Trump 200% Tariff Impact: दवा निर्यात के मामले में दुनिया भर में अपनी धाक जमाने वाली भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए बुधवार का दिन भारी बिकवाली लेकर आया. दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से आयातित जेनेरिक दवाओं पर चरणबद्ध तरीके से 200 प्रतिशत टैरिफ (Tariff) लगाने के खाके का ऐलान करते ही दलाल स्ट्रीट पर फार्मा शेयरों में चौतरफा गिरावट देखने को मिली.
बाजार खुलते ही 'निफ्टी फार्मा' (Nifty Pharma) इंडेक्स 1.32% टूटकर 25,747.60 के स्तर पर आ गया. सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इंडेक्स में शामिल सभी 19 के 19 शेयर लाल निशान में फिसल गए, जिससे निवेशकों के करोड़ों रुपये डूब गए.
Gland Pharma बनी सबसे बड़ी शिकार
इस बिकवाली के तूफान में प्रतिशत के लिहाज से सबसे बड़ा नुकसान ग्लैंड फार्मा (Gland Pharma 4.75%) और पीरामल फार्मा (Piramal Pharma 4.20%) को उठाना पड़ा है. वहीं, अगर प्रति शेयर रुपये के हिसाब से देखें, तो अब्बोट इंडिया (Abbott India) के शेयर में सबसे ज्यादा ₹495.00 प्रति शेयर की बड़ी गिरावट दर्ज की गई. दूसरी ओर, डिविस लैब्स (Divis Labs) पर इसका असर सबसे कम रहा. यह शेयर मात्र 0.55% की गिरावट के साथ खबर लिखे जाने तक कारोबार कर रहा था.
क्या है ट्रंप का 200% टैरिफ प्लान
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह नया ऐलान अमेरिकी फार्मा बाजार में स्थानीय स्तर पर प्रोडक्शन (Local Manufacturing) को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया है. ट्रंप के प्रस्ताव के मुताबिक जेनेरिक दवाओं के आयात पर दो साल तक 0 प्रतिशत सीमा शुल्क लागू रहेगा. हालांकि, दो साल बाद आयात शुल्क बढ़ाकर सीधे 100% कर दिया जाएगा. इसके बाद भी यदि कंपनियां अमेरिका में प्लांट नहीं लगाती हैं, तो यह ड्यूटी बढ़ाकर 200% कर दी जाएगी. ट्रंप प्रशासन का साफ संदेश है कि विदेशी दवा कंपनियां 2 साल की मोहलत के भीतर अमेरिका में अपने मैन्युफैक्चरिंग प्लांट स्थापित करें, वरना भारी भरकम टैक्स चुकाने के लिए तैयार रहें.
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भारतीय दवा कंपनियों के लिए क्यों चिंता की बात है यह फैसला?
भारतीय फार्मा इंडस्ट्री अपनी कम लागत वाली जेनेरिक दवाओं के लिए दुनिया भर में जानी जाती है और अमेरिका भारत का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट मार्केट है. भारतीय कंपनियां अमेरिकी बाजार में बड़े पैमाने पर जीवन रक्षक दवाओं और जेनेरिक फॉर्मूलेशन का निर्यात करती हैं. ऐसे में अगर 2 साल बाद 100% या 200% टैरिफ लागू होता है, तो भारतीय दवाओं की कीमतें अमेरिका में काफी महंगी हो जाएंगी, जिससे उनकी मांग घट सकती है. इसके अलावा, अमेरिका प्रोडक्शन करने पर लागत बढ़ने से कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर सीधा असर पड़ेगा.
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