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सैलाब में डूबती, रेंगती बेबस दिखी साइबर सिटी? मॉनसून की पहली ही बारिश ने खोली गुरुग्राम की पोल

गुरुग्राम का बार-बार होने वाला मॉनसून संकट यह साबित करता है कि कोई भी शहर सिर्फ कांच की ऊंची गगनचुंबी इमारतों, आलीशान कॉर्पोरेट पार्कों और करोड़ों रुपये के लक्जरी पेंटहाउस के दम पर ग्लोबल सिटी होने का दावा नहीं कर सकता.

सैलाब में डूबती, रेंगती बेबस दिखी साइबर सिटी? मॉनसून की पहली ही बारिश ने खोली गुरुग्राम की पोल
बारिश में चमकते गुरुग्राम का बुरा हाल क्यों हो जाता है. (PTI इमेज)
  • गुरुग्राम भारत के आर्थिक केंद्रों में से एक है, जो सकल घरेलू उत्पाद में 0.6 प्रतिशत का योगदान देता है
  • शहर में 250 फॉर्च्यून कंपनियों के कार्यालय हैं. यह आईटी, बैंकिंग और ऑटोमोबाइल उद्योग का मुख्य केंद्र है
  • मॉनसून में बुनियादी ढांचे की विफलताओं के कारण गुरुग्राम में गंभीर जलभराव और यातायात जाम हो जाता है
नई दिल्ली:

वैश्विक पटल पर भारत के चमकते 'मिलेनियम सिटी' के रूप में पहचान रखने वाला गुरुग्राम आज एक बेहद चौंकाने वाले आर्थिक विरोधाभास का सामना कर रहा है. राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली से महज 30 किलोमीटर दक्षिण में स्थित यह शहर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) का एक प्रमुख सैटेलाइट शहर और वित्तीय केंद्र है. गुरुग्राम अकेले भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 0.6% का योगदान देता है, जो लगभग 2 लाख करोड़ की भारी-भरकम राशि है. इसके साथ ही, हरियाणा राज्य के कुल राजस्व का करीब 50% से 60% हिस्सा इसी अकेले शहर से आता है. प्रति व्यक्ति आय के मामले में यह चंडीगढ़ और मुंबई के बाद पूरे भारत में तीसरे स्थान पर है.

'फॉर्च्यून 500' कंपनियों में से लगभग 250 के दफ्तर गुरुग्राम में

इस शहर का कॉर्पोरेट फुटप्रिंट बेहद विशाल है, जहां 25,000 से अधिक कॉर्पोरेट कार्यालय मौजूद हैं. इनमें दुनिया की प्रतिष्ठित 'फॉर्च्यून 500' कंपनियों में से लगभग 250 (50%) के दफ्तर शामिल हैं. सूचना प्रौद्योगिकी (IT), बैंकिंग, फाइनेंस और बीपीओ (BPO) का एक महत्वपूर्ण केंद्र होने के साथ-साथ यह शहर गुरुग्राम-मानेसर-बावल ऑटोमोबाइल बेल्ट से भी जुड़ा है, जो देश के सबसे बड़े ऑटोमोटिव निर्माण बेल्ट में से एक है. यहां बड़ी संख्या में कारों, मोटरसाइकिलों, स्कूटरों और उनके सहायक कलपुर्जों का उत्पादन किया जाता है.

PTI फोटो.

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सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट से लेकर टेलीकॉम उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक सामान और लक्जरी रियल एस्टेट तक, गुरुग्राम का 'डीएलएफ साइबर सिटी' वैश्विक स्तर के प्रीमियम शहरों को टक्कर देता है. इसके रियल एस्टेट की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 2024 में 'डीएलएफ कैमेलियास' में एक पेंटहाउस रिकॉर्ड 190 करोड़ में बिका था. इसके अलावा, 'हुरुन इंडिया रिच लिस्ट' दर्शाती है कि गुरुग्राम के 23 अरबपतियों के पास 1,000 करोड़ से अधिक की व्यक्तिगत संपत्ति है, जबकि यहाx एक साधारण फ्लैट की औसत कीमत भी 1 करोड़ है.

बारिश गिरते ही खुल जाती है गुरुग्राम के बुनियादी ढांचे की पोल

लेकिन जैसे ही आसमान से बारिश की बूंदें गिरती हैं, यह आधुनिक आर्थिक महाशक्ति बुनियादी ढांचे की विफलताओं के कारण पूरी तरह घुटनों पर आ जाती है. महाभारत कालीन ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाला यह क्षेत्र, जिसके बारे में मान्यता है कि राजा युधिष्ठिर ने इस गांव को प्राचीन कुरु साम्राज्य के हिस्से के रूप में अपने गुरु द्रोणाचार्य को गुरुदक्षिणा में दिया था, मॉनसून के आते ही हर साल एक खौफनाक शहरी दुःस्वप्न (Urban Nightmare) में बदल जाता है.

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इंफ्रास्ट्रक्चर का सिंकहोल: जुलाई 2026 का संकट

शहर की इस बदहाल व्यवस्था की पोल एक बार फिर 7 जुलाई, 2026 को खुल गई, जब नरसिंहपुर इलाके के पास राष्ट्रीय राजमार्ग-48 (NH-48) का एक मुख्य हिस्सा धंस गया. सड़क के इस तरह अचानक धंसने से इफ्को चौक (IFFCO Chowk) से लेकर नरसिंहपुर तक लगभग 8 से 10 किलोमीटर लंबा भीषण ट्रैफिक जाम लग गया. इस संकट के कारण जिला प्रशासन और ट्रैफिक पुलिस को तुरंत मौके पर पहुंचकर जयपुर की ओर जाने वाले वाहनों के लिए आपातकालीन रूट डायवर्जन (Route Diversion) जारी करना पड़ा.

इस विफलता ने एक बार फिर करदाताओं और कॉर्पोरेट दिग्गजों के मन में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या जनता का गाढ़ी कमाई का पैसा पानी में बहाया जा रहा है? साल 2016 में लगे कुख्यात "गुरुजाम" के बाद, जिसने पूरे शहर को करीब 20 घंटे तक बंधक बनाए रखा था, गुरुग्राम प्रशासन ने पिछले नौ वर्षों में (2025 तक) केवल ड्रेनेज इंफ्रास्ट्रक्चर (जल निकासी व्यवस्था) को सुधारने के नाम पर 503 करोड़ की भारी-भरकम राशि खर्च की.

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जनता के गुस्से को बढ़ाने वाली बात यह है कि प्रशासन की 105 करोड़ की बिल्कुल नई बुनियादी ढांचा संपत्ति भी पहली ही बारिश में पूरी तरह फेल साबित हुई. गुरुग्राम मेट्रोपॉलिटन डेवलपमेंट अथॉरिटी (GMDA) ने हाल ही में 4.3 किलोमीटर लंबे 'लेग-4' स्टॉर्मवॉटर ड्रेन (बरसाती नाले) को शुरू किया था, जिसे दिल्ली-एनसीआर में मॉनसून की शुरुआत के साथ ही चालू किया गया। इसे विशेष रूप से 'बादशाहपुर ड्रेन', जो शहर का मुख्य बरसाती नाला है और जिस पर लंबे समय से दक्षिणी गुरुग्राम को डुबाने का ठीकरा फोड़ा जाता रहा है, के दबाव को कम करने के लिए तैयार किया गया था. लेकिन, कुल मिलाकर ड्रेनेज पर हुआ खर्च 600 करोड़ के पार जाने के बावजूद शहर एक बार फिर जलमग्न हो गया.

महाजाम का विश्लेषण: रोजाना क्यों बंधक बनता है गुरुग्राम?

'लोकलसर्कल्स' (LocalCircles) द्वारा किए गए सर्वेक्षणों के अनुसार, गुरुग्राम में दैनिक यात्रा करना एक थका देने वाली परीक्षा बन चुका है. साल 2023 के एक सर्वे में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि गुरुग्राम के 96% दैनिक यात्रियों को जलभराव के कारण "यातायात में सामान्य से बहुत अधिक समय बिताना पड़ता है", जबकि इसकी तुलना में दिल्ली में यह आंकड़ा 88% और नोएडा में 66% है. इसके अलावा, 2024 के एक अन्य लोकलसर्कल्स अध्ययन में पाया गया कि 86% निवासी बार-बार होने वाले जलभराव से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं, जबकि 62% लोगों ने नगर निगम की मॉनसून तैयारियों पर गहरा असंतोष व्यक्त किया.

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नियमित रूप से डूबने वाले प्रमुख हॉटस्पॉट

  • सोहना रोड
  • सुभाष चौक
  • उद्योग विहार
  • गोल्फ कोर्स एक्सटेंशन रोड
  • नरसिंहपुर
  • सेक्टर 10A और सेक्टर 48

यातायात जाम के मुख्य कारण

बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तरों और बड़े रिटेल बाजारों के कारण रोजाना हजारों कामकाजी पेशेवर दिल्ली, गुरुग्राम और नोएडा के बीच आवागमन करते हैं. जब सेक्टरों की अंदरूनी सड़कें पानी में डूब जाती हैं, तो पूरा ट्रैफिक मुख्य सड़कों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर आ जाता है, जिससे उनकी क्षमता जवाब दे देती है. सड़कों के किनारों पर पानी जमा होने से गाड़ियां बीच में चलने लगती हैं, जिससे 'बॉटलनेक' बन जाता है और गाड़ियों की रफ्तार रेंगने पर मजबूर हो जाती है. राजमार्ग से बाहर निकलने वाले मुख्य रास्तों (Exits) पर पानी भरे होने के कारण वाहन अंदरूनी सेक्टरों में नहीं जा पाते. इससे पीछे चल रहे वाहनों की लंबी कतारें लग जाती हैं और पूरा हाईवे जाम हो जाता है.

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शहर के डूबने का कारण

गुरुग्राम की यह संरचनात्मक कमजोरी त्रुटिपूर्ण भौगोलिक स्थिति और प्रशासनिक लापरवाही दोनों का मिलाजुला परिणाम है.यह शहर प्राकृतिक रूप से एक निचले (कटोरे जैसे) इलाके में बसा है. जब भी भारी बारिश होती है, तो आस-पास की अरावली की पहाड़ियों से बरसाती पानी बेहद तेज गति से नीचे शहरी मैदानों की तरफ आता है. पहाड़ियों से आने वाला यह भारी पानी सीधे बादशाहपुर ड्रेन में पहुंचता है. मूसलाधार बारिश के दौरान, पानी की मात्रा इस नाले की अधिकतम जल-ले जाने की क्षमता से कहीं अधिक हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप पानी ओवरफ्लो होकर मुख्य सड़कों और रिहायशी कॉलोनियों में भर जाता है.

स्पष्ट ऐतिहासिक आंकड़ों और हर साल मिलने वाली चेतावनियों के बावजूद, प्रशासनिक निकाय समय पर नालियों की व्यापक गाद निकालने (Desilting), गड्ढों को भरने और उच्च क्षमता वाले स्वचालित पंपों को तैनात करने जैसे महत्वपूर्ण काम करने में विफल रहते हैं. उदाहरण के लिए, साल 2020 में गुरुग्राम नगर निगम ने जलभराव के 79 अति-संवेदनशील बिंदुओं की पहचान की थी और उनके स्थायी समाधान की योजना बनाई थी. हालांकि, जमीन पर ज्यादातर काम केवल 'टैक्टर-माउंटेड पंप' जैसे अस्थायी और कामचलाऊ उपायों के भरोसे छोड़ दिए गए, जो पानी भरने के बाद ही काम करना शुरू करते हैं.

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आर्थिक और मानवीय नुकसान की भारी कीमत

नागरिक बुनियादी ढांचे की लगातार हो रही अनदेखी सीधे तौर पर शहर के आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने को भारी नुकसान पहुंचा रही है. बुनियादी ढांचे की बार-बार होने वाली विफलता के कारण बड़ी टेक कंपनियों और बहुराष्ट्रीय निगमों को आपातकालीन 'वर्क फ्रॉम होम' लागू करना पड़ता है, जिससे उत्पादकता प्रभावित होती है.

सड़कों पर जमा गहरे पानी के कारण हर साल हजारों निजी और वाणिज्यिक वाहन खराब हो जाते हैं, जिससे जनता पर मरम्मत और इंश्योरेंस का भारी वित्तीय बोझ पड़ता है. जलभराव वाली सड़कें ऑटो-रिक्शा चालकों, कैब ऑपरेटरों और स्थानीय दुकानदारों की दैनिक आजीविका को सीधे तौर पर ठप कर देती हैं, जो दैनिक आवाजाही और ग्राहकों पर निर्भर हैं. कई किलोमीटर लंबे जाम में रेंगते वाहनों के इंजन हर साल लाखों लीटर कीमती ईंधन फूंक देते हैं, जिससे प्रदूषण और बढ़ता है. साथ ही, पानी के नीचे छिपे गड्ढे कई गंभीर नागरिक दुर्घटनाओं और चोटों का कारण बनते हैं.

ये कैसा 'ग्लोबल सिटी'

गुरुग्राम का यह बार-बार होने वाला मॉनसून संकट यह साबित करता है कि कोई भी शहर सिर्फ कांच की ऊंची गगनचुंबी इमारतों, आलीशान कॉर्पोरेट पार्कों और करोड़ों रुपये के लक्जरी पेंटहाउस के दम पर "ग्लोबल सिटी" होने का दावा नहीं कर सकता. केवल भौतिक सड़कों को चौड़ा करने से यह समस्या कभी हल नहीं होगी. जब तक प्रशासनिक इच्छाशक्ति के साथ एक दूरदर्शी सिविल इंजीनियरिंग ओवरहॉल और दीर्घकालिक जल निकासी प्रबंधन प्रणाली को लागू नहीं किया जाता, तब तक यह मिलेनियम सिटी अपनी ही व्यवस्था की लापरवाही के पानी में डूबती रहेगी.
 

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