- दिल्ली के यमुना बाजार के ओ-जोन इलाके में ध्वस्तीकरण के बाद लोगों के सामने जीवनका संकट खड़ा हो गया है
- जिनकी आजीविका और पहचान यमुना के घाटों से जुड़ी हुई थी उनको वहां जाने भी नहीं दिया जा रहा
- घाटों पर धार्मिक गतिविधियां प्रतिबंधित होने से पंडित, नाविक और फूल विक्रेता सहित सभी की आमदनी लगभग खत्म हो गई
दिल्ली के यमुना बाजार के ओ-जोन इलाके में शुक्रवार को हालांकि फिर से बुलडोजर नहीं चला, कोई नया ध्वस्तीकरण नहीं हुआ. अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई थमी रही. सुरक्षा के लिहाज से पूरे इलाके में भारी पुलिस बल तैनात रहा. निगम बोध घाट के आसपास आम लोगों और मीडिया की आवाजाही सीमित कर दी गई. लेकिन पुलिस की बैरिकेडिंग के दूसरी तरफ उन लोगों की दुनिया बिखरी पड़ी है, जिनकी पीढ़ियां यमुना के किनारे बसी थीं. जिनकी आजीविका के साथ-साथ उनकी पहचान भी इसी से जुड़ी हुई थी. यहां के 310 परिवारों की दुनिया जैसे उजड़ गई है.
अब मंदिर के बाहर काम का इंतजार करता है ‘गणेश'
यमुना बाजार के घाटों पर बिखरे हुए घरों के मलबे के बीच कई ऐसे परिवार हैं, जिनकी सिर्फ छत ही नहीं, बल्कि सालों पुरानी आजीविका भी छिन गई है. घाट नंबर-24 के रहने वाले गणेश ने एनडीटीवी से बातचीत में बताया कि उनके पूर्वज सालों से इसी घाट पर रहते आए हैं. अब उनका घर टूट चुका है और रहने के लिए किराए का कमरा लेना नई मजबूरी बन गई है. गणेश बताते हैं, "मैं विदेशी पर्यटकों को यमुना की सैर कराता था और उन्हें भारत की संस्कृति के बारे में बताता था. आज खुद मेरा कोई ठिकाना नहीं बचा है."

गणेश इन दिनों यमुना बाजार के पंचमुखी हनुमान मंदिर के बाहर बैठकर किसी तरह काम मिलने का इंतजार करते हैं. अस्थि विसर्जन के लिए वह लोगों को नाव से यमुना के बीच ले जाया करते थे. शुक्रवार सुबह हरियाणा के रेवाड़ी से आए एक परिवार, जो गणेश के यजमान थे, जब गणेश उन्हें घाट 24 की तरफ ले जा रहे थे तो पुलिस ने उन्हें वहां जाने की अनुमति नहीं दी. इसके बाद अंतिम संस्कार से जुड़ी धार्मिक प्रक्रिया पूरी करने के लिए उन्हें दूसरे घाट पर जाना पड़ा. गणेश ने कहा, "जिस घाट पर हमने जीवन भर अपने संस्कार और परंपराएं निभाईं, जहां हमने इस कार्य की बारीकियां सीखीं, आज उसी घाट पर हमारा जाना भी प्रतिबंधित कर दिया गया है."
'बाढ़ में खाना देने वाले आज नजर नहीं आ रहे'
घाट नंबर-13 की रहने वाली कृष्णा शर्मा की आंखों में घर उजड़ने का दर्द साफ दिखाई देता है. उनका कहना है कि उनका पुश्तैनी मकान तोड़ दिया हया है. कृष्णा शर्मा परिवार की अकेली कमाने वाली सदस्य हैं. उनका बेटा दिव्यांग है और पहले शेयर ट्रेडिंग करता था, लेकिन अब बेरोजगार है. वह सरकार से पुनर्वास और आर्थिक सहायता की मांग करती हैं. हालांकि कृष्णा शर्मा को विधवा पेंशन मिलती है, जो उनकी आय का एकमात्र नियमित स्रोत है.

यमुना बाजार के घाटों के पूर्व निवासियों आकाश कश्यप बताते है कि "जब यमुना में बाढ़ आती थी तो हमारे लिए खाना लेकर लोग पहुंच जाते थे. आज जब भूख लगी है तो न घर बचा है और न कोई पूछने वाला."
जिनकी जिंदगी घाटों से जुड़ी थी
यमुना बाजार के घाटों से जुड़े कई पारंपरिक पेशों पर ध्वस्तीकरण का सीधा असर पड़ा है. यहां रहने वाले पंडित और ब्राह्मण अंतिम संस्कार के बाद होने वाले अस्थि विसर्जन और धार्मिक अनुष्ठानों से अपनी आजीविका चलाते थे. घाटों पर सालों से मुंडन संस्कार से जुड़े कई लोगों की रोजी-रोटी इसी पर निर्भर थी. फूल और पूजा सामग्री बेचकर परिवार पालते वाले, वहीं नाविक पर्यटकों को घाटों की सैर कराकर अपना गुजारा करते थे. फिलहाल पूजा-पाठ और अस्थि विसर्जन पर लगी रोक ने इन सभी की आमदनी लगभग खत्म कर दी है.

रोजगार पर सबसे बड़ा संकट
घाटों पर पसरी खामोशी सिर्फ टूटे हुए मकानों की नहीं, बल्कि खत्म होती आजीविका की भी कहानी कहती है. नावें अब भी किनारे पर खड़ी हैं, लेकिन न श्रद्धालु आ पा रहे हैं और न पर्यटक. फूलों की दुकानें सूनी हैं, पंडितों के पास यजमान नहीं हैं. और नाई अपने ग्राहकों का इंतजार कर रहे हैं. यमुना बाजार RWA के सचिव गोपाल झा ने फोन पर बताया कि प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि भविष्य में धार्मिक गतिविधियां दोबारा शुरू कराई जाएंगी, लेकिन यहां दोबारा बसने या रहने की अनुमति फिलहाल नहीं दी जाएगी.

प्रशासन का क्या कहना है?
कश्मीरी गेट थाने के थाना अध्यक्ष ने एनडीटीवी से कहा कि सुरक्षा कारणों से आम लोगों और मीडिया की आवाजाही सीमित की गई है. उनका कहना है कि ध्वस्तीकरण के दौरान और उसके बाद किसी भी दुर्घटना से बचने के लिए यह कदम उठाया गया है. उन्होंने बताया कि स्थानीय स्तर पर हल्का विरोध जरूर हुआ था, लेकिन उसे शांतिपूर्ण तरीके से सुलझा लिया गया और पूरे अभियान के दौरान कानून-व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रण में रही.
यमुना के किनारे अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई अपने कानूनी और पर्यावरणीय उद्देश्य के साथ आगे बढ़ रही है. लेकिन इन टूटे हुए घरों के बीच खड़े लोग एक ऐसे सवाल का जवाब तलाश रहे हैं, घर और रोजगार छिन गया, तो अब जाएं कहां और जिएं कैसे?
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