मध्य पूर्व (Middle East) में जारी भीषण युद्ध का सीधा असर अब दुनिया भर की ऊर्जा सप्लाई पर दिखने लगा है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है और ब्रेंट क्रूड लगातार दूसरे दिन 80 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया है. सोमवार को ट्रेडिंग के दौरान कीमतें 81.89 डॉलर तक जा पहुंचीं, जो जनवरी 2025 के बाद का सबसे उच्चतम स्तर है.
क्यों बढ़ रही हैं कीमतें?
युद्ध के चलते लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे प्रमुख समुद्री रास्तों में सैकड़ों तेल वाहक जहाज फंसे हुए हैं. सप्लाई रुकने की आशंका और युद्ध के लंबा खिंचने के डर ने पिछले 24 घंटों में कीमतों में 10% से ज्यादा की तेजी ला दी है. बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तनाव कम नहीं हुआ, तो कीमतों में यह अस्थिरता और भयावह रूप ले सकती है.
भारत के लिए बढ़ी मुसीबत
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है. इसमें से करीब 40-45% हिस्सा अकेले मध्य पूर्व के देशों से आता है. पेट्रोलियम मंत्रालय की रिपोर्ट (PPAC) के मुताबिक, फरवरी 2026 में भारतीय बास्केट के लिए कच्चे तेल की औसत कीमत 69.01 डॉलर थी. लेकिन पिछले महज तीन दिनों में ही यह औसत 15% तक बढ़ चुका है.
आम आदमी की जेब पर असर!
अगर कच्चा तेल इसी तरह महंगा होता रहा, तो भारत का 'ऑयल इम्पोर्ट बिल' लाखों करोड़ रुपये बढ़ सकता है, जिसका सीधा असर देश के राजकोषीय घाटे और घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है. परिवहन महंगा होने से फल, सब्जी और अन्य जरूरी सामानों की महंगाई बढ़ने का खतरा भी पैदा हो गया है.
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