अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध की वजह से पश्चिम एशिया में अगर संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है तो भारत की आर्थिक वृद्धि की संभावनाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है. रेटिंग एजेंसी इक्रा (ICRA) ने एक रिपोर्ट में यह बात कही है.
7.1% रह सकती है जीडीपी ग्रोथ
रेटिंग एजेंसी ने कहा कि वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की वास्तविक जीडीपी ग्रोथ लगभग 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है. यह वित्त वर्ष 2025-26 के अनुमान 7.6 प्रतिशत से थोड़ा कम है. हालांकि पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने और मुद्रास्फीति के दबाव की वजह से जीडीपी ग्रोथ प्रभावित हो सकती है.
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इजराइल-अमेरिका के ईरान पर हमले के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के समुद्री मार्गों में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है. दुनिया कच्चे तेल और गैस की सप्लाई का यह एक महत्वपूर्ण रास्ता है. इससे आपूर्ति प्रभावित होने और माल ढुलाई की लागत बढ़ने को लेकर चिंता बढ़ी है.
व्यापार ही नहीं, ऊर्जा आपूर्ति भी होगी प्रभावित
पश्चिम एशिया भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है. भारत के निर्यात में इसकी लगभग 14 प्रतिशत और आयात में लगभग 21 प्रतिशत हिस्सेदारी है. ऐसे में यदि तनाव और बढ़ता है तो व्यापार के साथ ऊर्जा आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि यह संघर्ष खासतौर से माल ढुलाई की लागत में बढ़ोतरी, माल आपूर्ति में देरी और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता जैसी समस्याएं पैदा करता है, जो भारत के व्यापार के लिए महत्वपूर्ण जोखिम साबित हो सकता है.
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तेल महंगा हुआ तो कितना बढ़ेगा घाटा
इक्रा के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से भारत का चालू खाते का घाटा 0.30-0.40 प्रतिशत तक बढ़ सकता है. साथ ही थोक और खुदरा मुद्रास्फीति भी बढ़ सकती है. ईंधन की बढ़ती लागत से मांग कम हो सकती है और इससे समग्र आर्थिक गतिविधि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.
एजेंसी के अनुमान के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 में कच्चे तेल की कीमतें औसतन 70 से 75 डॉलर प्रति बैरल रहती हैं तो इससे चालू खाते का घाटा सकल घरेलू उत्पाद के लगभग एक प्रतिशत के आसपास बना रह सकता है.
हालांकि यदि कीमतें बढ़कर 100-105 डॉलर प्रति बैरल हो जाती हैं तो घाटा सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 1.9-2.2 प्रतिशत तक बढ़ सकता है, जिससे काफी आर्थिक दबाव बढ़ेगा.
भारत में आने वाले धन पर भी असर
इक्रा ने कहा कि इस स्थिति का असर बाहर से भारत में भेजे जाने वाली राशि पर भी पड़ सकता है, क्योंकि विदेश में रहने वाले भारतीय जो धन (remittance) भेजते हैं, उसका लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों खासकर संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब आदि से आता है.
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