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47 साल पहले रिलीज हुआ गाना, सचिन ने बताया था पसंदीदा नंबर-1, छिपा है जीवन का फलसफा

सचिन तेंदुलकर का पसंदीदा गाना मास्टर ब्लास्टर की सोच, जीवन के प्रति नजरिया और जिदंगी को सकारात्मक और खूबसूरत अंदाज में जीने की सीख भी देता है

47 साल पहले रिलीज हुआ गाना, सचिन ने बताया था पसंदीदा नंबर-1, छिपा है जीवन का फलसफा

क्रिकेटर जहां मैदान पर बहुत ही तनावपूर्ण और व्यस्त जीवन जीते हैं, तो वे सुकून तलाशने के लिए संगीत की मदद लेते हैं. और अक्सर स्टेडियम के लिए रवाना होने के दौरान खिलाड़ियों को टीम बस में गाने सुनते देखा जा सकता है. यह सिलसिला कई दशकों से चला आ रहा है. और अगर यह कहा जाए कि इस मामले में सचिन तेंदुलकर ने अलग ही पहचान बनाई, तो गलत नहीं ही होगा. सचिन टीम बस में ज्यादातर समय वॉकमैन लगाकर गाने सुनते थे. और नियमित अंतराल पर उनकी तस्वीरें आती रहती थीं. बाद में सचिन तेंदुलकर ने इंटरव्यू में कई बार अपने पसंदीदा गाने के बार में डिटेल से बताया. चलिए आपको सचिन तेंदुलकर के  उस गाने के बारे में बताते हैं, जिसे उन्होंने अपना पसंदीदा नंबर-एक बताया था. 

किशोर कुमार की जयंती पर बताया था 

दरअसल सचिन तेंदुलकर ने कुछ साल पहले किशोर कुमार की 94वीं जयंती पर अपना यह पसंदीदा गाना साझा किया था. तब सचिन ने दिग्गज गायक किशोर कुमार को श्रद्धांजलि देने के लिए ट्विटर का सहारा लिया. उन्होंने अपने फैंस से भी इस गायक के उनके पसंदीदा गाने साझा करने को कहा.सचिन ने तब छोटा सा वीडियो रिकॉर्ड किया और उसे ट्विटर पर पोस्ट किया था. और इस वीडियो में उन्होंने गाना बजाया था, "आने वाला पल जाने वाला है, हो सके तो इसमें जिदंगी बिता दो, पल ये ये जाने वाला है." निश्चित तौर पर यह गाना सचिन के नजरिये को बयां करने के साथ ही जिंदगी को सकारात्मक तरीके से जीने का दर्शन देता है.' 

गाने के पीछे का दर्शनशास्त्र

गाने के बोल और उनका अर्थ

“आने वाला पल जाने वाला है, हो सके तो इसमें जिंदगी बिता दो, पल जो यह जाने वाला है...”

यह गीत वर्तमान पलों के महत्व के बारे में बताता है. कवि कह रहा है कि जो पल अभी आया है, वह तुरंत बीतने वाला भी है. इसलिए अगर जिंदगी का असली आनंद लेना है, तो अतीत के पछतावे और भविष्य की चिंता से बाहर निकलकर इसी वर्तमान पल में जीना सीखो. भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में वर्तमान में जीने की बात कही है. ऐसे में यह गीत बहुत बड़ा संदेश देता है  और बताता है कि सभी को भूतकाल पर अफसोस जताने और भविष्य की चिंता में ज्यााद डूबे बिन वर्तमान का पूरा लुत्फ उठाना चाहिए.  

गाने का गहरा दर्शनशास्त्र 

यह गाना भारतीय और वैश्विक दर्शन के कई महत्वपूर्ण सिद्धांतों को बहुत ही सरल शब्दों में समेटे हुए है. वास्तव में एक आम आदमी को इतनी सरलता और सहजता से इसका सार समझाने के लिए इससे आसान शब्दावाली कोई नहीं हो सकती. इस गीत को लिखने के लिए गुलजार बधाई के पात्र हैं और इसकी यूएसपी यह है कि इस गाने की हर दौर में प्रासंगिकता बनी रहेगी. बहरहाल आप इसके पीछे छिपे सिद्धांतों के बारे में जानिए, जो जीवन जीने की कला और हर हालात में सकारात्मक मनोदशा रखने के बारे में बताता है. 

अस्थिरता का सिद्धांत 

बौद्ध दर्शन और भारतीय अध्यात्म का एक मूल नियम है:  अनित्य (सब कुछ बदलने वाला है). यानी संसार में कुछ भी स्थिर नहीं है, जो पल अभी है, वह अगले ही पल अतीत बन जाता है. और इस गाने को लिखने वाले गुलजार साहब ने इसी सत्य को बहुत ही सहजता और सरलता के साथ प्रस्तुत किया है:

'एक बार वक्त से लम्हा गिरा कहीं, वहां दास्तान मिली, लम्हा कहीं नहीं'

यानी समय के दरिया में एक छोटा सा पल कहां गिर जाता है, पता ही नहीं चलता. वो लम्हा भले ही गायब हो जाता है, लेकिन पीछे अपनी एक पूरी कहानी (दास्तान) छोड़ जाता है. लेखक ने बताया है कि खासकर वर्तमान में समय की तूफानी गति और समय रूपी समुद्र में कोई भी छोटे या पड़े पल भुला दिए जाते हैं, लेकिन इनके भीतर छिपी कहानियों को लोग हमेशा याद करते हैं. और ये  किस्से और कहानियां तभी असर छोड़ पाती हैं, जब लोग वर्तमान में जीते हैं. 

आधुनिक मनोविज्ञान और प्राचीन वेदांत दोनों ही इस बात पर जोर देते हैं कि इंसान या तो भूतकाल की यादों में दुखी रहता है या भविष्य की अनिश्चितताओं से डरा रहता है. वह केवल वर्तमान से कट जाता है. यह गाना हमें यही सीख देता है कि जीवन न तो बीता हुआ कल है और न आने वाला कल, जीवन केवल यह 'वर्तमान क्षण' है. अगर इसे पूरी शिद्दत से जी लिया, तो समझो जिंदगी जी ली. लेकिन जितनी बात यह कहने में आसान है, व्यावहारिक रूप से अमल कर पाना बहुत ही मुश्किल होता है. समय और हालात ने आदमी को ऐसे जकड़ा हुआ है कि वह भूत के साथ भविष्यकाल में जकड़ा ही रहता है. बहरहाल, कोशिशों में भी सभी कुछ छिपा है और गाना जोर से कहता है कि आप वर्तमान में जीवन जिएं. 

'थोड़ा सा हंसा के, थोड़ा सा रुला के, पल ये भी जाने वाला है'

गाना मुखड़े से लेकर अंतरे और अपन समाप्ति की यात्रा को नियमित अंतराल पर वर्तमान के संदर्भ को नहीं ही छोड़ता. और यह साफ तौर पर बताता है कि जीवन जो है, वह सुख-दुख और उतार-चढ़ाव के भावों से भरा हुआ है. और यह ये भी बता है कि हालात हमेशा ही एक  जैसे नहीं ही रहते. और जीवन में कुछ स्थायी है, तो वह परिवर्तन है, जो लगातार होता रहता है और हर किसी को इसे स्वीकारने के साथ ही इससे तालमेल बैठाना आना चाहिए.. यह गाना हमें सिखाता है कि न तो सुख में बहुत ज्यादा अहंकार में डूबना चाहिए और न ही दुख में पूरी तरह टूटना चाहिए, क्योंकि यह पल भी गुजर जाएगा. और सचिन तेंदुलकर ने भी कुछ ऐसा कहकर अपने चाहने वालों को प्रेरित करने की कोशिश की है. 

“एक बार यू मिली मासूम सी कली, खिलते हुए कहां पुष्पश में चली, देखा तो यही है, ढूंढा तो नहीं है...”

यह पंक्तियाँ बचपन, जवानी या जीवन के उन खूबसूरत पड़ावों की ओर इशारा करती हैं जो बहुत तेजी से आगे निकल जाते हैं. हम जब तक उन्हें मुट्ठी में बंद करना चाहते हैं, तब तक वे रेत की तरह फिसल चुके होते हैं. यह जीवन की अनिश्चितता और खूबसूरती दोनों का अहसास कराता है.

निष्कर्ष

"आने वाला पल जाने वाला है"..यह सिर्फ एक फिल्मी गाना नहीं बल्कि एक जीवन-दर्शन  है. आर.डी. बर्मन का सुकून देने वाला संगीत, किशोर कुमार की जादुई और भावुक आवाज, तथा गुलजार साहब के दार्शनिक बोल मिलकर इसे एक ऐसा मास्टरपीस बनाते हैं जो हर दौर के इंसान को यह याद दिलाता रहता है कि जिंदगी बेहद छोटी है, इसलिए हर पल को प्यार से जी लो.

गाने के बारे में जानकारी

यह गाना साल 1979 में रिलीज हुई गोलमाल फिल्म  का है, जिसका निर्देशन ऋषिकेश मुखर्जी ने किया था, जबकि  संगीत दिया था दिवंगत राहुल देव बर्मन ने. वास्तव में यह गाना फिल्म से कहीं बड़ा हिट साबित हुआ था, जिसमें मुख्य भूमिका अमोल पालेकर और बिंदिया गोस्वामी ने निभाई थी. इस गाने को फिल्म फेयर जैसे मंच ने भी स्वीकार किया और गुलजार को साल 1980 में सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था. यूं तो इस साल गुलजार ने कई गाने लिखे, लेकिन जो चर्चा और प्रशंसा इस गाने को मिली, वह बमुश्किल ही किसी को मिली. और इससे ऊपर इसकी प्रासंगिकता ऐसी रही, जो किसी भी दौर में हर पीढ़ी को सोचने पर मजबूर करती रहेगी. ठीक सचिन तेंदुलकर की तरह. 

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