्लाई का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. खाड़ी देशों से निकलने वाला तेल और सीएनजी टैंकर इसी स्ट्रेट से होकर एशिया, यूरोप और दुनिया के बाकी हिस्सों तक पहुंचते हैं.

ईरान ने मार्च से इस इलाके में जहाजों की आवाजाही पर सख्त नियंत्रण शुरू कर दिया. जहाजों के लिए अनुमति अनिवार्य कर दी गई और कुछ जहाजों पर हमले की घटनाएं भी सामने आईं. इसके जवाब में अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों और जहाजों पर नाकाबंदी जैसे कदम उठाने शुरू किए. ट्रंप ने साफ कहा कि जब तक समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हो जाते, तब तक अमेरिकी दबाव जारी रहेगा.

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अमेरिका ने फिर क्यों किए हमले?

इसी बीच दक्षिणी ईरान में अमेरिकी सैन्य अभियान ने तनाव और बढ़ा दिया. अमेरिकी सेना ने दावा किया कि उसने आत्मरक्षा में कार्रवाई करते हुए उन जहाजों और मिसाइल ठिकानों को निशाना बनाया, जिन पर समुद्री रास्तों में बारूदी सुरंगें बिछाने की कोशिश का आरोप था. दूसरी ओर ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने चेतावनी दी कि अगर संघर्ष विराम का उल्लंघन हुआ तो जवाबी कार्रवाई की जाएगी. ईरान ने यह भी दावा किया कि अमेरिकी ड्रोन और एक एफ-35 लड़ाकू विमान उसके हवाई क्षेत्र में घुसे थे.

यानी हालात ऐसे हैं जहां किसी भी छोटी सैन्य कार्रवाई से बड़ा टकराव शुरू हो सकता है. और जैसे ही युद्धविराम टूटने या होर्मुज बंद होने की आशंका बढ़ती है, तेल बाजार में घबराहट बढ़ जाती है.

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क्या 200 डॉलर तक बढ़ सकती हैं तेल की कीमतें?

एनर्जी रिसर्च फर्म वूड मैकेंजी ने चेतावनी दी है कि अगर होर्मुज स्ट्रेट लंबे समय तक बंद रहा तो वैश्विक तेल कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं. रिपोर्ट के मुताबिक फिलहाल 1.1 करोड़ बैरल प्रतिदिन से ज्यादा खाड़ी तेल उत्पादन प्रभावित है. इसके अलावा दुनिया की करीब 20 प्रतिशत एनएनजी सप्लाई पर भी असर पड़ रहा है.

रिपोर्ट में तीन संभावनाएं बताई गई हैं. पहला क्विक पीस यानी जल्दी समझौता, जिसमें 2026 के अंत तक तेल करीब 80 डॉलर तक लौट सकता है. दूसरा समर सेटलमेंट, जिसमें लंबे समय तक तनाव बना रहेगा और दुनिया मंदी के खतरे का सामना करेगी. जबकि सबसे खतरनाक एक्सटेंडेड डिसरप्शन स्थिति में तेल 200 डॉलर तक जा सकता है और वैश्विक अर्थव्यवस्था सिकुड़ सकती है.

भारत पर सीधा असर: 4 बार बढ़ चुकीं तेल की कीमतें

इस पूरे संकट का सीधा असर भारत पर पड़ना शुरू हो गया है. भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में बढ़ोतरी का असर भारतीय बाजार में तेजी से दिखता है.

15 मई के बाद से देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें चार बार बढ़ चुकी हैं. दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 94.77 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 102.12 रुपये प्रति लीटर पहुंच गई है. डीजल 87.67 रुपये से बढ़कर 95.2 रुपये प्रति लीटर हो गया. यानी दोनों ईंधनों में औसतन करीब 7.5 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई है. CNG भी लगभग 4 रुपये प्रति किलो महंगी हुई है. वहीं कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमतों में भी तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है.

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रसोई पर भी पड़ने लगा असर

लेकिन असली चिंता सिर्फ गाड़ियों का खर्च बढ़ना नहीं है. भारत जैसे देश में ईंधन पूरी सप्लाई चेन की रीढ़ है. खेतों से सब्जियां शहरों तक पहुंचाने से लेकर फैक्ट्रियों से सामान बाजार तक पहुंचाने तक, हर जगह डीजल और पेट्रोल की भूमिका होती है. ऐसे में ईंधन महंगा होने का मतलब है कि हर सामान की ढुलाई महंगी होगी और इसका बोझ आखिरकार आम ग्राहक पर पड़ेगा.

यही वजह है कि अब रसोई का बजट भी बिगड़ने लगा है. फरवरी के अंत से अब तक खाने-पीने के सामानों में लगातार महंगाई बढ़ी है. सूरजमुखी तेल करीब 11.2 रुपये प्रति किलो महंगा हुआ है. सोया तेल में लगभग 9.5 रुपये और पाम ऑयल में 9 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी हुई है. मूंगफली तेल भी करीब 7 रुपये प्रति किलो महंगा हुआ है. वहीं देसी घी भी करीब 5.7 रुपये प्रति किलो महंगा हुआ है.

खाद्य तेलों में यह बढ़ोतरी इसलिए ज्यादा दिख रही है क्योंकि भारत बड़ी मात्रा में खाद्य तेल आयात करता है. युद्ध और समुद्री तनाव की वजह से शिपिंग खर्च बढ़ गया है. बीमा महंगा हुआ है और सप्लाई चेन बाधित हुई है. इसका असर सीधे भारतीय बाजार पर पड़ा है.

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आगे महंगाई पर असर

अगर आने वाले दिनों में होर्मुज स्ट्रेट में तनाव और बढ़ता है, तो भारत में सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं बल्कि दूध, सब्जियां, राशन, ऑनलाइन डिलीवरी, टैक्सी किराया, बस सेवाएं, हवाई टिकट और निर्माण सामग्री तक सब महंगा हो सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ती ईंधन कीमतें महंगाई को नई ऊंचाई पर पहुंचा सकती हैं और घरेलू बजट पर दबाव और बढ़ सकता है.

इस बीच रूस-यूक्रेन युद्ध ने भी वैश्विक अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है. रूस ने भी यूक्रेन पर और बड़े हमलों की चेतावनी दी है. इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव और बढ़ रहा है, क्योंकि दुनिया पहले से ही कई मोर्चों पर भू-राजनीतिक संकट झेल रही है.

फिलहाल पूरी दुनिया की नजर दो चीजों पर टिकी है. पहली, क्या ईरान और अमेरिका के बीच कोई स्थायी समझौता हो पाएगा. और दूसरी, क्या होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह खुला रहेगा या दुनिया को सबसे बड़े ऊर्जा संकटों में से एक का सामना करना पड़ेगा.

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