- दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया पर जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शन के लिए बंद होने की अफवाहों को पूरी तरह से गलत बताया है
- जंतर-मंतर शांतिपूर्ण और अधिकृत विरोध प्रदर्शनों के लिए सक्रिय और मान्यता प्राप्त स्थल बना हुआ है
- सुप्रीम कोर्ट के आदेश और दिल्ली पुलिस के SOP के अनुसार यहां अधिकतम हजार लोगों के प्रदर्शन की अनुमति होती है
Jantar Mantar Delhi: नीट पेपर लीक के विरोध और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के बाद दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर चर्चा में है. अब सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि दिल्ली का जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शनों के लिए बंद कर दिया गया है. इस पर दिल्ली पुलिस ने सच्चाई बताई है.
दिल्ली पुलिस ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट 'एक्स'पर लिखा है कि "सोशल मीडिया पर अफवाहें फैल रही हैं कि जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शनों के लिए बंद कर दिया गया है. ये दावे पूरी तरह से झूठे, गुमराह करने वाले और बिना किसी तथ्य के हैं."
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Rumors are circulating on social media alleging that Jantar Mantar has been locked or closed for protests. These claims are entirely false, misleading, and devoid of facts.
— Delhi Police (@DelhiPolice) July 30, 2026
It is officially clarified that Jantar Mantar remains an active and authorized site for peaceful and…
दिल्ली पुलिस ने आगे लिखा कि यह आधिकारिक तौर पर साफ किया जाता है कि जंतर-मंतर शांतिपूर्ण और अधिकृत प्रदर्शनों के लिए एक सक्रिय और अधिकृत जगह बनी हुई है. माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश और उसके बाद दिल्ली पुलिस द्वारा जारी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) के अनुसार, इस जगह पर ज्यादा से ज्यादा 1,000 लोगों के एकत्र होने की इजाजत दी जा सकती है.
यह इजाजत संबंधित आयोजकों या व्यक्ति (या व्यक्तियों) द्वारा औपचारिक आवेदन देने पर सक्षम अधिकारी द्वारा दी जाती है, जो तय नियमों और शर्तों के पालन पर निर्भर करती है. नागरिकों को सलाह दी जाती है कि वे बिना सत्यापित की गई जानकारी पर विश्वास न करें और न ही उसे शेयर करें. सटीक व सही अपडेट के लिए सिर्फ आधिकारिक स्रोतों पर ही भरोसा करें.

jantar mantar locked or closed for protest rumors delhi police clarification Photo-IANS
FACT CHECK: प्रदर्शनकारी को गोली लगने का दावा भी झूठा
20 जुलाई 2026 को दिल्ली में सीजेपी प्रदर्शन के दौरान एक प्रदर्शनकारी को गोली लगी. सोशल मीडिया पर किए इस दावे को भी दिल्ली पुलिस ने झूठा बताया है दिल्ली पुलिस का कहना है कि मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शनकारी के कान के पास साधारण चोट पाई गई है, जो किसी कुंद वस्तु से लगी है. डॉक्टरों ने स्पष्ट किया है कि गोली लगने का कोई सबूत नहीं है. MLC रिपोर्ट में दाहिने कान के ट्रैगस के सामने एक कटा-फटा घाव दर्ज है, और चोट का कारण किसी कुंद चीज़ से लगी चोट बताया गया है. MLC की मेडिकल रिपोर्ट में गोली लगने के दावे की पुष्टि नहीं हुई है.
जंतर-मंतर दिल्ली का इतिहास
दिल्ली के दिल यानी कनॉट प्लेस के पास स्थित जंतर-मंतर को आज भले ही सब लोग आंदोलनों, धरनों और गूंजते नारों की जगह के रूप में जानते हों, लेकिन इसका अतीत विज्ञान और बेमिसाल वास्तुकला से जुड़ा हुआ है. ईंट और पत्थरों से बनी लाल रंग की ये विशाल आकृतियां असल में भारत की वैज्ञानिक सोच का शानदार उदाहरण हैं, जो वक्त के साथ देश की आवाज उठाने का सबसे बड़ा मंच बन गईं.
वैज्ञानिक प्रतिभा की ऐतिहासिक मिसाल
18वीं सदी की शुरुआत में यानी 1724 में जयपुर के राजा महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने इसका निर्माण कराया था. मुगल सम्राट मोहम्मद शाह के शासनकाल में बनी यह वेधशाला ग्रहों और नक्षत्रों की चाल की सटीक गणना करने के लिए तैयार की गई थी. राजा जयसिंह को खगोल विज्ञान और गणित से बेहद लगाव था, इसलिए उन्होंने धातुओं के बजाय ईंट-पत्थरों के विशाल यंत्र बनवाए ताकि मौसम का असर इनकी सटीकता पर न पड़े. दिल्ली के अलावा उन्होंने जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में भी ऐसी ही वेधशालाएं बनवाई थीं. संस्कृत के 'यंत्र' और 'मंत्र' शब्दों से मिलकर बने इस नाम का सीधा अर्थ समय और आकाशीय पिंडों की गणना करने वाले उपकरण से है.
यहां मौजूद सम्राट यंत्र दुनिया की सबसे बड़ी धूपघड़ी के रूप में सूर्य की छाया से वक्त की सटीक जानकारी देता है. वहीं जय प्रकाश यंत्र और राम यंत्र तारों व ग्रहों की स्थिति और ऊंचाई मापने के काम आते थे. यहां का मिश्र यंत्र इतना अनूठा है कि यह दिल्ली में रहते हुए भी दुनिया के अलग-अलग कोनों के समय का हिसाब बता देता था.
दिल्ली का जंतर मंतर कैसे बना आंदोलनों का नया ठिकाना?
जंतर-मंतर के प्रदर्शन स्थल बनने की कहानी भी काफी दिलचस्प है. 1980 के दशक तक दिल्ली में ज्यादातर विरोध-प्रदर्शन इंडिया गेट के पास स्थित बोट क्लब या अकबर रोड पर होते थे. लेकिन अक्टूबर 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में लाखों किसान अपने मवेशियों के साथ बोट क्लब पहुंच गए, जिससे पूरा लुटियंस जोन ठप हो गया. इस घटना के बाद सुरक्षा कारणों से बोट क्लब में रैलियों पर रोक लगा दी गई.
इसके बाद संसद भवन के करीब स्थित जंतर-मंतर को प्रदर्शनों के लिए चुना गया और 1993 से यह नई परंपरा शुरू हुई. समय के साथ यह जगह देश के सबसे बड़े राजनीतिक और सामाजिक बदलावों की गवाह बनी. वर्ष 2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे का जनलोकपाल आंदोलन यहीं से शुरू हुआ था, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था. इसके अलावा नर्मदा बचाओ आंदोलन और तमिलनाडु के किसानों के प्रदर्शनों ने भी इस जगह को राष्ट्रीय पहचान दिलाई.
साल 2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने ध्वनि प्रदूषण और कचरे की समस्या को देखते हुए यहां प्रदर्शनों पर रोक लगा दी थी और रामलीला मैदान जाने की सलाह दी थी. हालांकि, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों के विरोध जताने के अधिकार को सर्वोपरि मानते हुए इस रोक को हटा दिया और तय दिशा-निर्देशों के तहत शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति दे दी. आज जंतर-मंतर अपनी ऐतिहासिक वैज्ञानिक विरासत को समेटे हुए जनता की आवाज बुलंद करने का एक सशक्त माध्यम बना हुआ है.
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