देश में चीनी की कीमतें एक महीने के भीतर 15 से 20% तक बढ़ गई है. खुदरा बाजार में जो चीनी 42 से 45 रुपये किलो तक बिक रही थी, वो आज कई शहरों में 60 से 62 रुपये के भाव पर पहुंच गई है. NDTV ने जब चीनी के खुदरा और थोक व्यापारियों से बात की तो उन्होंने डिमांड और सप्लाई यानी मांग और आपूर्ति को एक बड़ी वजह बताया. एथेनॉल की नीति की ओर भी इशारा किया. बहरहाल, सरकार उपाय भी कर रही है. स्टॉक से निर्यात तक कुछ सख्तियां भी लागू की हैं.
इस रिपोर्ट में हम समझने की कोशिश करते हैं कि देश में चीनी का संकट क्यों पैदा हुआ और सरकार ने अब तक कौन-से कदम उठाए हैं.
देश में कैसे पैदा हुआ चीनी का संकट?
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल चीनी मिलों में उत्पादन, अनुमान के मुताबिक नहीं रहा है. ये एक बड़ी वजह दिखती है, लेकिन चीनी का मौजूदा संकट सिर्फ उत्पादन घटने की कहानी नहीं है. गन्ने की कम उपज, मौसम की मार, एथेनॉल के लिए गन्ने का डायवर्जन, शुरुआती निर्यात और राज्यों में असमान स्टॉक जैसे कई कारण हैं, जिन्होंने बाजार में सप्लाई का दबाव बढ़ाया और इसी वजह से कीमतों में तेजी देखी जा रही है.
1). अनुमान से कम रहा उत्पादन
2025-26 चीनी सीजन में उत्पादन के शुरुआती अनुमान ज्यादा थे, लेकिन महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में गन्ने की उपज कमजोर रही. कुछ जगह ज्यादा या बेमौसम बारिश से फसल की गुणवत्ता और रिकवरी प्रभावित हुई, जबकि दूसरी तरफ बारिश की कमी और मौसम की अनिश्चितता ने खड़ी फसल को नुकसान पहुंचाया.
2). खपत से कम चीनी बनने की आशंका
कुछ व्यापारिक अनुमानों में 2025-26 में नेट चीनी उत्पादन करीब 27.9 मिलियन टन और घरेलू खपत करीब 28.5 मिलियन टन बताई गई है. इससे अंदाजा लगता है कि लगातार दूसरे साल डिमांड-सप्लाई के अंतर की स्थिति में पहुंच गया. जब उत्पादन कम हो और शुरुआती स्टॉक सीमित हो, तो बाजार में एक-एक टन चीनी की अहमियत बढ़ जाती है.

3). एथेनॉल नीति का भी असर हुआ क्या?
सरकार पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की नीति को बढ़ावा दे रही है. इसके लिए गन्ने और उसके उत्पादों का इस्तेमाल बढ़ा है. चीनी उद्योग का अनुमान है कि 2025-26 में करीब 3.1 से 3.4 मिलियन टन चीनी के बराबर सुक्रोज एथेनॉल उत्पादन की तरफ गया. इससे मिलों के पास बाजार में बेचने के लिए उपलब्ध चीनी कम रह जाती है. ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन (AIDA) की रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने संसद में बताया था कि एथेनॉल का सबसे बड़ा हिस्सा अब खराब अनाजों से बन रहा है.
- मक्का: 35-40%
- खराब चावल: 25 -30%
- गन्ना: 24-33%
रिपोर्ट के मुताबिक पहले की अपेक्षा एथेनॉल बनाने में अब गन्ने का इस्तेमाल कम किया जा रहा है, जबकि बाकी चीजों का ज्यादा.
4). निर्यात पर रोक में देरी!
सरकार ने शुरुआत में 15 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति दी और बाद में 5 लाख टन अतिरिक्त कोटा भी दिया. लेकिन उत्पादन का वास्तविक आंकड़ा अनुमान से नीचे आने और घरेलू सप्लाई की चिंता बढ़ने के बाद केंद्र ने मई में निर्यात पर रोक लगा दी, जो सितंबर 2026 तक लागू है. यानी पहले बाहर भेजी गई चीनी और बाद में घरेलू बाजार को प्राथमिकता देने की जरूरत, दोनों ने संकट की धारणा को तेज किया.
5). देश में चीनी पर्याप्त पर कुछ राज्यों में कमी
यह भी अहम है कि राष्ट्रीय स्तर पर स्टॉक पूरी तरह खत्म होने की स्थिति नहीं बताई गई, लेकिन महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे उत्पादन केंद्रों में मिलों की इन्वेंट्री कम हुई. रिपोर्टों के अनुसार, शुरुआती निर्यात का बड़ा हिस्सा इन्हीं राज्यों से गया और कुछ मिलों ने कोटे से अधिक घरेलू बिक्री भी की. इससे स्थानीय/क्षेत्रीय सप्लाई तंग हुई और कीमतों में तेजी आई.
तो फिर कीमतें क्यों बढ़ रही हैं?
जुलाई में एक्स-फैक्टरी चीनी के दाम लगभग 600 प्रति क्विंटल तक बढ़ने की रिपोर्ट आई. जून में भी कई बाजारों में कीमतें 6-7% ऊपर गईं. कारण क्या रहे- कम स्टॉक, त्योहारों से पहले बढ़ती मांग, कमजोर उत्पादन का अंदेशा और अल-नीनो इफेक्ट को लेकर चिंता.
गन्ने की फसल कम हुई या खराब हुआ, एथेनॉल के लिए कुछ हिस्सा गया, पहले कुछ चीनी निर्यात हुई, मिलें जल्दी बंद हुईं और स्टॉक कुछ राज्यों में घट गया, इन्हीं वजहों से देश में चीनी का संकट और कीमतों का दबाव पैदा हुआ.
चीनी संकट पर सरकार ने अब तक क्या कदम उठाए?
सरकार चीनी की महंगाई और संभावित कमी से निपटने के लिए निर्यात रोकने, जमाखोरी पर अंकुश लगाने, मिलों के स्टॉक की जांच और एथेनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल की समीक्षा जैसे कदम उठा रही है. मुख्य लक्ष्य घरेलू बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्ध रखना और त्योहारों से पहले कीमतों को काबू में रखना है. मुनाफाखोरी पर कार्रवाई की तैयारी भी है. राज्यों के साथ चर्चा कर सरकार उन कारोबारियों के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी में है जो कीमतों में तेजी का फायदा उठाकर और फर्जी कमी दिखाकर, जमाखोरी या मूल्य-हेरफेर कर रहे हों.
1). चीनी के निर्यात पर रोक
केंद्र ने 13 मई 2026 से चीनी निर्यात पर रोक लगाई है, जो फिलहाल 30 सितंबर 2026 तक लागू है. इसका मकसद घरेलू बाजार के लिए चीनी बचाना और कीमतों को काबू में रखना है. EU और अमेरिका के कुछ तय कोटे, एडवांस ऑथराइजेशन जैसे सीमित अपवाद रखे गए हैं.
2). डीलरों तक स्टॉक लिमिट से भौतिक सत्यापन तक
1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक चीनी डीलर किसी एक स्थान पर अधिकतम 4,000 क्विंटल ही स्टॉक रख सकते हैं. साथ ही वे प्राप्ति की तारीख से 15 दिन से अधिक चीनी अपने पास नहीं रख सकते. यह कदम जमाखोरी और कृत्रिम कमी रोकने के लिए है.
डीलरों को चीनी का स्टॉक घोषित करना और उसकी स्थिति हर सप्ताह खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के ऑनलाइन पोर्टल पर अपडेट करना होगा. इससे सरकार को यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि किस क्षेत्र में कमी है और कहीं स्टॉक छिपाकर तो नहीं रखा जा रहा.
3). मिलों में भी चीनी के स्टॉक पर नजर
सरकार ने मिलों के पास मौजूद चीनी की भौतिक जांच कराने का फैसला किया है. इसका उद्देश्य घोषित और वास्तविक स्टॉक के बीच अंतर पकड़ना, साथ ही बिक्री-कोटे के अनुपालन को जांचना है. सरकार मिलों को हर महीने घरेलू बाजार में बेचने के लिए चीनी का कोटा तय करती है. जुलाई के लिए 22 लाख टन और अगस्त के लिए 22.5 लाख टन का घरेलू आवंटन दिया गया था. इससे नियंत्रित तरीके से बाजार में सप्लाई जारी रखने की कोशिश की जा रही है.
4). एथेनॉल के लिए डायवर्जन की समीक्षा
सरकार अगले सीजन में गन्ने के रस या चीनी से एथेनॉल बनाने पर कुछ समय के लिए सख्ती करने पर विचार कर रही है, ताकि पहले घरेलू चीनी की जरूरत पूरी हो. जरूरत पड़ने पर E20 कार्यक्रम के लिए एथेनॉल का कुछ हिस्सा मक्का और चावल जैसे वैकल्पिक फीडस्टॉक से लेने की संभावना भी देखी जा रही है.
5). रॉ शुगर का आयात 1 अक्टूबर तक ड्यूटी फ्री
घरेलू बाजार में चीनी की सप्लाई सुधारने और बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए रॉ-शुगर का आयात टैक्स फ्री कर दिया है. विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) के नोटिफिकेशन के मुताबिक, सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी (Raw Sugar) के ड्यूटी फ्री (Duty-Free) आयात को मंजूरी दी है. इस फैसले के बाद अब बिना कोई आयात शुल्क चुकाए विदेशों से 10 लाख टन रॉ-शुगर भारत मंगाई जा सकेगी, जिससे स्थानीय बाजारों में चीनी की उपलब्धता बढ़ेगी.
कुल मिलाकर सरकार की प्राथमिकता यही है कि घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धत बनी रहे.
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