राजौरी गार्डन सीट से जीत हासिल करने वाले मनजिंदर सिंह सिरसा, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के साथ
- पंजाब, गोवा चुनावों के बाद आप के लिए एक और बुरी खबर
- 'आप' उम्मीदवार अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए
- एमसीडी चुनावों से पहले आप के लिए यह बड़ा झटका
नई दिल्ली:
दिल्ली नगर निगम चुनावों से सिर्फ 10 दिन पहले आम आदमी पार्टी (आप) को गुरुवार को करारा झटका देते हुए बीजेपी ने राजौरी गार्डन विधानसभा सीट उससे छीन ली. आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए और तीसरे स्थान पर रहे, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रही. अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी के लिए हार का इससे बुरा समय और अंतर नहीं हो सकता था. पंजाब और गोवा विधानसभा चुनावों में खराब प्रदर्शन से पार्टी अभी उबरी भी नहीं थी कि दिल्ली में ऐसे नतीजों ने उसकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं. आइए नजर डालते हैं उन 10 कारणों पर जो राजौरी गार्डन में आप की करारी हार के लिए जिम्मेदार हैं.
1. जरनैल सिंह को पंजाब भेजना - राजौरी गार्डन सीट से 2015 में आम आदमी पार्टी के जरनैल सिंह विधायक चुने गए थे, लेकिन पंजाब चुनाव आते ही उन्हें इस सीट से इस्तीफा दिलाकर पंजाब ले जाया गया जो दिल्ली के लोगों को पसंद नहीं आया. राजौरी गार्डन के लोगों को बेवजह क्योंकि दोबारा चुनाव में धकेल दिया गया. वहीं इस दौरान आम आदमी पार्टी को पंजाब में भी करारी हार का सामना करना पड़ा. पंजाब में हारने के बावजूद जरनैल सिंह को आप ने दोबारा राजौरी गार्डन से टिकट देने के बजाय हरजीत सिंह को चुनाव में उतारा, जो जनता को पसंद नहीं आया.
2. आरोप प्रत्यारोप की राजनीति से हुआ नुकसान- आम आदमी पार्टी ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत जनता से जुड़े जमीनी मुद्दों से की थी, जिसमें बिजली, पानी, सड़क, झुग्गी आदि शामिल थे. 2015 के विधानसभा चुनाव में भी आप ने इन मुद्दों को ही पकड़े रखा, लेकिन सत्ता में आते ही इन्होंने आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति शुरू कर दी. आप संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हर बात के लिए एलजी से लेकर पीएम मोदी को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने लगे. इसने इनकी पुरानी छवि को नुकसान पहुंचाया और हमेशा शिकायत करते रहने वाली पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया. अपनी हर नाकामी के लिए केंद्र और एलजी को जिम्मेदार ठहराना उनकी बड़ी गलती रही.
3. घोटालों में फंसना - दिल्ली में सत्ता में आने के तुरंत बाद ही आप के मंत्रियों से लेकर नेताओं तक पर गंभीर आरोप लगे और उनमें से कई जेल भी गए. आप नेताओं पर फर्जी डिग्री से लेकर घरेलू हिंसा और यौन उत्पीड़न तक के आरोप लगे. पार्टी इनमें से किसी के आरोपों का न तो खंडन कर पाई और ना ही अपने नेता को अदालत में पाक-साफ साबित कर पाई. इसके चलत धीरे-धीरे लोगों के बीच आम आदमी पार्टी की छवि धूमिल हो रही है.
4. मोदी को टारगेट बनाना - दिल्ली में भारी बहुमत से सत्ता में आने के बावजूद केजरीवाल लगातार पीएम मोदी पर व्यक्तिगत हमले करते रहे. केजरीवाल उनकी डिग्री से लेकर मां के साथ फोटो खिंचवाए जाने पर सवाल खड़े करते रहे. लोगों को यह भी काफी नागवार गुजरा.
5. विज्ञापन पर खर्च कर दिए 97 करोड़ - आम आदमी पार्टी पर लगातार यह आरोप लगता रहा है कि उसने दिल्ली की जनता की गाढ़ी कमाई की बड़ी मात्रा अपने सरकार के विज्ञापन पर खर्च कर दिए. आम आदमी पार्टी ने पिछले दो साल में सरकारी खजाने के 97 हजार करोड़ रुपये अखबार, टीवी और विभिन्न माध्यमों पर विज्ञापन देने में ही खर्च कर दिए. निश्चित ही दिल्ली की जनता को यह बात पसंद नहीं आई कि जिन पैसों को शहर के विकास के लिए खर्च करना था, वो पार्टी के एड पर खर्च हुए.
6. 16,000 की थाली ने डुबोई आप की लुटिया - चुनाव से ठीक पहले बीजेपी ने एक बड़ा खुलासा करते हुए आम आदमी पार्टी के एक सलाना जलसे का एक ऐसा बिल जनता के सामने रख दिया जिसने आम आदमी पार्टी की छवि पर ही सवालिया निशान खड़ा कर दिया. इस बिल में दिखाया गया कि इस जलसे में मेहमानों के लिए मंगाई गई एक-एक थाली की कीमत लगभग 12 से 16 हजार रुपये थी. जनता के धन पर सरकार की ऐश लोगों को पसंद नहीं आई और यह भी पार्टी के खिलाफ गया.
7. बड़े नेताओं को बाहर करना पड़ा भारी - आम आदमी पार्टी ने आंदोलन के समय से ही अपने साथ रहे योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और आनंद कुमार जैसे बड़े और साफ छवि के नेताओं को सत्ता में आते ही बाहर का रास्ता दिखा दिया. इन नेताओं ने भी बाहर होते ही पार्टी के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया, जिससे पार्टी की नकारात्मक छवि बनी.
8. ईवीएम और इलेक्शन कमीशन पर उठाई उंगली - पंजाब विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद जिस तरह से केजरीवाल ने ईवीएम और चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को अपने निशाने पर लिया वो निश्चित रूप से ही पार्टी के खिलाफ गई. ऐसा नहीं है कि 2014 के बाद से बीजेपी हर राज्य के चुनाव को जीती है, लेकिन हारने वाली पार्टियों ने कभी इलेक्शन कमीशन और ईवीएम पर सवाल नहीं उठाए. यहां तक कि कांग्रेस जो अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है, उसने भी कभी ईवीएम या चुनाव आयोग पर उंगली नहीं उठाई. लेकिन एक ही हार के बाद आम आदमी पार्टी की इस बौखलाहट का जनता के बीच नकारात्मक असर पड़ा.
9. शुंगलू कमिटी की रिपोर्ट से आप की किरकिरी - एमसीडी चुनाव और उपचुनाव से ठीक पहले शुंगलू कमिटी की रिपोर्ट का बाहर आना आम आदमी पार्टी के लिए डूबते जहाज में छेद की तरह साबित हुआ. शुंगलू कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में साफ-साफ कह दिया है कि आप सरकार ने पिछले दो साल में सिर्फ अपनी मनमानी की है. उन्होंने किसी भी मामले में एलजी की सहमति नहीं ली और किसी संवैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया.
10. एंटी इनकम्बेंसी - वैसे तो आमतौर पर उपचुनाव में एंटी इनकम्बेंसी काम नहीं करती है और ये बात 10 राज्यों में हुए उपचुनाव ने भी साबित किया है, लेकिन आम आदमी पार्टी के लिए दिल्ली में उसका पिछले दो साल का कार्यकाल ही उसके खिलाफ चला गया। एंटी इनकम्बेंसी का ही नतीजा है कि आम आदमी पार्टी का उम्मीदवार न सिर्फ हारा है, बल्कि उसकी जमानत भी जब्त हो गई है.
1. जरनैल सिंह को पंजाब भेजना - राजौरी गार्डन सीट से 2015 में आम आदमी पार्टी के जरनैल सिंह विधायक चुने गए थे, लेकिन पंजाब चुनाव आते ही उन्हें इस सीट से इस्तीफा दिलाकर पंजाब ले जाया गया जो दिल्ली के लोगों को पसंद नहीं आया. राजौरी गार्डन के लोगों को बेवजह क्योंकि दोबारा चुनाव में धकेल दिया गया. वहीं इस दौरान आम आदमी पार्टी को पंजाब में भी करारी हार का सामना करना पड़ा. पंजाब में हारने के बावजूद जरनैल सिंह को आप ने दोबारा राजौरी गार्डन से टिकट देने के बजाय हरजीत सिंह को चुनाव में उतारा, जो जनता को पसंद नहीं आया.
2. आरोप प्रत्यारोप की राजनीति से हुआ नुकसान- आम आदमी पार्टी ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत जनता से जुड़े जमीनी मुद्दों से की थी, जिसमें बिजली, पानी, सड़क, झुग्गी आदि शामिल थे. 2015 के विधानसभा चुनाव में भी आप ने इन मुद्दों को ही पकड़े रखा, लेकिन सत्ता में आते ही इन्होंने आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति शुरू कर दी. आप संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हर बात के लिए एलजी से लेकर पीएम मोदी को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने लगे. इसने इनकी पुरानी छवि को नुकसान पहुंचाया और हमेशा शिकायत करते रहने वाली पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया. अपनी हर नाकामी के लिए केंद्र और एलजी को जिम्मेदार ठहराना उनकी बड़ी गलती रही.
3. घोटालों में फंसना - दिल्ली में सत्ता में आने के तुरंत बाद ही आप के मंत्रियों से लेकर नेताओं तक पर गंभीर आरोप लगे और उनमें से कई जेल भी गए. आप नेताओं पर फर्जी डिग्री से लेकर घरेलू हिंसा और यौन उत्पीड़न तक के आरोप लगे. पार्टी इनमें से किसी के आरोपों का न तो खंडन कर पाई और ना ही अपने नेता को अदालत में पाक-साफ साबित कर पाई. इसके चलत धीरे-धीरे लोगों के बीच आम आदमी पार्टी की छवि धूमिल हो रही है.
4. मोदी को टारगेट बनाना - दिल्ली में भारी बहुमत से सत्ता में आने के बावजूद केजरीवाल लगातार पीएम मोदी पर व्यक्तिगत हमले करते रहे. केजरीवाल उनकी डिग्री से लेकर मां के साथ फोटो खिंचवाए जाने पर सवाल खड़े करते रहे. लोगों को यह भी काफी नागवार गुजरा.
5. विज्ञापन पर खर्च कर दिए 97 करोड़ - आम आदमी पार्टी पर लगातार यह आरोप लगता रहा है कि उसने दिल्ली की जनता की गाढ़ी कमाई की बड़ी मात्रा अपने सरकार के विज्ञापन पर खर्च कर दिए. आम आदमी पार्टी ने पिछले दो साल में सरकारी खजाने के 97 हजार करोड़ रुपये अखबार, टीवी और विभिन्न माध्यमों पर विज्ञापन देने में ही खर्च कर दिए. निश्चित ही दिल्ली की जनता को यह बात पसंद नहीं आई कि जिन पैसों को शहर के विकास के लिए खर्च करना था, वो पार्टी के एड पर खर्च हुए.
6. 16,000 की थाली ने डुबोई आप की लुटिया - चुनाव से ठीक पहले बीजेपी ने एक बड़ा खुलासा करते हुए आम आदमी पार्टी के एक सलाना जलसे का एक ऐसा बिल जनता के सामने रख दिया जिसने आम आदमी पार्टी की छवि पर ही सवालिया निशान खड़ा कर दिया. इस बिल में दिखाया गया कि इस जलसे में मेहमानों के लिए मंगाई गई एक-एक थाली की कीमत लगभग 12 से 16 हजार रुपये थी. जनता के धन पर सरकार की ऐश लोगों को पसंद नहीं आई और यह भी पार्टी के खिलाफ गया.
7. बड़े नेताओं को बाहर करना पड़ा भारी - आम आदमी पार्टी ने आंदोलन के समय से ही अपने साथ रहे योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और आनंद कुमार जैसे बड़े और साफ छवि के नेताओं को सत्ता में आते ही बाहर का रास्ता दिखा दिया. इन नेताओं ने भी बाहर होते ही पार्टी के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया, जिससे पार्टी की नकारात्मक छवि बनी.
8. ईवीएम और इलेक्शन कमीशन पर उठाई उंगली - पंजाब विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद जिस तरह से केजरीवाल ने ईवीएम और चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को अपने निशाने पर लिया वो निश्चित रूप से ही पार्टी के खिलाफ गई. ऐसा नहीं है कि 2014 के बाद से बीजेपी हर राज्य के चुनाव को जीती है, लेकिन हारने वाली पार्टियों ने कभी इलेक्शन कमीशन और ईवीएम पर सवाल नहीं उठाए. यहां तक कि कांग्रेस जो अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है, उसने भी कभी ईवीएम या चुनाव आयोग पर उंगली नहीं उठाई. लेकिन एक ही हार के बाद आम आदमी पार्टी की इस बौखलाहट का जनता के बीच नकारात्मक असर पड़ा.
9. शुंगलू कमिटी की रिपोर्ट से आप की किरकिरी - एमसीडी चुनाव और उपचुनाव से ठीक पहले शुंगलू कमिटी की रिपोर्ट का बाहर आना आम आदमी पार्टी के लिए डूबते जहाज में छेद की तरह साबित हुआ. शुंगलू कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में साफ-साफ कह दिया है कि आप सरकार ने पिछले दो साल में सिर्फ अपनी मनमानी की है. उन्होंने किसी भी मामले में एलजी की सहमति नहीं ली और किसी संवैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया.
10. एंटी इनकम्बेंसी - वैसे तो आमतौर पर उपचुनाव में एंटी इनकम्बेंसी काम नहीं करती है और ये बात 10 राज्यों में हुए उपचुनाव ने भी साबित किया है, लेकिन आम आदमी पार्टी के लिए दिल्ली में उसका पिछले दो साल का कार्यकाल ही उसके खिलाफ चला गया। एंटी इनकम्बेंसी का ही नतीजा है कि आम आदमी पार्टी का उम्मीदवार न सिर्फ हारा है, बल्कि उसकी जमानत भी जब्त हो गई है.
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