RBI MPC Meeting Decisions: 4 फरवरी से चल रही केंद्रीय बैंक RBI की मॉनिटरी पॉलिसी मीटिंग के बाद आज गवर्नर संजय मल्होत्रा रेपो रेट पर लिए गए फैसलों और अन्य नतीजों का ऐलान करने वाले हैं. ऐसे में मार्केट, निवेशकों और आम लोगों की निगाहें इन फैसलों पर है. क्या रेपो रेट कम होगा, क्या इसे बढ़ाया जाएगा या फिर इसे स्थिर रखा जाएगा? ये मीटिंग इसलिए भी महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि रेपो रेट से लिंक्ड होम लोन (Home Loan), कार लोन (Car Loan) या अन्य लोन की दरें इसी पर निर्भर करती हैं. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की मीटिंग को लेकर बाजार के जानकारों और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस बार केंद्रीय बैंक नीतिगत ब्याज दर यानी रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रख सकता है.
क्यों नहीं घटेगी ब्याज दर?
ब्लूमबर्ग के एक सर्वे के अनुसार, 39 में से 34 अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस बार दरों में कोई बदलाव नहीं होगा. इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि हालिया समय में महंगाई अपने निचले स्तर से फिर से धीरे-धीरे बढ़ने की ओर इशारा कर रही है. हालांकि यह अभी भी रिजर्व बैंक के संतोषजनक दायरे (2% से 6%) के भीतर है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है.
महंगाई और विकास दर का गणित
महंगाई के रुख पर बात करें तो इस वित्तीय वर्ष में अब तक खुदरा महंगाई औसतन 1.7% रही है. लेकिन अनुमान है कि आने वाली तिमाहियों में यह बढ़कर 3% से 4% के बीच पहुंच सकती है. दूसरी ओर भारत की अर्थव्यवस्था में मजबूती बरकरार है. वित्त वर्ष 2026 के लिए विकास दर 7.3% रहने का अनुमान है. जब अर्थव्यवस्था अच्छी रफ्तार से बढ़ रही हो, तो केंद्रीय बैंक को ब्याज दरें घटाने की जल्दबाजी नहीं होती.
ट्रेड डील का भी मिलेगा सहारा
हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच हुए ऐतिहासिक व्यापार समझौते का भी इस पर असर दिखेगा. इस समझौते के तहत अमेरिका ने भारतीय सामानों पर टैरिफ कम कर दिया है. अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इससे विदेशी निवेश में स्थिरता आएगी और रुपये पर दबाव कम होगा, जो रिजर्व बैंक के लिए एक बड़ी राहत है.
पुरानी कटौती का असर अभी बाकी
एक और बड़ी वजह यह है कि फरवरी 2025 से अब तक रेपो रेट में कुल 1.25% की कटौती की जा चुकी है, लेकिन जानकारों का ऐसा मानना है कि बैंकों ने अभी तक इस कटौती का पूरा लाभ ग्राहकों (लोन लेने वालों) तक नहीं पहुंचाया है. जब तक पुरानी कटौतियों का असर पूरी तरह बाजार में नहीं दिखता, तब तक नई कटौती की संभावना कम है.
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