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EV और Flex-Fuel के दौर में कार चुनने का नया फॉर्मूला, ऐसे बचा सकते हैं 75,000 रुपये तक

नई गाड़ी लेनी है लेकिन कन्फ्यूजन है कि पेट्रोल, एथेनॉल, फ्लेक्स-फ्यूल या EV में से क्या चुनें? जानिए हर फ्यूल का पूरा गणित और कौन सा विकल्प आपके पैसे बचाएगा.

EV और Flex-Fuel के दौर में कार चुनने का नया फॉर्मूला, ऐसे बचा सकते हैं 75,000 रुपये तक
पेट्रोल, एथेनॉल या EV? नई गाड़ी लेने से पहले जान लें एक्सपर्ट्स की राय, नहीं तो होगा नुकसान
IANS

Auto News: पहले नई गाड़ी लेना आसान था- पेट्रोल या डीजल में से एक चुन लो. फिर CNG आ गई. अब तो ऑप्शन और भी ज्यादा हो गए हैं. इलेक्ट्रिक गाड़ियां (EVs) आम हो गई हैं, E20 (एथेनॉल वाला पेट्रोल) देश भर में मिल रहा है, और फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों की भी चर्चा तेज है. इसके बीच पेट्रोल कारें तो सड़क पर हैं ही. मिडिल क्लास परिवार अब ये नहीं सोच रहा कि कौन सी गाड़ी लूं?, बल्कि ये सोच रहा है कि किस फ्यूल वाली गाड़ी लूं? एक्सपर्ट्स का कहना है कि इसका कोई एक सीधा जवाब नहीं है. ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितनी गाड़ी चलाते हैं, कहां रहते हैं और कितने साल तक गाड़ी रखेंगे.

E20, E80 और E100 आखिर है क्या?

सरकार एथेनॉल ब्लेंडिंग यानी पेट्रोल में एथेनॉल मिलाना पर जोर दे रही है ताकि बाहर से तेल कम मंगाना पड़े और एनर्जी सिक्योरिटी मजबूत हो. LetzRyd के को-फाउंडर तरुण जैन के मुताबिक:-

  • E20 में 20% एथेनॉल और 80% पेट्रोल होता है.
  • E80 में 80% एथेनॉल और 20% पेट्रोल होता है.
  • E100 में 93-95% तक एथेनॉल होता है और बाकी पेट्रोल या दूसरे एडिटिव्स होते हैं.

Folks Motor के एमडी निखिल आनंद खुराना कहते हैं कि भारत ने E20 का टारगेट पहले ही पूरा कर लिया है. 

वहीं, गोदावरी बायोरिफाइनरीज के CMD समीर सोमैया के मुताबिक, 'E20 तो सिर्फ शुरुआत है. अब हमारे पास इतनी कैपेसिटी और पॉलिसी सपोर्ट है कि हम एथेनॉल का इस्तेमाल और आगे ले जा सकते हैं.'

छिपी हुई वो बात जो ग्राहकों को पता होनी चाहिए

एथेनॉल फ्यूल से देश को फायदा है, लेकिन आम आदमी की जेब का हिसाब थोड़ा अलग है. Magron Novus के CEO अभिराम मेनन बताते हैं कि एथेनॉल में पेट्रोल से कम एनर्जी होती है, जिससे गाड़ी की माइलेज कम हो जाती है.

एवलॉन कंसल्टिंग के आयुष पटोडिया के मुताबिक, E20 फ्यूल से गाड़ी की माइलेज करीब 7% कम हो जाती है. E30 या E85 में माइलेज और ज्यादा गिरेगी.

मेनन ये भी बताते हैं कि पुरानी गाड़ियां जो एथेनॉल के लिए नहीं बनी हैं, उनके रबर और मेटल के पार्ट्स जल्दी खराब हो सकते हैं क्योंकि एथेनॉल नमी खींचता है. 

सीधी बात यह है कि अगर गाड़ी माइलेज कम दे रही है, तो एथेनॉल वाले फ्यूल की कीमत पेट्रोल से काफी कम होनी चाहिए.

फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां क्या होती हैं?

ये गाड़ियां पेट्रोल और एथेनॉल के किसी भी मिक्सचर पर चल सकती हैं. मेनन के मुताबिक, इनमें स्मार्ट इंजन होता है जो फ्यूल के हिसाब से खुद को सेट कर लेता है. 

तरुण जैन कहते हैं कि इनमें फ्यूल के ज्यादा ऑप्शन मिलते हैं, लेकिन असली फायदा फ्यूल की कीमत और लंबे समय के खर्चे पर निर्भर करता है.

एवलॉन कंसल्टिंग के पार्टनर सुभ्रत सेनगुप्ता के मुताबिक, 'फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों में अलग से एथेनॉल सेंसर, मॉडिफाइड इंजन सिस्टम और जंग न लगने वाले पार्ट्स लगाने पड़ते हैं. जैसे- वैगनआर (WagonR) का फ्लेक्स-फ्यूल मॉडल नॉर्मल पेट्रोल मॉडल से करीब 86,000 रुपये महंगा आता है.'

क्या फ्लेक्स-फ्यूल कार सच में पैसे बचाएगी?

सेनगुप्ता का मानना है कि अभी इसका गणित बहुत फायदे वाला नहीं लग रहा. हो सकता है E85 फ्यूल सस्ता हो, लेकिन कम माइलेज और गाड़ी की ज्यादा कीमत के हिसाब से ये सस्ती नहीं पड़ेगी.

पटोडिया कहते हैं कि सरकार ने छूट की बात तो की है, लेकिन देखना होगा कि कस्टमर तक उसका कितना फायदा पहुंचता है.

मेनन के मुताबिक, अगर एथेनॉल फ्यूल 20-25% सस्ता भी हुआ, लेकिन माइलेज 20-30% गिर गई, तो बचत न के बराबर होगी. इसलिए फ्यूल की कीमत की जगह रनिंग कॉस्ट पर ध्यान दें.

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तो क्या EV ले लेना ठीक है?

शहर में चलने वालों के लिए एक्सपर्ट्स की साफ हां है. मेनन का अनुमान है कि अगर आप EV को घर पर चार्ज करते हैं, तो साल का 60,000 से 75,000 रुपये का फ्यूल बचा सकते हैं. EV के 5 साल के मेंटेनेंस का खर्च सिर्फ 30,000 रुपये आता है. जबकि पेट्रोल कार के 5 साल का खर्च 70,000 रुपये और डीजल कार में करीब 85,000 रुपये का खर्च आता है.

ग्रीन ड्राइवर मोबिलिटी के CEO हरि कृष्णा और खुराना कहते हैं कि जो लोग रोज फिक्स दूरी चलते हैं और घर पर चार्जिंग है, उनके लिए EV बेस्ट है. हालांकि, मेनन मानते हैं कि बैटरी लाइफ को लेकर डर की वजह से अभी EV की रीसेल वैल्यू पेट्रोल/डीजल कारों से कम है. इसके अलावा हाइवे और अपार्टमेंट में चार्जिंग की दिक्कत अभी भी है.

कार खरीदते समय लोग क्या बड़ी गलती करते हैं?

एक्सपर्ट्स कहते हैं कि गाड़ी खरीदते समय सिर्फ शोरूम की कीमत देखना गलत है. तरुण जैन के मुताबिक, लोग अब गाड़ी को लंबे समय के खर्चे के हिसाब से इवैल्यूएट कर रहे हैं.

हरि कृष्णा और खुराना कहते हैं कि फैसला 'टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप' पर होना चाहिए. इसमें प्रति किलोमीटर खर्च, सर्विसिंग, इंश्योरेंस, रीसेल वैल्यू और चार्जिंग/फ्यूल स्टेशन की सुविधा शामिल है.

मेनन के अनुसार, सेफ्टी फीचर्स और आगे आने वाले फ्यूल को सपोर्ट करना भी कस्टमर्स के लिए बहुत जरूरी बातें हैं.

आगे क्या होने वाला है?

भारत में कोई एक टेक्नोलॉजी राज नहीं करेगी. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि पेट्रोल, एथेनॉल, फ्लेक्स-फ्यूल और EV अभी कई सालों तक एक साथ चलने वाले हैं. अगर आप शहर में रोज 30-50 KM चलते हैं और घर पर चार्जिंग है, तो EV आपके सबसे ज्यादा पैसे बचाएगी. जहां पेट्रोल पंप ज्यादा हैं, वहां एथेनॉल सस्ता होने पर फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां अच्छा विकल्प बनेंगी. लेकिन फिलहाल, ज्यादातर लोगों के लिए एक सामान्य पेट्रोल कार अभी भी सबसे प्रैक्टिकल और बिना झंझट वाली चॉइस है.

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