दिल्ली में फुटपाथ से एक मासूम बच्ची की किडनैपिंग के बाद रेप और मर्डर की घटना ने बड़े सवाल खड़े किए हैं. राजधानी की सड़कों पर सैकड़ों ऐसे परिवार हैं, जो गुजर कर रहे हैं. कभी ये लोग खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर होते हैं तो कभी उनका वक्त किसी झुग्गी में गुजरता है. ऐसे में इस अपराध ने जनाक्रोश को तो भड़काया ही है, साथ ही एक असहज करने वाला सवाल भी खड़ा कर दिया है. आखिर और कितने बच्चे ऐसे स्थानों पर बड़े हो रहे हैं जहां न ताला लगाने के लिए दरवाज़े हैं, न सुरक्षा के लिए दीवारें हैं और न ही रात भर उनकी देखभाल करने वाला कोई है?
इसका जवाब दिल्ली के फुटपाथों, फ्लाईओवर के नीचे, ट्रैफ़िक चौराहों और रेलवे स्टेशनों के बाहर बिखरा पड़ा है. इन जगहों पर हज़ारों परिवारों ने चुपचाप खुले आसमान के नीचे अपनी ज़िंदगी बसा ली है. वे उन पहले लोगों में से होते हैं, जिन्हें शहर हर सुबह देखता है और उन आखिरी लोगों में शामिल होते हैं जिनके पास से गुज़रकर शहर रात को सोने जाता है. इसके बावजूद वे लगभग अदृश्य ही बने रहते हैं। इस विशेष रिपोर्ट के लिए NDTV ने दिल्ली की सड़कों पर रहने वाले लोगों से मिलने के लिए पूरे शहर का दौरा किया. उनकी कहानियां सुनीं. ये कहानियां पलायन, गरीबी, विस्थापन और नुकसान से आकार लेने वाले जीवन को बयां करती हैं. लेकिन आंकड़ों और नीतिगत बहसों से परे, ये वे परिवार हैं, जो एक सुरक्षित जगह पर सोने के अलावा और कोई बड़ा सपना नहीं देखते.
लोकेशन 1- निजामुद्दीन में सड़क पर अमीना का परिवार
दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में रहने वालीं 70 वर्षीय अमीना बेगम और उनके परिवार ने लगभग पूरी जिंदगी सड़क किनारे ही बिताई है. बिहार की रहने वालीं अमीना करीब छह दशक पहले दिल्ली आई थीं. आज उनके परिवार के 12 सदस्य फुटपाथ के एक हिस्से पर मिलकर रहते हैं. कचरा बीनना इनमें से अधिकांश लोगों की आजीविका का मुख्य साधन है. दोपहर की तपती गर्मी में एक अस्थायी चूल्हा जल रहा है, जिस पर वह अपने परिवार के लिए खाना बना रही हैं. चूल्हे का धुआँ गर्मियों की गर्म हवा में मिल रहा है, जबकि महज़ कुछ ही फीट की दूरी से गाड़ियाँ तेज़ी से गुज़र रही हैं. वह याद करते हुए बताती हैं, 'जब हम यहाँ आए थे तो यहां कुछ नहीं था। सब जंगल था.' उनका परिवार कभी खुसरो पार्क की एक झुग्गी में रहता था, जिसे करीब पंद्रह साल पहले तोड़ दिया गया था. तब से, यह फुटपाथ ही उनका आशियाना है. पूरा परिवार खुसरो पार्क में एक गद्दे पर सोता है और छत के नाम पर खुद को प्लास्टिक की शीट से ढक लेता है. रात में उनकी सुरक्षा के लिए परिवार का कोई एक सदस्य जागकर पहरा देता है और वह व्यक्ति फिर सुबह सोता है.

अमीना कहती हैं कि उनके बच्चे स्कूल तो गए थे, लेकिन गरीबी के कारण उन्हें छठी, आठवीं और नौवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी. वह बताती हैं कि उन्होंने मकान के लिए अधिकारियों से कई बार गुहार लगाई, लेकिन कुछ नहीं बदला. उनकी बहू ने सड़क किनारे ही एक बच्चे को जन्म दिया. पुलिस कभी-कभार उन्हें फुटपाथ से हटने के लिए कहती है, लेकिन उनके पास जाने के लिए कोई और जगह नहीं है. अमीना के लिए इन छह दशकों में यह शहर पूरी तरह बदल गया है. फ्लाईओवर बन गए हैं, इलाके फैल गए हैं और गगनचुंबी इमारतों ने शहर का हुलिया बदल दिया है. अगर कुछ नहीं बदला तो वह है उनका फुटपाथ वाला पता.
22 साल की अंजू और 17 की रुक्साना की कहानी
अब बात यहां से कुछ ही मीटर दूरी पर रहने वाली 22 साल की अंजू की. वह अपने प्रेमी से शादी करने के लिए घर से भागकर मध्य प्रदेश से दिल्ली आई थीं. शादी के बाद उनके परिवार ने उनसे सारे रिश्ते तोड़ लिए. आज उनके दो छोटे बच्चे हैं. उनके पति कबाड़ (प्लास्टिक और बोतलें आदि) इकट्ठा करते हैं, जबकि वह घर संभालती हैं. उनके दोनों बच्चों का जन्म सड़क किनारे ही रिश्तेदारों की मदद से हुआ क्योंकि परिवार के पास जाने के लिए कोई और जगह नहीं थी. जब भी उनके पास पैसे होते हैं, वह नहाने के लिए सार्वजनिक शौचालय का इस्तेमाल करती हैं. पैसे जब नहीं होते तो वह देर रात चुपके से एक बाल्टी में पानी भरती हैं और सड़क किनारे ही नहा लेती हैं. डर उनका पीछा कभी नहीं छोड़ता. उनकी एक बहन का अपहरण हुआ था. वह घटना आज भी पूरे परिवार को डराती है, जिससे हर रात डर के साये में गुज़रती है. हाल ही में दिल्ली के फुटपाथ से एक बच्ची के साथ हुए कथित बलात्कार और हत्या के मामले ने अंजू जैसे परिवारों के इस डर को और ज़्यादा बढ़ा दिया है. जहां न दीवारें हों, न दरवाज़े और न ही ताले, वहां सुरक्षा सिर्फ किस्मत के भरोसे होती है.

रुक्साना की 15 साल में शादी और अब फुटपाथ पर गुजारा
इसी तरह 17 साल की रुक्साना ने इतनी कम उम्र में ही उतने दुख झेल लिए हैं, जितने लोग पूरी ज़िंदगी में नहीं झेलते. उनकी शादी महज़ पंद्रह साल की उम्र में कर दी गई थी. उनके पति एक वेडिंग बैंड (शादियों में बाजा बजाने वाले समूह) में काम करते हैं और लंबे समय तक घर से बाहर रहते हैं. ससुराल वालों ने दहेज की मांग की और उन्हें अपनाने से इनकार कर दिया, इसलिए अब वह फुटपाथ पर अपने मायके वालों के साथ रहती हैं. उन्होंने आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी, लेकिन बाद में उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी. मकान का किराया देना उनके बस से बाहर है. बिजली के बिल के बारे में तो वह सोच भी नहीं सकतीं.
वह बताती हैं कि कुछ रातों को जब वह फुटपाथ पर सो रही होती हैं, तो अनजान लोग आकर उनके बगल में सो जाते हैं. वह धीरे से कहती हैं, 'हम कुछ नहीं कर सकते।' सड़क पर रहने वाली कई दूसरी महिलाओं की तरह वह भी नहाने और शौचालय के लिए सार्वजनिक शौचालयों या पास के जंगली इलाकों पर निर्भर हैं. वह कहती हैं कि रैन बसेरे (रात में रुकने की सरकारी जगह) में जगह मिलना भी हमेशा आसान नहीं होता. उनके अनुसार कभी-कभी लोगों को उनके पहनावे और हुलिए को देखकर वहां से भगा दिया जाता है. वह बताती हैं कि पुलिस ने कई बार उनके परिवार को फुटपाथ से हटाया है. उनके पति हर महीने करीब 5,000 रुपये भेजते हैं. यह रकम से जिया जा सकता है, लेकिन गरीबी से निकलना नहीं हो पाएगा.

लोकेशन 2- सराय काले खां
अब एक और लोकेशन सराय काले खां की बात करते हैं. यहां गुड़िया अपने चार बच्चों के पास बैठी हैं. उन्हें अपनी सही उम्र नहीं पता क्योंकि वह कभी स्कूल नहीं गईं. अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा उन्होंने सरकार द्वारा चलाए जाने वाले रैन बसेरों (नाइट शेल्टरों) में बिताया है. उनके पति कचरा बीनने का काम करते हैं, जिनकी कमाई पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करती है कि उस दिन काम मिलता है या नहीं. कुछ दिन परिवार इतना कमा लेता है कि पेट भर सके. बाकी के दिन उन्हें भूखे पेट ही सोना पड़ता है. रिश्तेदारों से हुए एक विवाद के कारण उन्हें उस रैन बसेरे को छोड़ना पड़ा जहाँ वह रह रही थीं, और अब वह वापस फुटपाथ पर ज़िंदगी गुज़ार रही हैं. बेघर परिवारों के लिए, थोड़ी बहुत मिलने वाली स्थिरता भी रातों-रात गायब हो सकती है.
लोकेशन 3- मूलचंद फ्लाईओवर के नीचे परिवार
मूलचंद फ्लाईओवर के नीचे एक और बस्ती चुपचाप अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी जी रही है. सोनी अपने पति के साथ उत्तर प्रदेश से दिल्ली आई थीं, जो एक दिहाड़ी मज़दूर हैं. वह कहती हैं कि उन्होंने इस ज़िंदगी को स्वीकार कर लिया है. यहां रहने वाले परिवारों ने कंक्रीट के इस ढांचे (फ्लाईओवर) के नीचे मोड़ने वाली चारपाइयाँ (खटिया) लाइन से बिछा रखी हैं. थोड़ी-बहुत मात्रा में चावल और आटा संभालकर रखा गया है. कामचलाऊ (अस्थायी) चूल्हों पर खाना पकाया जाता है. खंभों के बीच बंधी रस्सियों पर अभी-अभी धुले हुए कपड़े सूख रहे हैं. यह फ्लाईओवर उन्हें सीधी धूप और बारिश से तो बचा लेता है. लेकिन यह उन्हें आने वाले कल की अनिश्चितता से नहीं बचा सकता.
लोकेशन 4- एम्स के फुटपाथ पर भी है एक बस्ती
दिल्ली की सड़कों पर रहने वाला हर इंसान बचपन से ही बेघर नहीं था. 78 साल के कमलेश कभी कालकाजी में अपने पति और बच्चों के साथ एक फ्लैट में रहती थीं. फिर ज़िंदगी बदल गई. उनके पति गंभीर रूप से बीमार हो गए. इलाज का खर्च लगातार बढ़ता गया. कर्ज़ चुकाने के लिए उन्होंने अपना घर बेच दिया. पति की मौत के बाद उन्हें उम्मीद थी कि उनके बच्चे उनकी देखभाल करेंगे. लेकिन इसके बजाय उन्होंने कमलेश को बेसहारा छोड़ दिया. आज उनकी सारी जमापूंजी बस एक बैग के अंदर सिमट कर रह गई है, जिसमें कपड़ों के तीन जोड़े और एक फटी-पुरानी चादर है.
कोई सुरक्षा नहीं, बस गुजर रही जिंदगी
जब सरकारी आंकड़ों के नज़रिए से देखा जाए तो फुटपाथ पर रहने वालों के सामने आने वाले खतरे और भी ज़्यादा भयानक रूप ले लेते हैं. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के पोर्टल के अनुसार साल 2022 और 2023 के दौरान सड़कों पर रहने वाले 22,900 से अधिक बच्चों की पहचान की गई थी. इनमें से 12,000 से अधिक बच्चे अपने परिवारों के साथ सीधे सड़कों पर रह रहे थे, जबकि लगभग 10,000 बच्चे अपना दिन सड़कों पर बिताते थे और रात को पास की झुग्गियों या अस्थायी बस्तियों में लौट जाते थे. करीब एक हजार बच्चे ऐसे पाए गए जो पूरी तरह अकेले रह रहे थे. साल 2023 और 2024 में इन आंकड़ों में भारी गिरावट आई और पहचाने गए बच्चों की संख्या घटकर 3,466 रह गई. इनमें से 1,558 बच्चे अपने परिवारों के साथ सड़कों पर रह रहे थे, 1,736 बच्चे दिन सड़कों पर बिताकर रात को कहीं और लौट जाते थे और 172 बच्चे बिल्कुल अकेले थे.
इस भारी गिरावट के पीछे के कारण भले ही साफ न हों, लेकिन बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि कम पहचान होने का मतलब यह कतई नहीं है कि संकटग्रस्त बच्चों की संख्या कम हो गई है. अपराध के आंकड़े भी उतने ही परेशान करने वाले हालात बयां करते हैं. NCRB के 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, 16 से 17 साल की लड़कियां बलात्कार पीड़ितों में सबसे बड़ी संख्या (473 मामले) में थीं. 2020 और 2024 के बीच, इस आयु वर्ग में लगातार सबसे अधिक पीड़ित दर्ज किए गए. हत्या के मामलों में पिछले पांच वर्षों में से चार वर्षों में छह साल से कम उम्र की बच्चियां बाल हत्या की सबसे बड़ी शिकार रहीं, जो यह दर्शाता है कि बहुत छोटे बच्चे कितने असुरक्षित और संवेदनशील हालात में हैं. खुले फुटपाथों पर सोने वाले परिवारों के लिए, ये नंबर अब महज़ कागज़ी आंकड़े नहीं रह गए हैं. ये वे डर हैं, जिनके साए में वे हर रात जीते हैं.
इन बेबसों पर क्या कहती है सरकार
सरकार का कहना है कि संकटग्रस्त बच्चों और बेघर आबादी के लिए कई उपाय किए गए हैं. इनमें राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा संचालित 'बाल स्वराज' , ओपन शेल्टर, बाल देखभाल संस्थान, प्रायोजन कार्यक्रम, बाल संरक्षण योजनाओं के तहत आउटरीच सेवाएं और 'स्माइल' पुनर्वास कार्यक्रम शामिल हैं. NDTV से बात करते हुए दिल्ली के गृह मंत्री आशीष सूद ने कहा कि सरकार रैन बसेरे और नाइट शेल्टर मुहैया कराती है जहाँ भोजन और सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम मौजूद हैं. उन्होंने कहा कि शहर के सबसे संवेदनशील और कमज़ोर निवासियों की सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए प्रयास लगातार जारी हैं.
दिल्ली के ज़्यादातर बाशिंदों के लिए फुटपाथ महज़ चलने की एक जगह है. लेकिन हज़ारों अन्य लोगों के लिए, यह एक बेडरूम है, एक रसोई है, खेल का मैदान है, मैटरनिटी वार्ड (प्रसूति कक्ष) है और कभी-कभी तो वह जगह भी जहाँ ज़िंदगी का आखिरी सफर थमता है. दिल्ली के एक फुटपाथ से एक बच्ची के कथित अपहरण, बलात्कार और हत्या ने इस शहर को उस हकीकत का सामना करने पर मजबूर कर दिया है जिसे वह अक्सर अनदेखा करना चुनता है. यह त्रासदी सिर्फ एक अपराध के बारे में नहीं है. यह उन हज़ारों परिवारों के बारे में है जो हर दिन उन बुनियादी सुरक्षाओं के बिना जी रहे हैं जिन्हें आम लोग बेहद सामान्य मानकर चलते हैं.
जैसे-जैसे दिल्ली का विस्तार हो रहा है, निर्माण हो रहा है और आधुनिकीकरण हो रहा है, एक सवाल अब भी बना हुआ है. क्या कोई शहर खुद को वाकई समावेशी (सबको साथ लेकर चलने वाला) कह सकता है, जब उसके सबसे लाचार नागरिक सबकी नज़रों के सामने रहने के बावजूद अनदेखे, असुरक्षित और अनसुने रह जाते हैं?
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