कुछ साल पहले तक कार खरीदने का फैसला थोड़ा आसान था. लोग पेट्रोल या डीजल में से एक ऑप्शन चुनते थे. फिर CNG आई और अब बाजार में EV, E20, E85 और Flex-Fuel जैसी चीजें माकेर्ट में आ गई हैं. ऐसे में लाखों भारतीय परिवारों के सामने अब बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन-सी कार खरीदें, बल्कि यह भी है कि किस फ्यूल पर भरोसा करें.एक्सपर्ट का कहना है कि इसका कोई एक जवाब नहीं है. सही ऑप्शन इस बात पर निर्भर करेगा कि आप रोज कितनी ड्राइविंग करते हैं, कहां रहते हैं और कार कितने साल रखने की योजना है.
E20, E80 और E100 फ्यूल क्या है?
भारत सरकार इथेनॉल ब्लेंडिंग को तेजी से बढ़ावा दे रही है ताकि कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम हो और एनर्जी सिक्योरिटी मजबूत हो सके.
LetzRyd के को-फाउंडर तरुण जैन के मुताबिक,
- E20 में 20% इथेनॉल और 80% पेट्रोल होता है.
- E80 में 80% इथेनॉल और 20% पेट्रोल होता है.
- E100 लगभग पूरी तरह इथेनॉल आधारित ईंधन है, जिसमें 93-95% इथेनॉल के साथ कुछ मात्रा में पेट्रोल और अन्य एडिटिव्स शामिल होते हैं.
Folks Motor के फाउंडर निखिल आनंद खुराना का मानना है कि आने वाले समय में इन फ्यूल्स की भूमिका और बढ़ने वाली है.भारत पहले ही E20 ब्लेंडिंग का लक्ष्य हासिल कर चुका है, जिसे देश की तेल आयात निर्भरता कम करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है.
इथेनॉल से देश को फायदा, लेकिन क्या ग्राहकों को भी होगा?
एक्सपर्ट का कहना है कि देश के लिए इथेनॉल फायदेमंद हो सकता है, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर इसकी गणित थोड़ी अलग है.
E20 से कितनी कम हो सकती है माइलेज?
Avalon Consulting के एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट आयुष पटोदिया के मुताबिक, E20 फ्यूल इस्तेमाल करने पर औसतन लगभग 7% तक फ्यूल एफिशिएंसी कम हो सकती है.अगर इथेनॉल की मात्रा E30 या E85 जैसे हाई लेवल तक जाती है तो यह अंतर और बढ़ सकता है.सीधे शब्दों में कहें तो अगर कार को समान दूरी तय करने के लिए ज्यादा फ्यूल चाहिए, तो पंप पर फ्यूल की कीमत काफी कम होनी चाहिए, तभी ग्राहक को सही बचत का फायदा मिलेग.
Flex-Fuel Vehicle क्या होते हैं?
फ्लेक्स-फ्यूल वाहन यानी FFV ऐसी गाड़ियां होती हैं जो अलग-अलग इथेनॉल-पेट्रोल मिश्रण पर चल सकती हैं.
अबीराम मेनन के अनुसार, इन वाहनों में स्मार्ट इंजन कंट्रोल सिस्टम होता है जो ईंधन में इथेनॉल की मात्रा के हिसाब से अपने प्रदर्शन को खुद एडजस्ट कर लेता है.
तरुण जैन का कहना है कि फ्लेक्स-फ्यूल वाहन पारंपरिक पेट्रोल कारों के मुकाबले ज्यादा लचीलापन देते हैं. हालांकि इनका वास्तविक फायदा ईंधन की उपलब्धता, कीमत और रखरखाव लागत पर निर्भर करेगा.
Flex-Fuel कारें महंगी क्यों होती हैं?
Avalon Consulting के पार्टनर सुभब्रत सेनगुप्ता बताते हैं कि फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों में अतिरिक्त हार्डवेयर की जरूरत होती है.
इनमें इथेनॉल सेंसर,मॉडिफाइड फ्यूल इंजेक्शन सिस्टम,जंग-रोधी (Corrosion Resistant) पार्ट्स शामिल हैं.इसी वजह से इनकी शुरुआती कीमत ज्यादा होती है.उदाहरण के तौर पर, फ्लेक्स-फ्यूल वैगनआर का मॉडल सामान्य पेट्रोल वैगनआर के मुकाबले करीब 86,000 रुपये महंगा बताया जाता है.
क्या Flex-Fuel कार वाकई पैसे बचाएगी?
इस सवाल का जवाब काफी हद तक भविष्य में इथेनॉल की कीमतों पर निर्भर करेगा. सुभब्रत सेनगुप्ता का मानना है कि मौजूदा स्थिति में इसका आर्थिक फायदा बहुत आकर्षक नहीं दिखता. भले ही E85 फ्यूल पेट्रोल से सस्ता हो, लेकिन कम माइलेज और वाहन की ज्यादा शुरुआती कीमत बचत को सीमित कर सकती है.
आयुष पटोदिया का कहना है कि सरकार ने कई प्रोत्साहन और टैक्स छूट का प्रस्ताव दिया है, लेकिन असली फायदा तभी होगा जब उसकी बचत ग्राहकों तक पहुंचे.
अबीराम मेनन के अनुसार, यदि इथेनॉल आधारित ईंधन 20-25% सस्ता हो लेकिन माइलेज 20-30% कम दे, तो वास्तविक बचत बहुत ज्यादा नहीं होगी.
यही वजह है कि एक्सपर्ट सिर्फ फ्यूल की कीमत नहीं, बल्कि प्रति किलोमीटर खर्च देखने की सलाह देते हैं.
क्या अब EV खरीदना ज्यादा समझदारी है?
शहरों में रहने वाले कई लोगों के लिए जवाब हां हो सकता है.अबीराम मेनन के अनुसार, घर पर चार्जिंग करने वाले EV मालिक हर साल लगभग 60,000 से 75,000 रुपये तक फ्यूल खर्च बचा सकते हैं.बैटरी तकनीक में सुधार, बढ़ती ड्राइविंग रेंज और लंबी बैटरी वारंटी ने भी EV को पहले से ज्यादा आकर्षक बनाया है.
EV और पेट्रोल कार में मेंटेनेंस का कितना अंतर है?
मेनन के अनुमान के मुताबिक:
- EV का 5 साल का मेंटेनेंस खर्च लगभग 30,000 रुपये आएगा
- पेट्रोल कार का 5 साल का मेंटेनेंस खर्च लगभग 70,000 रुपये आएगा
- डीजल कार का 5 साल का मेंटेनेंस खर्च लगभग 85,000 रुपये आएगा
यानी लंबे समय में EV का रखरखाव खर्च काफी कम पड़ सकता है.
किन लोगों के लिए EV सबसे बेहतर ऑप्शन है?
Green Driver Mobility के फाउंडर और CEO हरि कृष्णा के अनुसार, EV उन लोगों के लिए ज्यादा फायदेमंद है, जो शहर में रहते हैं,जिनकी रोज की यात्रा तय और अनुमानित होती है या जिनके पास भरोसेमंद चार्जिंग सुविधा उपलब्ध है
निखिल आनंद खुराना भी मानते हैं कि ज्यादा डेलू यूज, तय रूट और आसान चार्जिंग एक्सेस वाले ग्राहकों के लिए EV सबसे अच्छा विकल्प साबित हो सकता है.
EV खरीदने से पहले इन चुनौतियों को भी समझें
हालांकि EV हर किसी के लिए परफेक्ट ऑप्शन नहीं है.भारत में अभी भी पब्लिक चार्जिंग नेटवर्क कई विकसित देशों के मुकाबले सीमित है.हाईवे पर ज्यादा यात्रा करने वाले या अपार्टमेंट में रहने वाले ऐसे लोग जिनके पास प्राइवेट चार्जिंग की सुविधा नहीं है, उन्हें दिक्कतें आ सकती हैं.इसके अलावा रीसेल वैल्यू को लेकर भी कुछ खरीदारों की चिंता बनी हुई है. बैटरी लाइफ को लेकर संदेह के कारण फिलहाल EV की रीसेल वैल्यू पेट्रोल और डीजल वाहनों से कम मानी जाती है.
कार खरीदते समय लोग सबसे बड़ी गलती क्या करते हैं?
एक्सपर्ट का कहना है कि ज्यादातर लोग सिर्फ कार की शुरुआती कीमत देखते हैं, जबकि असली तस्वीर उससे कहीं बड़ी होती है.तरुण जैन के मुताबिक अब खरीदार केवल शोरूम कीमत नहीं, बल्कि पूरे ऑनरशिप कॉस्ट (Total Cost of Ownership) को देख रहे हैं.इसमें ईंधन खर्च, मेंटेनेंस लागत,इंश्योरेंस प्रीमियम,रीसेल वैल्यू,वाहन का डाउनटाइम, चार्जिंग या फ्यूल इंफ्रास्ट्रक्चर की उपलब्धता
शामिल हैं:
आखिर किसे चुनें...पेट्रोल, इथेनॉल, Flex-Fuel या EV?
एक्सपर्ट का मानना है कि भारत में आने वाले वर्षों में कोई एक टेक्नोलॉजी पूरी तरह हावी नहीं होगी. पेट्रोल, इथेनॉल आधारित ईंधन, फ्लेक्स-फ्यूल वाहन और EV सभी साथ-साथ मौजूद रहेंगे.अगर आप शहर में रोज 30-50 किलोमीटर तक ड्राइव करते हैं और घर पर चार्जिंग की सुविधा है, तो EV सबसे ज्यादा बचत करा सकता है.अगर आपके इलाके में फ्यूल इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत है और भविष्य में इथेनॉल की कीमतें आकर्षक होती हैं, तो फ्लेक्स-फ्यूल वाहन भी एक अच्छा विकल्प बन सकते हैं.वहीं, फिलहाल कई ग्राहकों के लिए पेट्रोल कार अब भी सबसे किफायती और आसान विकल्प बनी हुई है.
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