तेल और प्राकृतिक गैस जैसे बहुमूल्य संसाधनों से परिपूर्ण पश्चिम एशिया की तासीर ही कुछ ऐसी है की वहां शांति नदारद ही रहती है.अनवरत युद्ध एवं अराजकता उसे घेरे रहती है. अभी भी पश्चिम एशिया के हालात ऐसे ही हैं. गाजा अभी भी बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है और यमन में गृह युद्ध अभी तक खत्म नहीं है हुआ है वहीं दूसरी ओर ईरान में सरकार-विरोधी प्रदर्शनों के चलते कमज़ोर हुए शासन-तंत्र के खिलाफ अमरीका या इजरायल की सैन्य कार्रवाई की आशंका से अभी इनकार नहीं किया जा सकता है. इन सब के बीच पश्चिम एशिया के एक और देश सीरिया में, जहां एक दशक से भी अधिक समय तक चले गृह युद्ध के चलते हुए तख्तापलट के बाद आई क्षणिक स्थिरता पर एक बार फिर अराजकता, विघटन और आंतरिक कलह के बादल मंडरा रहे हैं.
अहमद अल शरा दिसंबर 2024 में बशर अल असद की सरकार का तख्तापलट कर सीरिया के राष्ट्रपति बने थे. वो अल क़ायदा में भी रह चुके हैं.सीरिया की अंतरिम सरकार की सेना और सीरिया के प्रभावी अल्पसंख्यक समुदाय कुर्दों के नेतृत्व वाली सैन्य टुकड़ी सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेज (एसडीएफ) के बीच संघर्ष विराम हुआ है. यह लेख लिखे जाने तक दोनों पक्षों के बीच चार दिन से जारी युद्धविराम को अगले 15 दिन के लिए बढ़ा दिया गया है. इस युद्ध विराम से शरा सरकार खुद को मजबूत पाएगी या फिर इससे सीरिया के अल्पसंख्यकों में उसके प्रति अविश्वास और बढ़ेगा. इसको लेकर विश्लेषकों की राय बटी हुई है.
क्या है सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेज ?
सीरियाई डेमोक्रेटिक फोर्सेज (एसडीएफ) एक बहुजातीय सैन्य गठबंधन है जिसका गठन 2015 में सीरियाई गृहयुद्ध के दौरान इस्लामिक स्टेट (आईएस) से लड़ने के लिए किया गया था. कुर्द, अरब, तुर्कमेन, असीरियन और अर्मेनियाई सहित विभिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लड़ाकों से मिलकर बना एसडीएफ सीरियाई गृह युद्ध से पूर्व में अमेरिका समर्थक सैन्य गुटों से उभरा. मार्च 2019 तक आईएस की पराजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद एसडीएफ उत्तरी और पूर्वी सीरिया के स्वायत्त प्रशासन की आधिकारिक सैन्य शक्ति बन गया, जिसे वहां के निवासी 'रोजावा' के नाम से जानते हैं. इस क्षेत्र में सीरिया के वो स्वशासित क्षेत्र शामिल हैं जो सीरियाई केंद्रीय सरकार से स्वायत्तता हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं. बीते एक दशक में एसडीएफ 60 हजार पुरुषों और महिलाओं की एक ताकत बन गई थी. इनमें आधे से अधिक कुर्द के बजाय अरब लड़ाके थे. जहां एक ओर इस समूह के आईएस-विरोधी प्रयासों की व्यापक रूप से प्रशंसा की गई, वहीं दूसरी ओर कुछ सीरियाई अरबों द्वारा उसके घरेलू शासन की बढ़ती तानाशाही नीतियों (विशेष रूप से उसके नियंत्रण वाले अरब-बहुसंख्यक क्षेत्रों में) के लिए आलोचना भी की जाती रही है. कई असद-विरोधी विद्रोहियों ने भी कुर्दों द्वारा असद का विरोध करने के बजाय क्षेत्रीय नियंत्रण को प्राथमिकता देने के कारण उन्हें संदेह की नज़र से देखा है.

दिसंबर 2024 में बशर अल-असद की सरकार के पतन के बाद से अल-शरा के हयात तहरीर अल-शाम समूह के नेतृत्व में सीरिया के नए नेतृत्व को युद्धग्रस्त देश में सत्ता को मजबूत करने के लिए संघर्ष करना पड़ा है. हालांकि शरा ने एक अधिक एकीकृत और प्रतिनिधि सीरिया के निर्माण का संकल्प लिया है, लेकिन उनके शासनकाल में देश भर में गहरे विभाजन और घातक सांप्रदायिक संघर्षों का सामना करना पड़ा है. कुर्द क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित करने की मंशा से करीब 20 दिन पहले शुरू किए गए सैन्य अभियान में सीरियाई सेना ने दीर अल-ज़ौर और रक्का प्रांतों के साथ-साथ हसाका प्रांत के कुछ हिस्सों पर नियंत्रण हासिल कर लिया है. सीरियाई सरकारी सेना के हसाका में आगे बढ़ने के साथ ही एसडीएफ ने अल-होल शिविर से अपनी वापसी की घोषणा कर दी है, जहां आईएस से कथित तौर पर जुड़े हजारों लोगों को रखा गया है. इस क्षेत्र का अधिकांश भाग, जिसमें सीरिया के सबसे बड़े तेल क्षेत्र, एक प्रमुख जलविद्युत बांध और कृषि क्षेत्र भी शामिल हैं, एसडीएफ द्वारा इस्लामिक स्टेट से तब छीन लिया गया था जब कुर्द नेतृत्व वाली सेना सीरिया में जिहादियों से लड़ने वाली अमेरिका की मुख्य सहयोगी थी.आईएस को हराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कुर्दों ने इस जीत का लाभ उठाते हुए सीरिया के एक तिहाई भूभाग पर निर्विवाद नियंत्रण हासिल कर लिया था.
क्या अमरीका की ‘यूज़ एंड थ्रो नीति' का शिकार बने कुर्द
सीरिया की सरकारी सेना के हालिया हमले को लेकर अमरीका के रुख़ के कारण कुर्दों का अमरीका के साथ गठबंधन भी टूटता हुआ नज़र आ रहा है. दरअसल यह माना जा रहा है कि शरा को सीरिया की गद्दी पर बैठाने में अमरीका, तुर्किये और इजराइल का हाथ था. शरा ने सत्ता में आकर जिस तरह से इन तीनों ही देशों के प्रति मित्रता या नर्मी वाला रवैया अपनाया है, उससे शक की गुंजाइश ख़त्म हो जाती है. ट्रंप के सत्ता में आने के बाद अमरीका और सीरिया में नजदीकियां खूब बढ़ी हैं. इसी के चलते उसने अपने पारंपरिक मित्र कुर्दों का साथ छोड़ कर उन्हें शरा के नेतृत्व वाली अंतरिम सीरियाई सरकार में शामिल होने की सलाह दी है. दरअसल कुर्द भी सीरिया में अन्य अल्पसंख्यकों की तरह शरा के इस्लामी शासन और उसकी अनुशासनहीन सेनाओं को लेकर सशंकित हैं. वे शरा की सेना और आईएस आतंकवादियों के बीच अंतर नहीं करते हैं. सीरिया पर तुर्किये के दबाव को भी शरा द्वारा एसडीएफ के ऊपर की गई सैन्य कार्रवाई के पीछे एक बड़ा कारण माना जा रहा है.
तुर्की की मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा से प्रेरित कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (पीकेके) से संबंधों के कारण एसडीएफ लड़ाकों को आईएस के आतंकवादियों के विपरीत माना जाता था, जिससे वे वाशिंगटन के लिए एक व्यावहारिक सहयोगी बन गए, इसने उन्हें इस्लामिक स्टेट के खिलाफ अमेरिकी हवाई अभियान के लिए जमीनी सैनिकों के रूप में काम करने के लिए तैयार किया. इस साझेदारी से तुर्किये शुरू से ही नाराज था क्योंकि पीकेके ने उसके खिलाफ दशकों लंबा विद्रोह छेड़ रखा था. तुर्किये एसडीएफ को पीकेके का ही अंग मानता है. इसलिए उसने शरा सरकार पर इनके खिलाफ कार्यवाही करने के लिए दबाव बनाया था.

उत्तरी सीरिया के एक इलाके में समझौते के बाद विजय चिन्ह बनाते एसडीएफ के लड़ाके.
क्या सफल होगा शरा और एसडीएफ का समझौता
अमरीका ने पिछले साल मार्च में, शरा और एसडीएफ नेता मज़लूम अब्दी के बीच एसडीएफ और उसके संबद्ध संगठनों को सीरियाई राज्य में एकीकृत करने के लिए एक समझौता करवाया था. इसके व्यावहारिक विवरणों पर 2025 के अंत से पहले अंतिम रूप दिया जाना था. लेकिन ये वार्ताएं अंततः ठप हो गईं, क्योंकि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर दुर्भावना और समझौता करने की अनिच्छा का आरोप लगाया था. सनद रहे कि शरा सरकर के हमले से कुछ सप्ताह पहले कुर्द अधिकारियों को एक समझौता पेश किया गया था,इस शर्त के साथ कि उसे तुरंत स्वीकार कर लिया जाए. समझौते के तहत एसडीएफ की तीन डिवीजनों और दो बटालियनों को सीरियाई राष्ट्रीय सेना में एकीकृत करने की अनुमति दी जानी थी. उसके नेता अब्दी को सीरिया का उप रक्षा मंत्री बनाया जाना था. परन्तु कुर्द अधिकारि सीरिया के अन्य हिस्सों में सरकारी बलों और उनके सहयोगियों द्वारा सांप्रदायिक हत्याओं की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए सुरक्षा गारंटी की मांग करने लगे. कुछ समय बाद एसडीएफ ने शरा सरकार के उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया. दोनों पक्षों में इस बात पर गतिरोध था कि क्या कुर्द उत्तर-पूर्व में सीरियाई सरकारी बलों की तैनाती को स्वीकार करेंगे.
इसके कुछ दिनों बाद छह जनवरी को सरकारी सेनाएं सीरिया के दूसरे सबसे बड़े शहर अलेप्पो में कुर्द-नियंत्रित इलाकों में एक सुनियोजित अभियान के तहत घुस गईं. इसके परिणामस्वरूप दो दिनों के भीतर अमेरिका की बातचीत के बाद कुर्दों को शहर से पीछे हटना पड़ा. वहां से सरकारी सैनिकों ने तेजी से रक्का और दीर एज़ोर प्रांतों पर कब्जा कर लिया, जो उस समय उनके हाथ में आ गए जब अरब कबायली लड़ाके एसडीएफ से अलग हो गए. फिर 18 जनवरी को शरा और अब्दी 14 सूत्री समझौते और युद्धविराम पर सहमत हो गए. परन्तु दमिश्क ने इस बार पहले से भी सख्त शर्तें रखीं है, जिसके अनुसार कुर्द सैन्य कर्मियों को अब सामूहिक इकाइयों के बजाय केवल "व्यक्तिगत आधार पर" ही सीरिया की सेना में एकीकृत किया जाएगा, जो एसडीएफ के लिए एक बड़ा झटका है. इसके साथ-साथ अब्दी को उप मंत्री पद का प्रस्ताव भी वापस ले लिया गया है. हालांकि राष्ट्रपति शरा ने भी कुर्दों के कुछ विषयों के समाधान का प्रयास तो किया है. इसके अंतर्गत उन्होंने एक फरमान जारी कर कुर्दिश भाषा को अरबी के साथ देश की आधिकारिक भाषा और कुर्द नव वर्ष को राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया है. उनके कोशिशों को कुर्द समुदाय को शांत करने और उनका विश्वाश जीतने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है.
कब तक टिकेगा युद्ध विराम समझौता?
देखा जाए तो यह युद्धविराम काफी हद तक प्रतीकात्मक ही रहा है क्योंकि कोबानी के दक्षिण में और हसाका के आसपास कुर्द बलों और दमिश्क से संबद्ध इकाइयों के बीच संपर्क रेखाओं पर हमले और झड़पें जारी हैं. ऑनलाइन प्रसारित हो रहे कई वीडियो में सीरियाई सेना द्वारा जिंदा पकड़े गए कुर्द लड़ाकों को शरा की सेना द्वारा मारते हुए दिखाया गया है, जो दोनों पक्षों के बीच परस्पर दुश्मनी और अविश्वास को झलकाता है. इसके कुछ ठोस कारण भी हैं. साल 2012 में कुर्द बलों ने अल-नुसरा फ्रंट (सीरिया में अल-कायदा से संबद्ध संगठन, जिसका नेतृत्व उस समय वर्तमान राष्ट्रपति शरा कर रहे थे) को उन्हीं क्षेत्रों में खदेड़ दिया था,जो अब फिर से युद्धक्षेत्र में तब्दील हो रहे हैं. ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले दिनों में तीन में से एक परिणाम की संभावना है: पहला,एसडीएफ के लिए आत्मसमर्पण जैसा समझौता होगा; दूसरा, एसडीएफ हसाका और कोबानी के लिए स्वायत्तता की मांग करते हुए एक जवाबी प्रस्ताव लेकर लौटेगा या तीसरा की दोनों पक्षों के बीच लड़ाई जारी रहेगी. शरा सरकार ने एसडीएफ की जेलों से आईएस के बंदियों को इराक में स्थानांतरित करने के लिए चल रहे अमेरिकी अभियान का समर्थन करने के लिए पंद्रह दिनों के लिए सैन्य अभियान बंद करने की घोषणा तो की है, परन्तु उसके बाद क्या होगा, इसको लेकर केवल कयास ही लगाए जा सकते हैं. लेकिन इतना तय है कि राष्ट्रपति शरा के इतिहास के चलते सीरिया के अल्पसंख्यक समुदायों जैसे की द्रुज़, अलावाइट और कुर्द आदि के अन्दर उत्पन्न अविश्वास के कारण सीरिया में अभी भी स्थाई शांति आने में बहुत वक़्त लग सकता है.
डिस्क्लेमर: डॉ. पवन चौरसिया,इंडिया फाउंडेशन में रिसर्च फेलों के तौर पर काम करते हैं और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और राजनीति पर लगातार लिखते रहते हैं. इस लेख में दिए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.