Janmashtami Shopping: माखन-मिश्री, दूध-दही, मेवा-मिठाई, फल-फूल, पूजा सामग्री, फूल-मालाओं, मोर-मुकुट, लड्डू गोपाल और कान्हा की मूर्तियां, झूले-श्रृंगार-बंदनवार, आभूषण वगैरह...और न जाने कितनी सारी चीजों की बाजार में खूब खरीदारी हो रही है. हो भी क्यों नहीं, शुक्रवार को कृष्ण जन्माष्टमी (Krishna Janmashtami 2026) जो है. खरीदारी के लिए बस आज और कल दिनभर का समय है और इसलिए बाजारों में खूब भीड़ भी देखी जा रही है. लॉन्ग वीकेंड होने के चलते बड़ी संख्या में लोग मथुरा-वृंदावन, द्वारका और भगवान कृष्ण से जुड़े अन्य धार्मिक शहरों के टूर पर भी निकल रहे हैं. ऐसे में कान्हा के बहाने बाजार में धनवर्षा होने की संभावना है. देश के सबसे बड़े व्यापारिक संगठन CAIT की मानें तो इस साल जन्माष्टमी पर 40,000 करोड़ के कारोबार की संभावना है.

कैट का कहना है कि जन्माष्टमी केवल आस्था का पर्व नहीं, बल्कि देश की ‘सनातन इकोनॉमी' की ताकत का प्रतीक है. पूजा-अर्चना से लेकर धार्मिक पर्यटन तक, जन्माष्टमी करोड़ों लोगों की आजीविका और आर्थिक गतिविधियों से जुड़ा महापर्व है.
अलग-अलग व्यापारिक क्षेत्रों में संभावित बिक्री, धार्मिक व घरेलू खरीदारी, मंदिरों व धार्मिक स्थलों पर होने वाले खर्च, देशभर में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों और धार्मिक पर्यटन से जुड़े खर्चों के आधार पर ये अनुमान जारी किया गया है.
जन्माष्टमी पर कहां कितना खर्च करेंगे लोग?
कैट के आकलन के अनुसार जन्माष्टमी से जुड़े व्यापार में कई चीजों की हिस्सेदारी रहने वाली है. खंडेलवाल ने बताया कि इस वर्ष बाजारों में माखन-मिश्री, दूध, दही, पनीर और अन्य डेयरी उत्पादों, मिठाइयों, फलों, सूखे मेवों, पूजा सामग्री, फूल-मालाओं, बंदनवार, झूलों, लड्डू गोपाल की मूर्तियों, मुकुट, बांसुरी, मोरपंख, आभूषणों और विशेष परिधानों की मांग विशेष रूप से बढ़ी हुई है.
मिठाई, माखन-मिश्री और डेयरी उत्पाद पर 20% तो पूजा सामग्री, धूप-अगरबत्ती, पंचामृत और पूजन किट पर 10% खर्च कर सकते हैं. वहीं फूल, मालाएं और सजावट सामग्री पर 12%, पारंपरिक परिधान और वस्त्र पर 10%, फल, सूखे मेवे और प्रसाद सामग्री पर 10% खर्च किया जा सकता है. लड्डू गोपाल की मूर्तियां, झूले और श्रृंगार सामग्री पर 8%, उपहार, खिलौने और घरेलू सजावटी सामग्री पर 5%, धार्मिक पर्यटन, होटल, परिवहन और अन्य सेवाओं पर 15% और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं पर 10% खर्च कर सकते हैं.

राष्ट्रीय महामंत्री बोले- वोकल फॉर लोकल की ताकत
कैट के राष्ट्रीय महामंत्री एवं चांदनी चौक से सांसद प्रवीन खंडेलवाल ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव केवल श्रद्धा और भक्ति का पर्व नहीं है, बल्कि यह भारत की संस्कृति, परंपरा, सामाजिक सहभागिता और आर्थिक गतिविधियों का अद्भुत संगम भी है. जन्माष्टमी ऐसा पर्व है, जिसमें आस्था सीधे आर्थिक गतिविधियों में परिवर्तित होती दिखाई देती है.
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए “वोकल फॉर लोकल” के आह्वान का प्रभाव त्योहारों के बाजारों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है. अब उपभोक्ता बड़ी संख्या में भारतीय उत्पादों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे स्थानीय व्यापार, कुटीर उद्योग, हस्तशिल्प, सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों को व्यापक लाभ मिल रहा है.

किसान, फल-फूल विक्रेता से होटल-रेस्तरां व्यवसाई तक को लाभ
जन्माष्टमी के अवसर पर पूजा सामग्री से लेकर सजावटी वस्तुओं और धार्मिक उत्पादों तक अधिकांश मांग स्वदेशी वस्तुओं की है. खंडेलवाल ने कहा कि जन्माष्टमी से जुड़ा प्रत्येक अनुष्ठान और आयोजन किसी न किसी रूप में लाखों लोगों की आजीविका से जुड़ा हुआ है. किसान, दुग्ध उत्पादक, फूल उत्पादक, मिठाई कारोबारी, वस्त्र विक्रेता, मूर्तिकार, कारीगर, महिला उद्यमी, ट्रांसपोर्टर, होटल व्यवसायी, रेस्तरां संचालक और सेवा क्षेत्र से जुड़े लोग इस पर्व से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित होते हैं.

2024 में 25,000 करोड़, 2025 में 30,000 करोड़ का कारोबार
कैट के अनुसार वर्ष 2024 में जन्माष्टमी के अवसर पर देशभर में लगभग ₹25,000 करोड़ का व्यापार हुआ था, जबकि वर्ष 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर लगभग ₹30,000 करोड़ तक पहुंच गया. इस वर्ष उपभोक्ता मांग में वृद्धि, वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतों में परिवर्तन, त्योहारों के बढ़ते सामाजिक विस्तार, धार्मिक पर्यटन में वृद्धि और आधुनिक रिटेल एवं डिजिटल खरीदारी के विस्तार को देखते हुए लगभग 30 प्रतिशत वृद्धि के साथ व्यापार ₹40,000 करोड़ से अधिक रहने का अनुमान है.

सनातन अर्थव्यवस्था की ताकत
उन्होंने कहा कि भारत के त्योहारों को केवल धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजनों के रूप में देखना उनके वास्तविक महत्व को कम करके आंकना होगा. दीपावली, होली, रक्षाबंधन, नवरात्रि, गणेशोत्सव, जन्माष्टमी, दुर्गापूजा, करवा चौथ, छठ पूजा सहित देश के सभी प्रमुख पर्व करोड़ों छोटे व्यापारियों, कारीगरों, शिल्पकारों, किसानों, महिलाओं, स्वरोजगारियों और सेवा क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए आर्थिक अवसरों का विशाल तंत्र तैयार करते हैं.
खंडेलवाल ने कहा कि भारतीय त्योहारों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें होने वाला खर्च केवल उपभोग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों तक आय और रोजगार के रूप में पहुंचता है. यही प्रक्रिया भारत की जमीनी, समावेशी और विकेंद्रीकृत ‘सनातन अर्थव्यवस्था' को मजबूती प्रदान करती है.

मथुरा-वृंदावन से गुजरात-महाराष्ट्र तक जन्माष्टमी की धूम
खंडेलवाल ने बताया कि जन्माष्टमी के अवसर पर मथुरा-वृंदावन, द्वारका, नाथद्वारा, दिल्ली, मुंबई, जयपुर, अहमदाबाद, इंदौर और देश के अन्य प्रमुख कृष्ण मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है.
वहीं महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश सहित देश भर में यह त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है. इससे धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और होटल, परिवहन, रेस्तरां, प्रसाद, फूल, स्थानीय हस्तशिल्प और अन्य सेवाओं में भी उल्लेखनीय आर्थिक गतिविधियां देखने को मिलेंगी.

उन्होंने कहा कि भारत की धार्मिक अर्थव्यवस्था को अब केवल आध्यात्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि रोजगार, पर्यटन, स्थानीय उत्पादन और छोटे कारोबार के एक बड़े आर्थिक इकोसिस्टम के रूप में भी समझने की आवश्यकता है.
खंडेलवाल ने कहा, 'जन्माष्टमी का उत्सव ‘भक्ति से बाजार, परंपरा से रोजगार और स्थानीय उत्पादन से राष्ट्रीय विकास' की भावना को सशक्त बनाने का अवसर है. जन्माष्टमी सहित सभी त्यौहार भारत की उस अद्भुत आर्थिक परंपरा का प्रतीक है, जहां मंदिर से बाजार तक, किसान से व्यापारी तक और कारीगर से उपभोक्ता तक पूरा समाज एक आर्थिक श्रृंखला में जुड़ जाता है.'

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