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युद्ध के बिना एक महीने भी क्यों नहीं रह पाए अमेरिका और ईरान, नाक का सवाल क्यों बन गया है होर्मुज स्ट्रेट

डॉ. अमर सिंह
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जुलाई 10, 2026 13:32 pm IST
    • Published On जुलाई 10, 2026 13:32 pm IST
    • Last Updated On जुलाई 10, 2026 13:32 pm IST
युद्ध के बिना एक महीने भी क्यों नहीं रह पाए अमेरिका और ईरान, नाक का सवाल क्यों बन गया है होर्मुज स्ट्रेट

अमेरिका और ईरान ने 19 जून, 2026 को स्विट्जरलैंड में 14-सूत्रीय समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर दस्तखत किए थे. इसके बाद लगने लगा था कि दोनों देशों के बीच जारी युद्ध खत्म होने वाला है. लेकिन जुलाई 2026 के पहले हफ्ते में घटनाक्रम ने अचानक से नया मोड़ ले लिया. ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में व्यापारिक जहाजों पर हमला कर दिया. इसके जवाब में अमेरिका ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए. इसके जवाब में ईरान ने बहरीन और कुवैत स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाया. इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने युद्धविराम का अंत होने की घोषणा की.

दरअसल यह घटनाक्रम केवल दो देशों के बीच सैन्य टकराव नहीं है, इसके पीछे ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्गों का नियंत्रण, परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन, घरेलू राजनीति और वैश्विक भू-राजनीति के जटिल समीकरण काम कर रहे हैं. सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब युद्धविराम लागू था, तब संघर्ष दोबारा क्यों शुरू हुआ? क्या यह केवल टैंकरों पर हमलों की प्रतिक्रिया है या इसके पीछे कहीं अधिक गहरी रणनीतिक सोच काम कर रही है?

फिर आमने-सामने क्यों आ गए हैं अमेरिका और ईरान

ताज़ा संकट की शुरुआत होर्मुज़ स्ट्रेट में व्यापारिक जहाज़ों पर हुए हमलों से हुई. अमेरिका का आरोप है कि ईरान समर्थित बलों ने क़तर के एलएनजी टैंकर 'अल-रेकयात', सऊदी अरब के झंडे वाले कच्चे तेल के सुपर टैंकर 'वेद्यान' और एक अन्य व्यावसायिक जहाज़ को निशाना बनाया.ये तीनों टैंकर ओमान के तट के निकट दक्षिणी समुद्री मार्ग से गुजर रहे थे. इसके समुद्री मार्गों को लेकर अभूतपूर्व गतिरोध पैदा हो गया है. अमेरिका जहाज़ों को दक्षिणी मार्ग से गुजरने की सलाह दे रहा है. उसका दावा है कि उसकी नौसेना इस रास्ते की सुरक्षा सुनिश्चित कर रही है. वहीं ईरान उन जहाज़ों को गुज़रने की इजाज़त नहीं दे रहा है, जो उत्तरी रास्ते का इस्तेमाल नहीं करते हैं. जबकि पारंपरिक मध्य समुद्री मार्ग को अभी भी बारूदी सुरंगों की आशंका की वजह से असुरक्षित माना जा रहा है. इस टकराव ने होर्मुज़ स्ट्रेट को सैन्य संघर्ष के केंद्र के साथ-साथ वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन की सबसे संवेदनशील कड़ी बना दिया है.

ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने संकेत दिया है कि होर्मुज़ स्ट्रेट की सुरक्षा, निगरानी और जहाज़ों की आवाजाही में ईरान की भूमिका निर्णायक रहेगी. इस मुद्दे पर ईरान अपने रुख से पीछे हटने को तैयार नहीं है. इस प्रकार होर्मुज़ केवल समुद्री मार्ग नहीं रह गया है, बल्कि ईरान के लिए कूटनीतिक सौदेबाज़ी का प्रभावी साधन बन चुका है. वहीं अमेरिका होर्मुज़ को एक अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग मानते हुए बिना किसी बाधा या अतिरिक्त शुल्क के सभी देशों के जहाज़ों के लिए खुला रखने की नीति पर अडिग है. 

ईरान के खिलाफ अमेरिका की रणनीतिक सोच क्या है

अमेरिका के ईरान पर हालिया हमले को केवल टैंकरों पर हमलों की प्रतिक्रिया नहीं मानना चाहिए, बल्कि यह उसकी अपनी 'रेड लाइन्स' स्पष्ट करने और क्षेत्रीय व्यवस्था को अपने अनुकूल बनाए रखने का प्रयास है. अमेरिका दशकों से अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की निर्बाध आवाजाही को अपनी वैश्विक रणनीति का प्रमुख आधार मानता रहा है. यदि व्यापारिक जहाज़ों पर हमले बिना किसी प्रभावी जवाब के जारी रहते हैं, तो इससे समुद्री सुरक्षा व्यवस्था कमजोर होगी, ऊर्जा का बाज़ार अस्थिर होगा और ईरान समर्थित समूहों का मनोबल बढ़ सकता है. इसी वजह से अमेरिका ने सीमित लेकिन व्यापक सैन्य कार्रवाई की. इसका मकसद पूर्ण युद्ध छेड़े बिना ही ईरान को संदेश था कि समुद्री सुरक्षा उसके लिए 'रेड लाइन' है.

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अमेरिका की रणनीति का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू भविष्य की वार्ताओं में अपनी स्थिति मजबूत रखना है. उसका मानना है कि यदि वह हर उकसावे पर नरम प्रतिक्रिया देगा, तो परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर उसकी सौदेबाजी की क्षमता कमज़ोर पड़ जाएगी. इसलिए सैन्य शक्ति का प्रदर्शन केवल युद्ध के लिए नहीं, बल्कि वार्ता में बेहतर स्थिति प्राप्त करने का साधन भी है.'शक्ति के माध्यम से शांति' की अवधारणा इसी सोच को दिखाती है. 

अमेरिका पर सहयोगी देशों का भरोसा

होर्मुज़ से निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करना पश्चिम एशिया में अमेरिकी सामरिक प्रभाव, उसके सहयोगी देशों की ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक समुद्री व्यवस्था में उसकी नेतृत्वकारी भूमिका बनाए रखने के लिए भी जरूरत है. यदि अमेरिका ईरान की कार्रवाई पर प्रभावी प्रतिक्रिया न दे, तो उसके क्षेत्रीय साझेदार, विशेषकर इजरायल और खाड़ी देश उसकी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं पर सवाल उठा सकते हैं. इसलिए हालिया कार्रवाई का उद्देश्य केवल ईरान को संदेश देना नहीं था, बल्कि अपने क्षेत्रीय साझेदारों को यह भरोसा दिलाना भी था कि अमेरिका अब भी उनकी सुरक्षा का सबसे विश्वसनीय साझेदार है.

ईरान को नियंत्रित रखना अमेरिका की चीन और रूस संबंधी रणनीति से भी जुड़ा है. अमेरिका को डर है कि यदि ईरान पर दबाव कम होता है, तो वह चीन और रूस के साथ अपने सामरिक और आर्थिक संबंध और गहरे कर सकता है. इससे पश्चिम एशिया में अमेरिकी प्रभाव कमज़ोर होगा. इसका रणनीतिक लाभ उसके वैश्विक प्रतिद्वंद्वियों को मिल सकता है. ऐसे में अमेरिकी प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं इज़रायल की सुरक्षा, ईरान को परमाणु हथियार क्षमता हासिल करने से रोकना और ऊर्जा आपूर्ति के समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना. इसलिए ईरान के विरुद्ध अमेरिकी नीति केवल द्विपक्षीय विवाद नहीं, बल्कि व्यापक वैश्विक शक्ति-प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है.

अमेरिका के खिलाफ ईरान की रणनीति क्या है

इस युद्ध ने यह भी संकेत दिया है कि ईरान की विदेश और सुरक्षा नीति में महत्वपूर्ण बदलाव आ रहा है. सर्वोच्च नेता रहे अयातुल्ला अली ख़ामेनेई की रणनीति को अक्सर 'न युद्ध,न शांति' (No War, No Peace) की नीति कहा जाता था.इसमें प्रत्यक्ष युद्ध से बचते हुए प्रॉक्सी समूहों और सीमित सैन्य दबाव के माध्यम से अपने हितों की रक्षा की जाती थी. लेकिन ईरान का नया नेतृत्व अधिक आक्रामक और जोखिम उठाने वाली रणनीति अपनाता दिख रहा है. इस लड़ाई में ईरान ने बहरीन,कतर और कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया, यह उसकी बदली हुई सामरिक सोच का संकेत है. ईरान अब युद्ध-पूर्व यथास्थिति में लौटने को तैयार नहीं है. उसका मानना है कि संघर्ष के बावजूद वह अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति और रणनीतिक क्षमता बनाए रखने में सफल रहा है. इसलिए भविष्य की किसी भी वार्ता में वह होर्मुज़ स्ट्रेट, परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे मुद्दों पर पहले की तुलना में अधिक मजबूत स्थिति से बातचीत करना चाहता है. दूसरे शब्दों में, ईरान अब केवल प्रतिबंधों में राहत नहीं, बल्कि अपनी नई सामरिक वास्तविकताओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार करवाना चाहता है.

युद्ध के बाद से ईरान की रणनीतिक प्राथमिकताओं में होर्मुज़ स्ट्रेट सबसे ऊपर आ गया है. ईरान के लिए यह केवल समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि उसकी सबसे प्रभावशाली 'बार्गेनिंग चिप' और रणनीतिक प्रतिरोध का साधन बन चुका है.ईरान का मानना है कि यदि उस पर सैन्य, आर्थिक या कूटनीतिक दबाव बढ़ाया जाता है, तो वह होर्मुज़ पर अपने प्रभाव का उपयोग कर अमेरिका और पश्चिमी देशों पर रणनीतिक दबाव बना सकता है. इस नजरिए से होर्मुज़ ईरान के लिए परमाणु हथियार विकसित करने से भी अधिक उपयोगी रणनीतिक हथियार साबित हो रहा है. जरूरत पड़ने पर वह युद्ध जारी रखने का जोखिम भी उठा सकता है.

खाड़ी के देशों पर हमले क्यों करता है ईरान

अमेरिका की तुलना में ईरान की सैन्य और आर्थिक क्षमता सीमित अवश्य है, लेकिन उसकी रणनीति पारंपरिक युद्ध जीतने की नहीं, बल्कि विरोधी के लिए संघर्ष की लागत (Cost of Conflict) बढ़ाने की रही है. इसी कारण उसकी सुरक्षा नीति 'डिटरेंस बाय पनिशमेंट' (Deterrence by Punishment) पर आधारित है. इसका मतलब यह हुआ कि यदि उसकी सुरक्षा, संप्रभुता या आर्थिक हितों को चुनौती दी गई, तो संघर्ष उसकी सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित करेगा. बहरीन और कुवैत स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला और होर्मुज़ में जहाज़ों की आवाजाही पर उसका कठोर रुख इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.

यह दर्शाता है कि ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष केवल शक्ति-संतुलन का प्रश्न नहीं, बल्कि गहरे वैचारिक और रणनीतिक टकराव का परिणाम है. चार दशक से अधिक समय से दोनों देशों के बीच अविश्वास इतना गहरा है कि कोई भी समझौता स्थायी रूप नहीं ले सका. यही कारण है कि हर युद्धविराम अस्थायी और हर शांति प्रक्रिया नाज़ुक साबित होती है. मध्यस्थ देशों का मानना है कि स्थायी समाधान तभी संभव है जब ईरान की आर्थिक और सामरिक चिंताओं और अमेरिका की परमाणु सुरक्षा संबंधी आशंकाओं का समानांतर समाधान निकले. अमेरिका और इजरायल, ईरान को भारी सैन्य क्षति पहुंचाने की क्षमता रखते हैं, लेकिन वे उसकी मूल रणनीतिक प्राथमिकताओं से पीछे हटाने में सफल नहीं हुए. 

ताजा घटनाक्रम यह भी बताता है कि तीखी बयानबाज़ी और सीमित सैन्य कार्रवाई के बावजूद दोनों देशों के लिए अंततः कूटनीतिक वार्ता ही सबसे व्यावहारिक विकल्प बनी हुई है. गहरे अविश्वास, परस्पर विरोधी रणनीतिक हितों और लगातार सैन्य टकराव ने वार्ता की प्रक्रिया को नाज़ुक बना दिया है. यही कारण है कि पश्चिम एशिया में शांति की संभावना अभी खत्म नहीं हुई है. 

(डिस्क्लेमर: लेखक अलीगढ़ के डीएस कॉलेज के रक्षा और स्त्रातजिक अध्ययन विभाग में अस्सिटेंट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है. )

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