अभी हाल ही में 19 जून को स्कॉटलैंड में रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग' में 'महानायक' महर्षि सुश्रुत (लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व 'शल्य चिकित्सा के जनक' और 'प्लास्टिक सर्जरी के पितामह' माना जाता है, काशी (वाराणसी) में जन्मे इस महान ऋषि ने 2600 साल पहले कटी हुई नाक और कान जोड़ने जैसी जटिल सर्जरी सफलतापूर्वक की थी) की प्रतिमा का अनावरण किया गया. जरा सोचिए कि अगर देश में "महानायक" के रूप में ऐसे लोग स्थापित होते, तो आज भारतीय मनोदशा कैसी होती और हम एक समाज के रूप में कैसे और कहां खड़े होते, यह सहज ही समझा जा सकता है. स्थापित होने से मतलब शहर के चौराहों, गलियों और मुख्य केंद्रों पर मूर्ति के साथ व्याख्या कर बच्चों को बताया जाता कि आखिर महर्षि सुश्रुत होने के मायने क्या हैं और इन्हें क्यों महानायक के रूप में संबोधित करना चाहिए?
बात यह है कि आज भी हमें "आंखों की इंद्रियों की तुष्टि" कहीं ज्यादा आनंद प्रदान करती है. पठन-पाठन से ज्यादा! यह ज्यादातर मौकों पर भावनाओं में बहकर तर्कों की कसौटी और न्याय को चीरता आगे निकल जाता है! और आयरलैंड के खिलाफ खत्म हुई दो मैचों की सीरीज के दोनों मैचों से वैभव सूर्यवंशी को XI से बाहर रखने का मामला भी कुछ ऐसा है. टीम इंडिया की हार के बाद मानो पूरी चर्चा टीम के प्रदर्शन से इतर वैभव सूर्यवंशी पर ही केंद्रित हो गई है. हर दूसरे पूर्व क्रिकेटर का बयान वैभव के न खिलाने को लेकर है. फैंस और सोशल मीडिया की तो बात ही छोड़ दीजिए. वहीं, टीम इंडिया सीरीज क्या हारी, तमाम विद्वान और पंडित "तलवारें" निकालकर वैभव सूर्यवंशी के पक्ष में खड़े हो गए! पानी पी-पीकर गौतम गंभीर को कोसने ने एक नया ही स्तर हासिल कर लिया. हार के लिए नहीं, बल्कि वैभव सूर्यवंशी को खत्म हुई सीरीज में मौका न देने के लिए.
सोशल मीडिया के पोस्टर सहित चैनल प्रोमो में पहली बार कप्तान बने श्रेयस अय्यर से भी बड़ा चेहरा! सूर्यवंशी मैच में नहीं खेले, लेकिन मैच के दौरान हर दस मिनट ब्रेक के बाद उनके नाम के साथ प्रोमो के साथ स्क्रीन पर 'धुरंधर' उपस्थित थे. दुनिया भर के करोड़ों फैंस ने दे दनादन वैभव के लिए 399 रुपये का सब्स्क्रिप्शन सीरीज शुरू होने से पहले ही करा लिया था. और जब सूर्यवंशी को मौका नहीं ही मिला, तो टीम इंडिया को मिली हार के बाद तमाम सोशल मीडिया धुरंधरों के निशाने पर हेड कोच गौतम गंभीर आ गए. आखिर गौतम गंभीर कहां गलत हैं? चलिए करीब तीन महीने पीछे का रुख करते हैं.
करीब तीन महीने पहले ही 8 मार्च को करोड़ों भारतीय फैंस भारत की टी20 विश्व कप की खिताबी जीत पर झूम रहे थे. हमारी यादाश्त इतनी छोटी क्यों हो चली है? क्या हम बहुत ज्यादा कृतघ्न हो चले हैं? क्या हमें हकदार लोगों को श्रेय देना नहीं आता? या हम बहुत ज्यादा उतावले हैं? या "तस्वीरें" हमारी इंद्रियों को ज्यादा तुष्टि प्रदान करती हैं? करीब तीन महीने पहले ही यह संजू सैमसन ही थे, जिन्होंने मेगा टूर्नामेंट मे आखिरी तीन पारियों में सुपर से ऊपर की पारियों खेलते हुए टीम इंडिया को विश्व कप जिताकर प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट बने थे? किस मुंह और किस तर्क से संजू सैमसन को बाहर बैठा सकते थे? अभिषेक शर्मा भी विश्व कप विजेता टीम का हिस्सा थे? और जब लंबे ब्रेक के बाद कोई सीरीज आ रही थी, तो इस अति प्रतिस्पर्धात्मक पेशे (जहां सप्ताह भर में समीकरण बदल जाते हैं) में कैसे टॉप ऑर्डर बल्लेबाज को बाहर रखकर सूर्यवंशी को मौका देना जायज होता? उन खिलाड़ियों के बदले, जिन्होंने विश्व कप जिताया था. हां, सीरीज शुरू होने से पहले एक रास्ता जरूर था, लेकिन यह भी बहुत और बहुत ही ज्यादा धुंधला था.

आयरलैंड टीम की उसकी फर्स्ट XI के छह नियमित खिलाड़ी टीम में नहीं थे. चोट के कारण उसके स्टार क्रिकेटर और पूर्व कप्तान पॉल स्ट्रिंग (पिंडली की चोट), जोश लिटिल (फ्रैक्चर), मार्क एडेर (मांसपेशी की चोट), कर्ठिस कैंफर (हाथ में फ्रैक्चर), बैरी मैक्कार्थी (मांसपेशी में चोट) और जॉर्डन नील (कंधे में चोट) के कारण अपनी सेवाएं नहीं दे सके. क्या यह दूसरी पंक्ति की आयरिश टीम नहीं थी? बहरहाल, ऐसे में BCCI इस तर्क के साथ कुछ युवा खिलाड़ियों को आयरिश दौरे के लिए टीम में शामिल कर सकता था. लेकिन अगर ऐसा होता, तो फिर आयरलैंड दौरे के तुरंत दो दिन बाद इंग्लैंड के खिलाफ शुरू होने वाली पांच मैचों की सीरज का क्या होता? इस सीरीज के लिए सीनियर खिलाड़ियों को तैयारी का मंच और जरूरी प्रैक्टिस कहां मिलती? और अगर दूसरी पंक्ति के कुछ खिलाड़ियो को भेजा भी जाता, तो मेजबान देश और ब्रॉडकास्टर के के प्रथम पंक्ति की टीम भेजने के दबाव का क्या होता? जाहिर है कि कुछ युवा खिलाड़ियों को जगह देने का तर्क भी बेदम हो जाता है. फिर वही सवाल अपनी जगह आ खड़ा होता है कि टॉप ऑर्डर में आखिर प्रबंधन किसकी और क्यों वैभव को जगह देता?
जरा खुद से सवाल कीजिए कि क्या वैभव इससे समायोजित कर पाते? क्या वैभव तकनीकी समायोजन कर पाते? वैभव जो फ्रंटफुट पर पैर निकालकर स्लैश हार्ड (दोनों हाथ खोलकर प्वाइंट से मारने जैसा) या स्कवॉयरिश ड्राइव खेलते हैं, उसमें यहां की पिचों पर सफल हो पाते? अब कल्पना कीजिए कि अगर वैभव शुरुआती दोनों मैचों में फ्लॉप हो जाते, तो इस स्थिति में वो तमाम पंडित क्या कह रहे होते, जो वैभव को शुरुआती मैचों से ही मौका देने की बात कर रहे हैं? और अब सीरीज में हार के बाद क्या?
अब एक बड़ा वर्ग वैभव को इंग्लैंड में पहले मैच से ही XI में खिलाने की बात कर रहा है? क्यों? तीन महीने पहले विश्व कप जिताने वाले प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट सिर्फ दो ही मैचों में तो नाकाम हुए हैं. आखिर किसी इस स्तर के खिलाड़ी को ड्रॉप करने के लिए कम से कम कितने मैचों का पैमाना होना चाहिए? आखिर क्यों खिलाड़ी विशेष को चार-पांच मैच नहीं मिलने चाहिए? कुछ दिन पहले ही महान गावस्कर ने कहा था कि एकदम से ही किसी को इंडिया कैप नहीं देनी चाहिए? इंडिया कैप को खिलाड़ी विशेष को आप कमाने दें. और वैभव को भी आप इंडिया कैप कमाने दें? दरवाजे का एक गेट खुला है! शुरुआती दो मैचों में टॉप ऑर्डर के दोनों बल्लेबाज नाकाम हुए हैं, लेकिन दरवाजे का आधा हिस्सा खुलना अभी बाकी है. शुरुआत जब प्रबंधन ने मेरिट आधारित चयन पर की थी, तो इस मेरिट को बने ही रहनें दें. बाकी वैभव का अपना, सही और जायज समय आएगा. ठीक वैसे ही, जैसे उन्हें अगरकर एंड कंपनी ने 15 सदस्य टीम में जगह देकर लाया. धैर्य रखें, सचिन का रिकॉर्ड भी टूटेगा, वैभव का बल्ला भी सुनामी अंदाज में बोलेगा, लेकिन फिलहाल वर्तमान समय में तो गंभीर एंड कंपनी अपने फैसले में सही है.
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