क्या आगामी 31 मार्च तक देश से खत्म हो जाएगा नक्सलवाद? केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) के 57वें स्थापना दिवस पर कटक में और इससे पहले फरवरी 2025 में रायपुर की सुरक्षा समीक्षा बैठक के बाद दावा किया था कि 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद पूरी तरह समाप्त हो जाएगा. उन्होंने कहा था कि सुरक्षा बलों के प्रयासों से नक्सलवाद को अंतिम सांस भी लेने नहीं दिया जाएगा और कोई नागरिक इस हिंसा का शिकार नहीं होगा. यह दावा उन आंकड़ों पर आधारित है जो दर्शाते हैं कि लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म (LWE) से संबंधित घटनाओं में काफी कमी आई है. आगे बढ़ने से पहले नक्सली हिंसा से जुड़ी कुछ बड़ी घटनाओं को याद करना जरूरी है.
नक्सली हिंसा की वो घटनाएं जो इतिहास में दर्ज हैं
- छह अप्रैल 2010: छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में सीआरपीएफ की एक टुकड़ी पर नक्सलियों ने घात लगाकर हमला किया. इस हमले में सीआरपीएफ के 75 और राज्य पुलिस का एक जवान शहीद.
- 25 मई 2013: छत्तीसगढ़ के सुकुमा जिले की झीरम घाटी में नक्सलियों ने कांग्रेस नेताओं के एक काफिले पर घात लगाकर हमला किया. इसमें 32 लोग मारे गए. मरने वालों में छत्तीसगढ़ कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल शामिल थे.
- 17 मई 2010, छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने लैंडमाइन विस्फोट के जरिए एक बस को निशाना बनाया. इसमें 40 से अधिक लोगों की मौत हो गई. यह हमला सुरक्षा बलों को निशाना बनाकर किया गया था, लेकिन इसकी चपेट में आम नागरिक भी आए.
मोदी सरकार से पहले और बाद में नक्सलवाद
भारत ने नक्सली हिंसा में बहुत कुछ खोया है.लेकिन अब अमित शाह के दावे को समझने के लिए 2014 से पहले की स्थिति और उसके बाद उठाए गए कदमों की समीक्षा जरूरी है. बेशक, 2014 से पहले नक्सलवाद की स्थिति काफी गंभीर थी. नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गांव से हुई थी. वहां किसानों का एक विद्रोह तेजी से फैला. यह आंदोलन 1980-90 के दशक में माओवादी विचारधारा के साथ संगठित हो गया. यह 2005-2010 के बीच अपने चरम पर था. देश में 2010 के दौरान नक्सली हिंसा की 1,936 घटनाएं दर्ज की गईं. इन घटनाओं में 1,005 लोग मारे गए थे. साल 2004 से 2014 तक नक्सली हिंसा की कुल 16,463 घटनाएं दर्ज की गईं. इनमें सुरक्षा बलों के 1,851 जवान और 4,766 आम नागरिक शहीद हुए. इस दौरान देश के करीब 180 जिले लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म से प्रभावित थे. यह देश की 20 फीसदी आबादी वाले क्षेत्रों को कवर करता था. लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म से छत्तीसगढ़,झारखंड,ओडिशा,बिहार,आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्य सबसे ज्यादा प्रभावित थे.

आतंरिक सुरक्षा मामलों के जानकार दावा करते हैं कि उस समय केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय की कमी थी. सुरक्षा अभियान अक्सर प्रतिक्रियात्मक थे और विकास कार्य रुके हुए थे. नक्सलियों ने जंगलों और आदिवासी क्षेत्रों का फायदा उठाकर हथियार, विस्फोटक और फंडिंग का नेटवर्क बनाया.नक्सलियों ने सड़कों, पुल और खनन क्षेत्र जैसे आर्थिक ढांचे पर हमले किए.सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2010 में आर्थिक बुनियादी ढांचे पर 365 हमले दर्ज हुए. नागरिकों की मौतें भी ज्यादा थीं, क्योंकि नक्सली गांवों में भय का माहौल बनाए रखते थे. पुलिस स्टेशन कमजोर थे. क्षेत्रफल के हिसाब से प्रभावित इलाका 18 हजार वर्ग किलोमीटर से ज्यादा था. इस स्थिति ने न केवल आंतरिक सुरक्षा को चुनौती दी बल्कि विकास को भी बाधित किया.
मोदी सरकार में 2014 के बाद क्या-क्या बदला
साल 2014 के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने नक्सल समस्या को हल करने के लिए एकीकृत रणनीति अपनाई. सबसे महत्वपूर्ण कदम 2017 में तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह की ओर से पेश की गई SAMADHAN रणनीति थी. इसका पूरा रूप है: S-Smart Leadership (स्मार्ट नेतृत्व), A-Aggressive Strategy (आक्रामक रणनीति), M-Motivation and Training (प्रेरणा और प्रशिक्षण), A-Actionable Intelligence (कार्रवाई योग्य खुफिया जानकारी), D-Dashboard-based KPIs (डैशबोर्ड आधारित प्रमुख प्रदर्शन संकेतक), H-Harnessing Technology (प्रौद्योगिकी का उपयोग), A-Action Plan for each Theatre (प्रत्येक थिएटर के लिए कार्य योजना) और N-No Access to Financing (वित्तीय पहुंच बंद). इस रणनीति ने सुरक्षा, विकास और पुनर्वास को एक साथ जोड़ा.

सुरक्षा के मोर्चे पर सरकार ने केंद्रीय और राज्य बलों के बीच समन्वय बढ़ाया. फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस (FOBs) स्थापित किए गए. इनसे नक्सलियों की सप्लाई लाइन बाधित हुई. हेलीपैड और कैंप की संख्या बढ़ाई गई. ड्रोन, जीपीएस, नाइट विजन और अन्य तकनीकी उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ाया गया. खुफिया तंत्र को मजबूत किया गया. इससे सटीक ऑपरेशन संभव हुए. साल 2025 में सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ में 270 नक्सलियों को मार गिराया. इन मुठभड़ों में 680 नक्सली गिरफ्तार किए गए और 1,225 ने आत्मसमर्पण किया. साल 2014 से अब तक आठ हजार से ज्यादा नक्सली सरेंडर कर चुके हैं.
कैसे काम आया सड़कों का जाल
वित्तीय पहुंच बंद करने के लिए नक्सलियों के फंडिंग स्रोतों पर नजर रखी गई. प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) जैसी एजेंसियों का उपयोग बढ़ाया गया. नक्सली लेवी वसूली और खनन से होने वाली कमाई को रोका गया. इससे उनका आर्थिक आधार कमजोर हुआ. विकास के क्षेत्र में भी कदम उठाए गए. लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म प्रभावित क्षेत्रों के लिए विशेष योजनाएं शुरू की गईं, जैसे रोड रिक्वायरेंट प्लान (आरआरपी) और लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म से प्रभावित इलाकों के लिए रोड कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट (RCPLWEA). इन योजनाओं के तहत 14,978 किलोमीटर सड़कें बनाई गईं. इन सड़कों ने जंगलों में पहुंच को आसान बनाया.हिंसा प्रभावित इलाकों में स्कूल, अस्पताल और बिजली की सुविधाएं बढ़ाई गईं. विशेष केंद्रीय सहायता (Special Central Assistance) और बैकलॉग स्कीम्स के जरिए इन जिलों में विकास कार्य तेज किए गए.इन कदमों से स्थानीय आदिवासी समुदायों को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया गया.इससे नक्सलियों की भर्ती कम हुई.

सरकार की कोशिशों की गवाही आंकड़े देते हैं.साल 2014 में देश के 126 जिले नक्सली हिंसा से प्रभावित थे. ये 2018 में 90, 2021 में 70, 2024 में 38 और 2025 में 11-18 रह गए. सबसे प्रभावित जिलों की संख्या 36 से घटकर छह रह गई. साल 2004-2014 की तुलना में 2014-2024 में नक्सली हिंसा की घटनाओं में 53 फीसदी की कमी दर्ज की गई. सुरक्षा बलों की मौतें 73 फीसदी और नागरिक मौतें 70 प्रतिशत घटीं. साल 2010 की 1,936 घटनाओं की तुलना में 2024 में मात्र 374 घटनाएं हुईं. मौतों की संख्या 1,005 से घटकर 150 रह गई. प्रभावित क्षेत्र 18 हजार वर्ग किलोमीटर से घटकर 4,200 वर्ग किलोमीटर रह गया.
क्या चुनौती बना रहेगा नक्सलवाद
इतना सब होने के बाद भी चुनौतियां अभी भी बाकी हैं. कुछ जिले जैसे छत्तीसगढ़ के बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर में अभी भी नक्सली गतिविधियां हैं. नक्सली जंगलों में छिपे हैं और कभी-कभी हमले करते हैं. सरेंडर नीति के बाद भी कुछ समूह सक्रिय हैं. विकास कार्यों की गति बनाए रखना और स्थानीय प्रशासन को मजबूत करना जरूरी है. सरकार का दावा है कि 10-प्वाइंट प्लान के तहत नक्सल-मुक्त क्षेत्रों में दोबारा समस्या न उभरे, इसके लिए आय सृजन, भूमि रिकॉर्ड, स्वास्थ्य और शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है.

समग्र रूप से 2014 से पहले की खंडित और कमजोर प्रतिक्रिया की तुलना में बाद के सालों में सुरक्षा और विकास का संतुलित दृष्टिकोण अपनाया गया. SAMADHAN रणनीति, बुनियादी ढांचे का विकास और खुफिया-आधारित कार्रवाइयों ने नक्सल प्रभाव को सीमित किया. प्रभावित जिलों और घटनाओं में कमी आई है, लेकिन पूर्ण समाप्ति का दावा 31 मार्च 2026 तक पूरा होना बाकी है. यह प्रक्रिया दिखाती है कि निरंतर प्रयास और समन्वय से आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियां कम की जा सकती हैं.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)