विज्ञापन

कांवड़ का कारोबार होगा 5,000 करोड़ के पार! यूपी-बिहार से झारखंड-बंगाल तक कुटीर उद्योग को ऐसे मिलेगी रफ्तार

Kanwar Yatra to Boost Economy: सावन के महीने में कांवड़ यात्रा इकोनॉमी को रफ्तार दे रही है. सबसे बड़े व्‍यापारिक संगठन CAIT के मुताबिक, केवल कांवड़ का कारोबार 5,000 करोड़ के पार पहुंच सकता है. देश के किन शहरों में इसका फायदा हो रहा है, जानिए.

कांवड़ का कारोबार होगा 5,000 करोड़ के पार! यूपी-बिहार से झारखंड-बंगाल तक कुटीर उद्योग को ऐसे मिलेगी रफ्तार
कांवड़ का कारोबार अरबों में!
Source: IANS/NDTV Gfx

बिहार के भागलपुर जिले का सुल्‍तानगंज शहर इन दिनों गुलजार है. हर तरफ कांवड़ और कांवड़िए. यहां गंगा किनारे एक दुकानदार ने बताया कि उनके यहां 300 रुपये से लेकर 7,000 रुपये तक के कांवड़ बिक रहे हैं. झारखंड के देवघर स्थित बाबा वैद्यनाथ धाम के लिए करीब 110 किलोमीटर की पैदल कांवड़ यात्रा यहीं से शुरू होती है. इसी तरह उत्तराखंड के हरिद्वार की कांवड़ यात्रा के लिए भी अलग-अलग शहरों में कांवड़ का कारोबार होता है. और ऐसे ही देश के अलग-अलग शिवधामों के लिए भी. कुल मिलाकर कांवड़ का कारोबार करोड़ों में होता है. 

सावन के पावन महीने में चल रही कांवड़ यात्रा देश की एक बड़ी आबादी के लिए आजीविका का माध्‍यम बनी हुई है. इस दौरान पूजन सामग्री से लेकर खानपान और कपड़े तक हजारों करोड़ का कारोबार होता है. केवल कांवड़ के कारोबार की बात करें तो ये 5,000 करोड़ रुपये के पार जाने की उम्‍मीद है. ये संभावित आकलन है, सबसे बड़े व्‍यापार संगठन CAIT यानी कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) का. 

करोड़ों कांवड़िए, अरबों का कारोबार 

कैट के राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीन खंडेलवाल ने कहा कि कांवड़ यात्रा से जुड़ा कांवड़ निर्माण उद्योग आज लाखों लोगों की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार बन चुका है और यह भारत की सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ आर्थिक सशक्तीकरण का भी माध्यम है.

Latest and Breaking News on NDTV

उन्‍होंने कहा कि उत्तराखंड सरकार के अनुसार हाल के वर्षों में हरिद्वार कांवड़ यात्रा में लगभग 4.5 करोड़ श्रद्धालुओं की भागीदारी दर्ज की गई है, जबकि झारखंड सरकार के अनुसार देवघर के विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले में प्रतिवर्ष 50 से 55 लाख श्रद्धालु पहुंचते हैं. इन विशाल धार्मिक आयोजनों के कारण सावन के दौरान देशभर में कांवड़ों की मांग कई गुना बढ़ जाती है, जिससे एक व्यापक उत्पादन और व्यापारिक श्रृंखला सक्रिय हो जाती है.

यूपी-बिहार-झारखंड के कई शहरों में कारोबार 

खंडेलवाल ने बताया कि कांवड़ निर्माण मुख्य रूप से एक पारंपरिक कुटीर उद्योग है, जो उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और झारखंड के अनेक ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में संचालित होता है. बिजनौर के नजीबाबाद, हरिद्वार के ज्वालापुर, मेरठ, बागपत, सहारनपुर और आसपास के क्षेत्रों में हजारों कारीगर परिवार पीढ़ियों से इस कला से जुड़े हुए हैं. 

केवल नजीबाबाद के प्रमुख कांवड़ निर्माण क्लस्टर में ही 500 से अधिक कारीगर प्रतिवर्ष लगभग 2 से 2.5 लाख कांवड़ों का निर्माण करते हैं. वहीं झारखंड में देवघर, जसीडीह, मधुपुर, दुमका और संताल परगना क्षेत्र कांवड़ निर्माण और उससे जुड़े हस्तशिल्प उद्योग के प्रमुख केंद्र हैं, जहां हजारों कारीगर श्रावणी मेले और कांवड़ यात्रा की मांग को पूरा करने के लिए प्रतिवर्ष लाखों कांवड़ और धार्मिक सामग्री तैयार करते हैं.'

Latest and Breaking News on NDTV

खंडेलवाल ने कहा कि एक कांवड़ केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि अनेक उद्योगों और व्यवसायों को जोड़ने वाली आर्थिक श्रृंखला का केंद्र है. इसके निर्माण में बांस, लकड़ी, रंगीन कागज, कपड़ा, टोकरी, झंडे, धार्मिक प्रतीक, मोती, एलईडी लाइटें, सजावटी सामग्री तथा अन्य हस्तशिल्प उत्पादों का उपयोग होता है. इससे बांस उत्पादकों, कागज उद्योग, सजावटी सामग्री निर्माताओं, इलेक्ट्रिकल उत्पाद विक्रेताओं, परिवहन क्षेत्र तथा छोटे व्यापारियों को व्यापक व्यापारिक अवसर प्राप्त होते हैं.

कांवड़ पर कमाई का गणित  

कैट के महामंत्री ने बताया कि साधारण कांवड़ की कीमत लगभग 100 से 500 रुपये तक होती है, जबकि विशेष रूप से सजाई गई आकर्षक और आधुनिक कांवड़ों की कीमत 5,000 रुपये या उससे अधिक तक पहुंच जाती है. इससे सावन के दौरान कारीगरों और छोटे व्यापारियों के लिए एक बड़ा मौसमी बाजार तैयार होता है. कुल मिलाकर एक अनुमान के अनुसार कांवड़ से संबंधित वस्तुओं का सालाना सीजनल व्यापार लगभग 5 हजार करोड़ करोड़ रुपये का होता है. 

Latest and Breaking News on NDTV

खंडेलवाल ने कहा कि कांवड़ यात्रा से जुड़े निर्माण, परिवहन, सजावट, बिक्री, धार्मिक सामग्री, भोजनालय, आवास, अस्थायी बाजार, वस्त्र, फल, पेय पदार्थ तथा अन्य सहायक गतिविधियों को मिलाकर यह पूरा आर्थिक तंत्र प्रतिवर्ष एक से दो लाख से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष मौसमी रोजगार उपलब्ध कराता है. यात्रा मार्गों पर हजारों रेहड़ी-पटरी विक्रेता, छोटे दुकानदार, हस्तशिल्पी, परिवहन कर्मी और सेवा प्रदाता अपनी आजीविका अर्जित करते हैं.

वोकल फॉर लोकल, लोकल टू ग्‍लोबल 

उन्होंने कहा कि कांवड़ निर्माण उद्योग भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पारंपरिक कौशल, स्थानीय उद्यमिता और स्वदेशी उत्पादन क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण है. ये उद्योग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 'वोकल फॉर लोकल', 'लोकल टू ग्लोबल', 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' के संकल्प को जमीनी स्तर पर साकार कर रहा है. स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक कौशल से निर्मित कांवड़ न केवल भारतीय संस्कृति और आस्था का प्रतीक है, बल्कि लाखों परिवारों के आर्थिक सशक्तिकरण का माध्यम भी है.

खंडेलवाल ने सरकारों से आग्रह किया कि कांवड़ निर्माण से जुड़े कारीगरों को आधुनिक डिजाइन, वित्तीय सहायता, विपणन सुविधाएं, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, तकनीकी प्रशिक्षण और कौशल उन्नयन से जोड़ा जाए ताकि यह पारंपरिक उद्योग और अधिक संगठित होकर ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सके.

ये भी पढ़ें: डाबर शहद, घी व नारियल पानी के 100% Natural के दावे गलत, जानिए FSSAI क्यों उठाया ये कदम

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Kanwar Yatra, Kanwar Yatra News, UP Kanwar Yatra News, Bihar Kanwar Yatra, CAIT Report
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com