सुप्रीम कोर्ट ने 1978 के ऐतिहासिक 'बैंगलोर वाटर सप्लाई' (Bangalore Water Supply) जजमेंट में दी गई 'इंडस्ट्री' (उद्योग) की परिभाषा पर फिर से विचार करने के लिए दिए गए रेफरेंस को सही और मेंटेनेबल माना है. मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली नौ जजों की संविधान पीठ ने 6:3 के बहुमत से यह अहम फैसला सुनाया है. हालांकि, बहुमत के इस फैसले ने इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947 की धारा 2(j) के तहत यह तय करने वाले 1978 के “ट्रिपल टेस्ट” (Triple Test) को बदलने से इनकार कर दिया है कि आखिर “इंडस्ट्री” क्या है. कोर्ट ने साफ किया कि यह ट्रिपल टेस्ट समय की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरा है.
पुराने मामलों और नए कानूनों पर क्या होगा असर?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1947 के आईडी एक्ट के तहत चल रहे सभी पेंडिंग विवादों का फैसला पुराने बैंगलोर वाटर सप्लाई जजमेंट के आधार पर ही किया जाएगा. जिन मामलों में अंतिम फैसला आ चुका है, उन्हें इस नए फैसले के आधार पर दोबारा नहीं खोला जाएगा. वहीं, भविष्य के विवादों के लिए नया 'इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, 2020' लागू होगा. कोर्ट ने निर्देश दिया कि नए कोड का अर्थ इसके अपने टेक्स्ट और कॉन्टेक्स्ट के आधार पर निकाला जाना चाहिए, और 1978 का फैसला इसका निर्धारण नहीं करेगा.
क्या था 1978 का 'ट्रिपल टेस्ट'?
1978 के बैंगलोर वाटर सप्लाई मामले में सात जजों की पीठ ने 'इंडस्ट्री' की व्यापक व्याख्या की थी. इसके तहत किसी संस्था का मुनाफा कमाना अनिवार्य नहीं था. यदि कोई गतिविधि व्यवस्थित तरीके से नियोक्ता और कर्मचारियों के सहयोग से वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन या वितरण करती है, तो वह उद्योग के दायरे में आ सकती थी. इसके लिए तीन मुख्य कसौटियां तय की गई थीं:
- गतिविधि संगठित और व्यवस्थित हो.
- उसमें नियोक्ता और कर्मचारी के सहयोग का तत्व मौजूद हो.
- गतिविधि का उद्देश्य लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन या वितरण करना हो.
संविधान पीठ ने माना कि इन मूल सिद्धांतों को बरकरार रखते हुए इनकी भाषा को और अधिक स्पष्ट किया जाना जरूरी है, लेकिन इसका मूल ढांचा वैसा ही रहेगा.
जजों की असहमति और भविष्य का रुख
इस फैसले में तीन जजों (जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस उज्जल भुइयां) ने बहुमत से असहमति जताई. उनका मानना था कि वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों और नए इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड के आ जाने के बाद पुराने कानून की व्याख्या को दोबारा देखने की कोई आवश्यकता नहीं थी. बहरहाल, इस फैसले से यह साफ हो गया है कि पुराने लंबित मामलों में पुराना नियम ही चलेगा, जबकि नए कानूनों पर नए सिरे से विचार किया जाएगा.
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