US Tech Layoffs 2026: अमेरिका में नौकरी सिर्फ करियर नहीं, बल्कि हजारों भारतीयों के लिए पूरा जीवन बसाने का सपना रही है. बरसों तक जिन भारतीय इंजीनियरों और सॉफ्टवेयर डेवलपर्स ने बड़ी-बड़ी टीमें संभालकर अमेरिका की सबसे दिग्गज टेक कंपनियों को खड़ा किया, आज उनके लिए एक सिंगल ईमेल ने सब कुछ बदलकर रख दिया है. अमेरिकी टेक इंडस्ट्री में आई छंटनी (Layoffs) की ताजा आंधी ने सिर्फ नौकरियां ही नहीं छीनी हैं, बल्कि एक पुराना और खौफनाक डर दोबारा पैदा कर दिया है. एक ऐसा डर, जहां सिर्फ एक नौकरी जाने से अमेरिका में सालों से बसा-बसाया घर और पूरा भविष्य दांव पर लग जाता है.
आइए जानते हैं कि आखिर क्यों टेक सेक्टर में बढ़ती छंटनी और अमेरिकी कंपनियों का एक फैसला हजारों भारतीय परिवारों को वापस वतन लौटने पर मजबूर कर रहा है.
US टेक छंटनी ने बढ़ाई भारतीयों की चिंता
सिलिकॉन वैली में एक बार फिर बड़े स्तर पर छंटनी का दौर चल रहा है.सिलिकॉन वैली की बड़ी टेक कंपनियां इस समय भारी कॉस्ट-कटिंग यानी लागत कटौती मोड में काम कर रही हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई (AI) और ऑटोमेशन की तरफ तेजी से शिफ्ट होने के चलते बड़ी संख्या में कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है. Meta, Amazon, LinkedIn जैसी कंपनियां AI और ऑटोमेशन पर फोकस बढ़ाने के बीच कर्मचारियों की संख्या घटा रही हैं. इससे हजारों विदेशी कर्मचारियों, खासकर भारतीय टेक प्रोफेशनल्स पर दबाव बढ़ गया है.
इस साल टेक कंपनियों में 1.10 लाख से ज्यादा कर्मचारी को निकाला
Layoffs.fyi के डेटा के मुताबिक, इस साल अब तक टेक सेक्टर में 1.10 लाख से अधिक कर्मचारी अपनी नौकरी गंवा चुके हैं. इनमें बड़ी संख्या विदेशी वर्कर्स की मानी जा रही है, जिनमें भारतीय सबसे बड़ा हिस्सा हैं. मेटा (Meta) ने अपने रिसोर्सेज को एआई की तरफ मोड़ते हुए लगभग 8,000 पदों की कटौती की है, जबकि एमेजन (Amazon) और लिंक्डइन (LinkedIn) जैसी दिग्गज कंपनियों ने भी अपने यहां बड़ी छंटनी की है.
H-1B वीजा वालों के लिए 60 दिन की उलटी गिनती
अमेरिका में बड़ी संख्या में भारतीय इंजीनियर और सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल्स H-1B वीजा पर काम करते हैं,जो सीधे तौर पर उनकी नौकरी (एम्प्लॉयर) से जुड़ा होता है. अगर नौकरी चली जाती है, तो कर्मचारी के पास आमतौर पर सिर्फ 60 दिन का ग्रेस पीरियड होता है या I-94 स्टेटस खत्म होने तक जिसमें नया स्पॉन्सर ढूंढना होगा. ऐसा नहीं होने पर देश छोड़ना पड़ सकता है. FY25 के अमेरिकी सरकारी आंकड़ों के अनुसार H-1B वीजा अप्रूवल में भारतीयों की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा रही.
नौकरी जाने पर सिर्फ करियर पर नहीं, सपनों के आशियाने पर मंडराया संकट
इस छंटनी का असर सिर्फ सैलरी बंद होने तक सीमित नहीं है. यह परिवार, बच्चों की पढ़ाई, हेल्थकेयर, होम लोन, इमिग्रेशन पेपरवर्क और ग्रीन कार्ड प्रोसेस पर सीधा असर डाल सकता है. कई भारतीय सालों से ग्रीन कार्ड बैकलॉग में फंसे हैं और अमेरिका में लंबे समय के लिए बसने की योजना बना चुके थे.यह संकट उन भारतीयों के लिए बेहद पर्सनल और दर्दनाक है जो बरसों से अमेरिका में ग्रीन कार्ड (Green Card) के भारी बैकलॉग में फंसे हुए हैं. इनमें से कइयों के बच्चे अमेरिकी धरती पर पैदा हुए हैं, कई लोग वहां होम लोन (Mortgage) पर घर खरीद चुके हैं और बच्चों के स्कूल से लेकर हेल्थकेयर तक सब कुछ वहीं सेटल है. नौकरी जाते ही ये सारे लाइफ-प्लान्स रातों-रात बिखर सकता है.
B-1/B-2 वीजा बना अस्थायी सहारा
कई भारतीय कर्मचारी नौकरी जाने के बाद कानूनी रूप से अमेरिका में कुछ और महीने रुकने के लिए समय कम होने की वजह से B-1 या B-2 विजिटर वीजा में शिफ्ट होने की कोशिश कर रहे हैं ताकि नई नौकरी तलाश सकें.हालांकि कानूनन इस स्टेटस में रहते हुए इंटरव्यू देना और जॉब सर्च करना मुमकिन है, लेकिन इमिग्रेशन वकीलों का कहना है कि अब अमेरिकी अथॉरिटीज इन कनवर्टेड एप्लिकेशन्स की बहुत बारीकी से स्क्रूटनी जांच कर रही हैं.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब अमेरिकी अधिकारी ऐसे स्टेटस-चेंज आवेदनों की ज्यादा सख्ती से जांच कर रहे हैं.स्टेटस बदलने वाले आवेदकों से कड़े सवाल पूछे जा रहे हैं और अतिरिक्त दस्तावेजों की मांग की जा रही है, जिससे यह विजिटर वीजा वाला बैकअप प्लान भी अब मुश्किल हो गया है.
क्या है H-1B वीजा का '60-डे रूल'?
अमेरिकी नागरिकता और आप्रवासन सेवा (USCIS) के नियमों के मुताबिक, नौकरी जाने के बाद इन कर्मचारियों को नया एम्प्लॉयर या वीजा स्पॉन्सर ढूंढने के लिए केवल 60 दिनों का ग्रेस पीरियड (Grace Period) मिलता है. यह 60 दिन आखिरी सैलरी मिलने से नहीं, बल्कि कंपनी में काम के आखिरी दिन से गिने जाते हैं.
USCIS के नियमों के तहत H-1B वर्कर्स इस दौरान नई जॉब ढूंढ सकते हैं, किसी दूसरी वीजा कैटेगरी में आवेदन कर सकते हैं या अमेरिका छोड़ने की तैयारी कर सकते हैं. अगर कोई इस दो महीने के भीतर नई नौकरी खोजने और वीजा ट्रांसफर कराने में नाकाम रहता है, तो उसे कानूनी रूप से अमेरिका छोड़ना पड़ता है.
क्या टूटने लगा है अमेरिकन ड्रीम? भारत वापसी या दूसरे देशों की ओर रुख
दशकों तक अमेरिका भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए बेहतर करियर, मोटी सैलरी और ग्लोबल अपॉर्चुनिटी का सेंटर रहा. लेकिन लगातार छंटनी, वीजा पॉलिसी और मानसिक तनाव ने अब कई लोगों को दोबारा सोचने को मजबूर कर दिया है.
टेक सेक्टर में AI बन रहा नई चिंता का कारण
AI की एंट्री और बढ़ते इस्तेमाल ने टेक सेक्टर में भर्ती का पैटर्न को हमेशा के लिए बदल दिया है. इस बार की छंटनी पहले जैसी नहीं है.कंपनियां मैनेजमेंट लेयर घटा रही हैं, ऑटोमेशन बढ़ा रही हैं और AI-फोकस्ड रोल्स में निवेश कर रही हैं. कंपनियां रूटीन इंजीनियरिंग और सपोर्ट रोल्स को ऑटोमेशन टूल्स से रिप्लेस कर रही हैं. उदाहरण के लिए, Meta अकेले इस साल AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर 100 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च करने की तैयारी में है. इससे कर्मचारियों को डर है कि यह भर्ती में गिरावट कुछ समय के लिए नहीं, बल्कि लॉन्ग टर्म का बदलाव हो सकता है और कोडिंग के जॉब्स हमेशा के लिए कम हो सकते हैं.
किन भारतीयों पर असर कम होगा?
ग्रीन कार्ड या स्थायी निवास (Permanent Residency) वाले भारतीयों को नौकरी जाने पर तुरंत अमेरिका छोड़ने का खतरा नहीं होता. इसी तरह स्टूडेंट वीजा, डिपेंडेंट वीजा या सिटिजनशिप ट्रैक वाले लोगों के पास कुछ अधिक विकल्प हो सकते हैं. लेकिन H-1B वर्कर्स के लिए स्थिति ज्यादा मुश्किल है.
सेवरेंस पैकेज से पैसों की राहत, लेकिन इमिग्रेशन का बोझ बरकरार
रिपोर्ट्स के मुताबिक, मेटा जैसी कंपनियों से निकाले गए कर्मचारियों को 16 हफ्ते की बेसिक सैलरी प्लस हर साल के अनुभव पर दो हफ्ते की अतिरिक्त सैलरी और 18 महीने का फैमिली हेल्थकेयर कवरेज जैसा मजबूत सेवरेंस पैकेज मिल रहा है. लेकिन विदेशी कर्मचारियों के लिए असल चुनौती फाइनेंस नहीं, बल्कि उनके लीगल इमिग्रेशन स्टेटस को बचाए रखने की है.
जिन भारतीयों के पास ग्रीन कार्ड या अमेरिकी नागरिकता है, वे इस नौकरी जाने के तनाव से तो गुजर रहे हैं, लेकिन उन पर देश छोड़ने की तलवार नहीं लटकी होती, जबकि H-1B धारकों के लिए यह लड़ाई समय के खिलाफ एक बेहद मुश्किल रेस बन चुकी है.
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