वित्त मंत्रालय की व्यय वित्त समिति (EFC) ने इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0 के लिए 1.25 लाख करोड़ रुपए के बजट को मंजूरी दे दी है. इससे देश में सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के अगले चरण का रास्ता साफ हो गया है. यह जानकारी एनडीटीवी प्रॉफिट की रिपोर्ट में दी गई है. इस प्रस्ताव को पिछले हफ्ते ईएफसी की मंजूरी मिल चुकी है. अब इसे अंतिम मंजूरी के लिए केंद्रीय कैबिनेट के पास भेजा जाएगा.
आईएसएम 2.0 का प्रस्तावित बजट, आईएसएम 1.0 के लिए दिए गए 76,000 करोड़ रुपए के बजट से काफी बड़ा है. पहले चरण में सरकार ने चिप मैन्युफैक्चरिंग, असेंबली और डिजाइन से जुड़ी 10 सेमीकंडक्टर सुविधाओं को मंजूरी दी थी. नई योजना का उद्देश्य भारत की सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन को और मजबूत करना है. इससे इंडस्ट्रियल गैस, स्पेशल केमिकल, कैपिटल इक्विपमेंट, एमएसएमई और दूसरे सपोर्टिंग सप्लायर्स को भी फायदा मिलने की उम्मीद है.
2030 तक घरेलू मांग का 75% पूरा करने का लक्ष्य
सरकार का लक्ष्य है कि इस योजना के जरिए 2030 तक भारत अपनी घरेलू सेमीकंडक्टर मांग का 75% तक हिस्सा खुद पूरा कर सके. इससे चिप्स के आयात पर निर्भरता कम होगी और भारत को ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने में भी मदद मिलेगी. नई स्कीम शुरू करने के लिए सरकार पहले ही अलग-अलग मंत्रालयों के साथ चर्चा कर चुकी थी. इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को सिर्फ वित्त मंत्रालय की मंजूरी का इंतजार था.
भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स की खपत और मैन्युफैक्चरिंग दोनों तेजी से बढ़ रहे हैं. इस समय देश में 65 करोड़ से ज्यादा स्मार्टफोन यूजर हैं. वहीं इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग का सालाना उत्पादन 12 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है. देश में अब एआई आधारित सिस्टम, डेटा सेंटर और इलेक्ट्रिक गाड़ियां भी तेजी से बन रही हैं. इन सभी के लिए सेमीकंडक्टर चिप्स की जरूरत होती है. बढ़ती मांग और इनोवेशन को देखते हुए भारत के लिए ग्लोबल सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन में मजबूत जगह बनाना जरूरी माना जा रहा है.
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के तहत अब तक 10 सेमीकंडक्टर प्लांट को मंजूरी दी जा चुकी है. इनका निर्माण तेजी से चल रहा है. गुजरात के साणंद में एक यूनिट में पायलट प्रोडक्शन लाइन शुरू हो चुकी है. वहीं अगले एक साल के भीतर चार और यूनिट में प्रोडक्शन शुरू होने की उम्मीद है. इसके अलावा एप्लाइड मैटेरियल्स, लैम रिसर्च, मर्क और लिंडे जैसी ग्लोबल कंपनियां भी सपोर्टिंग फैक्ट्रियों और सप्लाई चेन में निवेश कर रही हैं.
ये भी पढ़ें: हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम रिजेक्ट होने की 5 बड़ी वजहें, पॉलिसी लेते समय इन जरूरी बातों का रखें ध्यान
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं