अजिंक्य रहाणे ने टेस्ट डेब्यू के लिए दो साल चले लंबे इंतजार को अपने करियर का सबसे मुश्किल दौर माना है. रहाणे को भारतीय स्क्वाड में शामिल तो किया गया था, लेकिन वह प्लेइंग इलेवन में जगह नहीं बना पाए थे. उन्होंने 2011 में व्हाइट-बॉल क्रिकेट में अपना इंटरनेशनल डेब्यू किया था, लेकिन टेस्ट कैप पाने के लिए उन्होंने दो साल और इंतजार करना पड़ा. उस दौरान, उन्होंने टीम के 12वें खिलाड़ी के तौर पर लंबा समय बिताया. लेकिन जब मौका मिला तो रहाणे ने इसे दोनों हाथों से भुनाया. खुद को भारत के मिडिल ऑर्डर में एक अहम खिलाड़ी के तौर पर स्थापित किया और एक सफल टेस्ट करियर का आनंद लिया. 85 टेस्ट और 144 पारियों में, रहाणे ने 38.46 की औसत और 49.50 के स्ट्राइक रेट से 5,077 रन बनाए. इस दौरान उनके बल्ले से 12 शतक और 26 अर्धशतक भी आए.
अपने टेस्ट डेब्यू के इंतज़ार के बारे में बात करते हुए, रहाणे ने माना कि इंडिया के 12वें खिलाड़ी के तौर पर दो साल का समय उनके करियर के सबसे मुश्किल दौर में से एक था. हालांकि, निराशा को हावी होने देने के बजाय, उन्होंने इस रोल को अपनाया, अपने टीम के साथियों के अनुभन से सीखा और वह सोच बनाई जिससे उन्हें एक लंबा और सफल टेस्ट करियर बनाने में मदद मिली.
हाल ही में क्रिकेट के सभी फॉर्मेट से संन्यास लेने वाले अजिंक्य रहाणे ने अपने हिंदी यू-ट्यूब चैनल पर कहा,"पहले दो साल, जब मैं 2011 में पहली बार टीम में आया था. मुझे अपने टेस्ट डेब्यू के लिए 20 गेम इंतज़ार करने पड़े, और मैं दो साल तक 12वें खिलाड़ी के तौर पर वहां था. वह एक मुश्किल दौर था, लेकिन मैंने उससे बहुत कुछ सीखा. मेरे पास दो ऑप्शन थे- या तो सहानुभूति हासिल करूं या खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करूं. 12वां खिलाड़ी होने या पानी सर्व करने या अपने टीम के साथियों की मदद करने में कुछ भी बुरा नहीं है. मैंने इसे पॉजिटिव तरीके से लिया. मैं हर चीज़ को देखता था, और इसी वजह से मैं लंबे समय तक खेल सका. देखने से मेरे एटीट्यूड और सोच में मदद मिली. सहानुभूति हासिल करना आसान होगा, लेकिन मैंने कभी इसकी उम्मीद नहीं की थी."
रहाणे की मानें तो मुंबई में बड़े होने के उनके अनुभव और सीनियर खिलाड़ियों के साथ बातचीत ने धीरे-धीरे उनका नज़रिया बदला और उन्हें सिखाया कि सिलेक्शन की चिंता करने के बजाय सिर्फ़ उन चीज़ों पर ध्यान दें, जो उनके कंट्रोल में हैं.
उन्होंने आगे कहा,"यह पहले से था, लेकिन जैसे-जैसे मैं खेलता गया और अनुभव मिला, यह और भी डेवलप हुआ. मैं यह नहीं कहूंगा कि शुरू से ही मुझमें इतना सब्र था. जब आप मुंबई में लोकल ट्रेन में सफर करते हैं, तो यह चैलेंजिंग होता है. तो कहीं न कहीं, वहीं से सब्र डेवलप होता है. जब मैंने डोमेस्टिक क्रिकेट शुरू किया और लगातार रन बनाता रहा, तो आप अनजाने में सोचते हैं कि आपका नाम इंडिया के लिए आना चाहिए. और मैंने भी यही सोचा था. लेकिन कुछ सीनियर खिलाड़ियों से बात करने और समय के साथ, मुझे एहसास हुआ कि जब होना होगा तब होगा. आप वही करते हैं जो आपके कंट्रोल में है. अगर आप लंबे समय तक खेलना चाहते हैं, तो सब्र ज़रूरी है."
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