कहने को तो युद्ध ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच छिड़ा है, लेकिन इस आग की तपन भारतीय बंदरगाहों से होते हुए आम आदमी की जेब तक पहुंच चुकी है. मिडिल ईस्ट में मचे इस कोहराम ने न केवल समुद्री रास्तों पर 'ताला' लगा दिया है, बल्कि भारत के आयात-निर्यात (Import-Export) के गणित को भी बिगाड़ कर रख दिया है. अब ये संकट केवल रणनीतिक नहीं रहा, बल्कि हमारे और आपके लिए 'आर्थिक विलेन' बन गया है, जो जूते-कपड़े, ड्राइफ्रूट्स, दाल और फल-सब्जियों के दाम बढ़ा कर हमारे-आपके घरों का बजट बिगाड़ सकता है.
पोर्ट पर सड़ रही सब्जियां,
मुंबई का जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (JNPT) और मुंद्रा पोर्ट इस वक्त संकट के केंद्र में हैं. यहां 1,000 से अधिक कंटेनर फंसे हुए हैं, जिनमें नासिक का प्याज, अंगूर, केला और पपीता भरा है. ये सामान खाड़ी देशों, विशेषकर दुबई के लिए रवाना होना था, लेकिन युद्ध के कारण वहां का बाजार अस्थायी रूप से ठप है.

शिपिंग का 'समय और पैसा' दोनों बढ़ा
सबसे बड़ी चिंता शिपिंग रूट को लेकर है. अभी तक भारतीय जहाज 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) के रास्ते कम समय में खाड़ी देशों तक पहुंच जाते थे. लेकिन अब सुरक्षा कारणों से जहाजों को 'केप ऑफ गुड होप' (अफ्रीका के नीचे से) का लंबा चक्कर लगाकर यूरोप और अमेरिका जाना होगा. इस बदलाव के चलते समय की भी बर्बादी होगी और लागत भी बढ़ेगी.
- समय की बर्बादी: शिपिंग का समय 20 से 25 दिन बढ़ जाएगा.
- लागत में उछाल: लंबा रास्ता मतलब ज्यादा ईंधन और भारी-भरकम 'शिपिंग इंश्योरेंस'.

त्यौहारों की तैयारियों को लगा झटका
रमजान का महीना चल रहा है और खाड़ी देशों (UAE, सऊदी अरब, कतर) में ईद के लिए भारत से भारी मात्रा में फल, सब्जियां, बासमती चावल और चीनी का निर्यात होता है. अकेले यूएई को भारत हर महीने लगभग 3 अरब डॉलर का सामान बेचता है. निर्यातकों का कहना है कि अगर 10 दिनों तक युद्ध नहीं रुका, तो 300 से अधिक कंटेनरों में रखा 'पेरिशेबल' (जल्द खराब होने वाला) माल बर्बाद हो जाएगा. निर्यातकों पर प्रति कंटेनर 8,000 रुपये रोजाना का अतिरिक्त खर्च (रेफ्रिजरेशन और पार्किंग) बढ़ गया है.
दाल और जूतों पर भी दिखेगा असर
युद्ध की मार सिर्फ खाने-पीने की चीजों तक सीमित नहीं है. भारत से निर्यात होने वाले टेक्सटाइल (कपड़े) और फुटवियर (जूते) के ऑर्डर भी अधर में लटके हैं. दूसरी ओर, दालों की कीमतों में उछाल आने की पूरी आशंका है. ऑल इंडिया दाल मिलर्स एसोसिएशन के मुताबिक, भारत ऑस्ट्रेलिया से 'मसूर और चना' अरब सागर के रास्ते ही मंगवाता है. इस रूट पर उथल-पुथल रही तो आने वाले दिनों में दालों के दाम बढ़ना तय है.
ईरान-भारत व्यापार का बदलता समीकरण
भारत और ईरान के बीच कभी 17 अरब डॉलर का व्यापार होता था, जो अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद घटकर 1.68 अरब डॉलर रह गया है. भारत अब ईरान से मुख्य रूप से सेब, पिस्ता, खजूर और कीवी मंगवाता है. युद्ध लंबा खिंचा तो ड्राई फ्रूट्स के शौकीनों की जेब ढीली होना तय है. इसके अलावा, भारत का 'चाबहार पोर्ट' प्रोजेक्ट भी संकट के घेरे में है, जो मध्य एशिया तक पहुँचने का भारत का रणनीतिक रास्ता है.

किसान और निर्यातक पर 'दोहरी मार'
एक ओर शिपिंग इंश्योरेंस और माल भाड़ा बढ़ रहा है, तो दूसरी ओर घरेलू बाजार में निर्यात रुकने से प्याज और अन्य फसलों के दाम गिरने का डर है. भारतीय निर्यातक संस्था (FIEO) और हॉर्टिकल्चर एसोसिएशन ने सरकार से गुहार लगाई है कि पोर्ट पर हो रहे अतिरिक्त खर्च में राहत दी जाए. अरब सागर में उठती ये लहरें जल्द शांत नहीं हुईं, तो भारत में महंगाई का एक नया दौर शुरू हो सकता है.

केंद्र सरकार की क्या है तैयारी?
सोमवार को वाणिज्य मंत्रालय ने एक हाई-लेवल इमरजेंसी मीटिंग बुलाई, जिसमें युद्ध से पैदा होने वाले आर्थिक झटकों को कम करने के लिए एक रणनीतिक रोडमैप तैयार किया गया. बैठक में इस बात पर गंभीर चर्चा हुई कि कैसे माल ढुलाई (Freight) और बीमा (Insurance) की बढ़ती लागत को नियंत्रित किया जाए. सरकार ने 5 मोर्चे पर काम करने का फैसला लिया है.
- व्यापार बाधित होने की स्थिति में एक्सपोर्ट से जुड़ी मंजूरी की प्रक्रियाओं को आसान और लचीला बनाया जाएगा.
- फल, सब्जी और दवाओं जैसे जल्दी खराब होने वाले सामानों के लिए सीमा शुल्क अधिकारियों के साथ मिलकर 'फास्ट ट्रैक क्लीयरेंस' की व्यवस्था होगी.
- निर्यातकों को भुगतान में दिक्कत न हो, इसके लिए बैंकों और बीमा संस्थानों के साथ सरकार लगातार संपर्क में रहेगी.
- जहाजों के शेड्यूल में बदलाव के बावजूद कंटेनरों की कमी न हो, इसके लिए वैकल्पिक व्यवस्था तलाशी जा रही है.
- सभी संबंधित मंत्रालय एक-दूसरे के साथ रियल-टाइम डेटा साझा करेंगे ताकि किसी भी संकट का तुरंत समाधान निकाला जा सके.
सरकार ने स्पष्ट किया है कि भारत की प्राथमिकता घरेलू उत्पादन और उपभोग के लिए जरूरी आयात को निर्बाध बनाए रखना है. साथ ही छोटे और मध्यम उद्योगों (MSME) के हितों की रक्षा करना सरकार की प्राथमिकता है, ताकि निर्यात में कमी न आए.
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