Gig Workers Strike: देश में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के बढ़ते दामों ने आम जनता के साथ-साथ ऐप आधारित सेवाओं से जुड़े गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स की कमर तोड़ दी है. ईंधन की मार और कंपनियों की कथित मनमानी के विरोध में 'गिग एवं प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन' ने शनिवार को दोपहर 12:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक देशव्यापी सांकेतिक हड़ताल का आह्वान किया. गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन के आह्वान पर आज देश के प्रमुख शहरों में 60% से अधिक डिलीवरी पार्टनर्स और राइड-हेलिंग ड्राइवरों ने दोपहर 12:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक अपने ऐप्स बंद रखे.
यूनियन का स्पष्ट कहना है कि यदि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इसी तरह वृद्धि होती रही, तो देश के लगभग 1 करोड़ 20 लाख गिग वर्कर्स इस पेशे को छोड़ने पर मजबूर हो जाएंगे. GIPSWU के अनुसार, कंपनियां बढ़ती लागत का बोझ खुद उठाने या ग्राहकों पर डालने के बजाय सीधा वर्कर्स की जेब पर डाल रही हैं.
सुप्रीम कोर्ट के वकील ने बताया गिग वर्कर्स का दर्द
सुप्रीम कोर्ट के वकील और लेबर लॉ के जानकार जिया कबीर का कहना है कि 100 रूपये कमाकर सिर्फ 5 रूपये की बचत होगी.
उन्होंने NDTV से बात करते हुए इसे समझाया कि पेट्रोल की कीमतों में 3 रूपये के इजाफा होने के बाद कितना बड़ा असर गिग वर्कर्स पर पड़ेगा. यदि एक वर्कर ₹100 कमाता है, तो पहले उसके पास अपनी बुनियादी जरूरतों (शिक्षा, स्वास्थ्य, किराया और ईंधन) के बाद भोजन और बचत के लिए ₹15 बचते थे. लेकिन पेट्रोल-डीजल के दामों में मात्र ₹3 की वृद्धि होने से उसके ईंधन का खर्च बढ़कर ₹40 से ₹45 हो गया है, जिसके परिणामस्वरूप अब उसके पास पूरे दिन की मेहनत के बाद घर चलाने और बचत करने के लिए मात्र ₹5 ही शेष बच रहे हैं.
स्विगी डिलीवरी वर्कर्स ने क्या कहा?
स्विगी डिलीवरी वर्कर मनोज जिन्होंने 5 घंटे की हड़ताल भी की, उनका कहना है कि अगर हम 100 रुपये का तेल डलवाकर 100 रुपये का ही काम करेंगे, तो बचाएंगे क्या? तेल के दाम बढ़ने से हमारी गाड़ियों का एवरेज तो नहीं बढ़ जाएगा ना? हड़ताल में शामिल हुए स्विगी राइडर सिकंदर चौहान ने NDTV से बात करते हुए कहा कि 3 साल से कंपनी 1.5 किमी के लिए ₹15-16 दे रही है. पहले दिन के ₹800-900 बचते थे, अब तेल के मंहगे होने के बाद सिर्फ ₹400 बच रहे हैं. 7 लोगों का परिवार कैसे पालूं?
वहीं आदिल ने कहा कि 10 घंटे इस भीषण गर्मी में काम करने के बाद घर सिर्फ ₹300 ले जा पाते हैं. हमारे रेट कार्ड में सुधार हो यही अब एकमात्र रास्ता है. गिग वर्कर नाजिर का कहना है कि अब गुजारे के लिए 12 नहीं, बल्कि 13-13 घंटे काम करना होगा.
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और श्रम कानून विशेषज्ञ जिया अली कबीर ने इस हड़ताल को जायज ठहराते हुए कहा कि भारत की 90-95% लेबर अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर में है. इनके पास न कोई कॉन्ट्रैक्ट है, न पेंशन और न ही इंश्योरेंस. सरकार को इन्हें आधिकारिक तौर पर वर्कर्स का दर्जा देना चाहिए. ब्रिटेन के सुप्रीम कोर्ट ने टैक्सी ड्राइवरों को 'वर्कर' माना है, तो भारत में देरी क्यों? सरकार ने श्रेणी तो बनाई है, लेकिन बजट और कानूनी प्रावधान अब भी नदारद हैं. जिया का कहना है जैसेअभी तेल के दाम बढ़े हैं और उसी के अनुसार मजदूरी को भी बढ़ाया जाना चाहिए. मजदूरी को फ्यूल कॉस्ट से जोड़ा जाए यानी जैसे ही पेट्रोल के दाम बढ़ें, वर्कर्स का कमीशन भी उसी अनुपात में बढ़ जाए.
20 रुपये प्रति किलोमीटर न्यूनतम रेट की मांग
GIPSWU की अध्यक्ष सीमा सिंह ने तेल-गैस की कीमतों में बढ़ोतरी को गिग वर्कर्स पर सीधा प्रहार बताया है, जो पहले ही भीषण गर्मी और महंगाई की मार से जूझ रहे हैं. उन्होंने कहा, 'अमेजन, स्विगी, जेप्टो और अन्य कंपनियों के डिलीवरी वर्कर्स अब इस बढ़े हुए खर्च का बोझ उठाने की स्थिति में बिल्कुल नहीं हैं. हम सरकार और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से मांग करते हैं कि वर्कर्स के लिए कम से कम 20 रुपये प्रति किलोमीटर का न्यूनतम सर्विस रेट तय किया जाए.'
...तो प्रभावित होगी गिग इकोनॉमी
यूनियन ने चेताया कि यदि ईंधन और वाहनों के रखरखाव के खर्च के अनुपात में कमाई नहीं बढ़ी, तो लाखों वर्कर्स इस सेक्टर को छोड़ने के लिए मजबूर हो जाएंगे. ऐसे में देश की गिग इकोनॉमी पर बुरा असर होगा. नीति आयोग के अनुमानों के मुताबिक, इस सेक्टर में चुनौतियां तमाम हैं, लेकिन उन चुनौतियों के बावजूद इस सेक्टर में विस्तार की अपार संभावनाएं हैं.देश में गिग वर्कर्स की संख्या, जो 2020-21 में 77 लाख थी, वो वर्ष 2029-30 तक बढ़कर 2.3 करोड़ होने का अनुमान जताया जा रहा है.
आगे की तैयारी: जंतर-मंतर पर होगा प्रदर्शन
यूनियन ने सरकार और कंपनियों के सामने मुख्य रूप से प्रति ऑर्डर हैंडलिंग शुल्क में ₹20 की वृद्धि की मांग रखी है. GIPSWU के राष्ट्रीय संयोजक निर्मल गोराना ने चेतावनी दी है कि यदि तत्काल कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक विशाल प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा. गिग इकॉनमी भारत के शहरी ढांचे की रीढ़ बन चुकी है. लेकिन अगर इस रीढ़ को उचित वेतन और सामाजिक सुरक्षा नहीं मिली, तो इनपर निश्चित तौर से संकट बढ़ेगा.
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