- तिलक वर्मा का दिलीप ट्रॉफी सेमीफाइनल में प्रदर्शन उनके टेस्ट दावे के लिए एक मजबूत संकेत है.
- 116 और 51 रनों की दो नाबाद पारियां, दो अलग परिस्थितियों में खेली गई और टेस्ट के मुफीद हैं.
- इन पारियों ने टेस्ट क्रिकेट के दरवाजे पर तिलक की दस्तक पहले से कहीं ज्यादा जोरदार कर दी है.
चार साल पहले जब तिलक वर्मा केवल 19 साल के थे तब रोहित शर्मा ने उनके खेल को देखते दावा किया था कि वो जल्द ही भारत के लिए सभी फॉर्मेट में क्रिकेट खेलेंगे. उनकी तकनीक और शॉर्ट सेलेक्शन को देख कर रोहित मुग्ध हो गए थे. तिलक वर्मा तब से लगातार अपने प्रदर्शन की छाप छोड़ रहे हैं. टी20 क्रिकेट में उन्होंने टीम इंडिया में अपनी मजबूत जगह बना ली है. वनडे क्रिकेट उन्होंने अभी बहुत कम खेला है पर जिस तरह से वो घरेलू क्रिकेट के लंबे फॉर्मेट में प्रदर्शन कर रहे हैं इससे यह लगने लगा है कि अब टेस्ट क्रिकेट की बारी है. टेस्ट क्रिकेट की उनकी यह दावेदारी दो दिन पहले दिलीप ट्रॉफी के दूसरे सेमीफाइनल से और भी पक्की हुई है.
दिलीप ट्रॉफी के इस दूसरे सेमीफाइनल मुकाबले में तिलक वर्मा ने नॉर्थ जोन के खिलाफ नाबाद 116 और नाबाद 51 रनों की जोरदार पारियां खेलकर न केवल अपनी टीम साउथ जोन को जीत दिलाई बल्कि भारतीय टेस्ट टीम के दरवाजे पर भी जबरदस्त दस्तक दी है.
तिलक वर्मा की इन दोनों पारियों की सबसे बड़ी खासियत उनका अंदाज रहा. पहली पारी में पांच विकेट पर 80 रन से टीम को उबारते हुए शतक जमाना और फिर दूसरी में 181 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए एंकर रोल में पिच पर बने रहना. करीब 55 के फर्स्ट क्लास औसत के साथ तिलक वर्मा का ये प्रदर्शन उनके टेस्ट दावे को मजबूत करता है.
तिलक वर्मा के सामने दोनों पारियों में दो अलग अलग परिस्थियां थीं लेकिन दोनों ही मौके पर उन्होंने शानदार पारियां खेलते हुए यह दिखाया कि उनमें टेस्ट टीम में जगह पाने की वो सभी क्षमता है जिसकी दरकार होती है.
दूसरी पारी में तिलक ने शुरुआत में जोखिम नहीं लिया और 28 गेंदों में 10 रन बनाए. सेट होने के बाद उन्होंने अपने शॉट्स खोले और स्थिति के मुताबिक बल्लेबाजी की.

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अब टेस्ट दावेदारी कितनी मजबूत?
तिलक का फर्स्ट-क्लास औसत करीब 55 है और दिलीप ट्रॉफी में इस प्रदर्शन ने रेड बॉल क्रिकेट में उनकी क्षमता को फिर सामने रखा है. अब लगातार घरेलू प्रदर्शन उन्हें टेस्ट चयन की दौड़ में और आगे ले जा सकता है. क्या टी20 में साख जमा चुके तिलक वर्मा अब टेस्ट क्रिकेट के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं. इस सवाल का दिलीप ट्रॉफी में 116 और नाबाद 51 रन की उनकी पारी ने जवाब दिया है और रेड बॉल के इस खेल में उनकी दावेदारी को और मजबूत कर दिया है.
दरअसल, भारतीय क्रिकेट में किसी बल्लेबाज का टेस्ट टीम तक पहुंचना सिर्फ बड़े स्कोर बनाने से ही तय नहीं होता है. यहां ये भी देखा जाता है कि वो मुश्किल परिस्थितियों में किस तरह संयम और भरोसा दिखाते हुए परिस्थितियों को अपनी टीम के मुताबिक ढालता और जीत दिलाता या जीत की दहलीज तक ले जाता है. यानी उसका जुझारू होना एक बड़ी योग्यता माना जाता है. साथ ही क्रीज पर उसका टिकना और मैच की जरूरत के हिसाब से अपनी बल्लेबाजी का तरीका बदलना भी उतना ही अहम किरदार अदा करता है. तिलक वर्मा ने दिलीप ट्रॉफी के इस सेमीफाइनल में इन सभी सवालों का अच्छा जवाब दिया है.

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विकेट पर टिकने में महारथ
जब साउथ जोन ने पहली पारी में केवल 80 रन बनाने में अपने पांच विकेट गंवा दिए थे तब तिलक ने एक छोर पर जमते हुए पहले तो नॉर्थ जोन के 195 रन की पहली पारी के स्कोर को पार करने में अहम भूमिका निभाई. फिर अंत तक आउट हुए बगैर 116 रन बनाए. यह तिलक की पारी ही थी कि साउथ जोन 312 रनों का अंबार लगाते हुए पहली पारी के आधार पर 117 रनों की अहम बढ़त लेने में कामयाब रहा. यही वजह है कि दूसरी पारी में 297 रन बनाने के बावजूद तिलक की टीम के सामने जीत के लिए केवल 181 रनों का लक्ष्य था.
साउथ जोन ने अच्छी शुरुआत की और 64 रन बनने तक उसका कोई विकेट नहीं गिरा लेकिन फिर अगले एक रन बनने के दौरान ही दो बल्लेबाज आउट हो गए. तब तिलक पिच पर आए. उस वक्त जीत के लिए केवल 116 रन चाहिए थे. यहां उन्हें तेज शतक की जरूरत नहीं थी. जरूरत थी पारी को संभालने की, विकेट न गिरने देने की और टीम को नॉर्थ जोन पर जीत दिलाने की. तिलक ने बिल्कुल वही किया. अंतिम 116 रनों में से 51 रन बनाए और टीम को 195 रनों के टारगेट तक पहुंचाया.

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संयम, एकाग्रता तिलक का मजबूत हथियार
यानी चार दिन के इस मुकाबले में तिलक ने दो बिल्कुल अलग तरह की बल्लेबाजी दिखाई और यही बात उनके टेस्ट दावे को दिलचस्प बनाती है.
उनकी पहली पारी संकटमोचक की रही तो दूसरी में एंकर भूमिका निभाई. अपनी इन दोनों पारियों के दौरान तिलक ने दिखाया कि वो पिच पर संयमित रहते हुए विपक्षी आक्रमण को किस तरह कुंद करने में सक्षम हैं. दूसरी पारी तो और भी समझदारी से भरी थी. लक्ष्य छोटा था. ऐसे में कई बल्लेबाज उसे तेजी से पाने की कोशिश में लग जाते हैं और यहीं पर कई बार छोटा लक्ष्य भी घातक साबित होता है. तिलक ने पिच पर आने के बाद शुरुआती 28 गेंदों में केवल 10 रन ही बनाए. यही उनकी इस पारी को अहम बनाता है क्योंकि शुरू में जब लगातार दो विकेट गिरे तो उन्होंने पहले यह पढ़ना चाहा कि पिच किस तरह का बर्ताव कर रही है. फिर जैसे-जैसे वह सेट होते गए, उन्होंने अपने शॉट्स खेलने शुरू किए और जीत दिलाई.

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तिलक की तरकश में बेहतरीन शॉर्ट्स
तिलक की इस पारी में ऑन ड्राइव, रिवर्स स्वीप, पैडल स्वीप जैसे शॉट भी देखने को मिले. मतलब साफ है कि जब वो एक बार सेट हो गए तो उन्होंने पहले पारी को नियंत्रित किया और फिर गेंदबाजों पर हावी होते हुए दबाव भी बनाए. टेस्ट क्रिकेट में लंबी पारियां खेलने वाले क्रिकेटरों में यह गुण सबसे अधिक देखने को मिलता है.
इस प्रदर्शन से तिलक ने ये भी दिखाया कि वो केवल टी20 के बल्लेबाज नहीं हैं. टी20 में तिलक अपनी आक्रामक बल्लेबाजी के लिए जाने जाते हैं, तेजी से रन जुटाते हैं और जब जरूरत पड़े तो वो गेंदबाजी भी कर सकते हैं. लेकिन टेस्ट क्रिकेट में टी20 के ठीक विपरीत घंटों पिच पर बिना रन बनाए भी बिताना पड़ सकता है. यहीं पर एक क्रिकेटर की तकनीक और एकाग्रता सबसे जरूरी हथियार में से हैं. कई बार शतक या अर्धशतक से जरूरी 25-30 रन बनाकर टीम को संकट से उबारना पड़ता है. तिलक ने बेंगलुरु में अपनी बल्लेबाजी के दौरान यही दिखाया है.
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