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छत्तीसगढ़ के माओवादी आंदोलन से आदिवासियों को क्या मिला

शुभ्रांशु चौधरी
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जनवरी 02, 2026 19:01 pm IST
    • Published On जनवरी 02, 2026 18:59 pm IST
    • Last Updated On जनवरी 02, 2026 19:01 pm IST
छत्तीसगढ़ के माओवादी आंदोलन से आदिवासियों को क्या मिला

16 जनवरी 2024 का दिन बस्तर में माओवादी आंदोलन के इतिहास का एक अहम मोड़ था. माओवादियों ने साउथ बस्तर की अपनी सभी टुकड़ियों को जमा किया था ताकि वे छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के पामेड़ इलाके में चिंतावागु नदी के पास बने धर्मावरम सीआरपीएफ कैंप पर हमला कर सकें. वे पुलिस कैंप बनाने की राज्य सरकार की रणनीति को करारा जवाब देना चाहते थे, जो 2019 के बाद से बहुत तेज हो गई थी. इस रणनीति ने जिसने उनका काम मुश्किल कर दिया था.

धर्मावरम के नाकाम हमले की तैयारी

धर्मावरम हमला एक तरह से नाकाम रहा.माओवादियों के प्रेस नोट के मुताबिक उन्होंने सैकड़ों स्थानीय लोगों की मदद से 600 ग्रेनेड लॉचर के गोले दागे थे. माओवादियों ने 35 सुरक्षाबलों को मारने का दावा किया था.वहीं पुलिस का कहना था कि इस हमले में नौ जवान घायल हुए थे. इस मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने की. उसने कहा,''माओवादियों ने हमले के लिए बहुत बारीक तैयारी की थी, जिसमें टारगेट कैंप की हूबहू नकल वाला एक डमी ट्रेनिंग कैंप बनाना भी शामिल था.''  माओवादियों ने घास से बनी छद्म ड्रेस भी पहनी थी, इसकी प्रेस में काफी चर्चा हुई थी. 

लेकिन एक बात जिसे कम लोग ही जानते हैं, वो यह है कि धर्मावरम के नाकाम हमले के बाद क्या हुआ.यह एक दुर्लभ पल था, जब सभी माओवादी डिवीजनल कमेटियां (डीवीसी) एक साथ थीं. उन्होंने एक चिट्ठी में वो सब लिखा जो उनके दिमाग में पिछले कुछ समय से चल रहा था. सभी माओवादी डीवीसी में करीब शत-प्रतिशत आदिवासी लड़ाके हैं, हालांकि हर कमेटी में एक तेलुगु 'माइंडर' यानी सेक्रेटरी होता था.उसकी ही आमतौर पर चलती थी. उस ड्राफ्ट चिट्ठी में कहा गया,''इन पुलिस कैंपों की वजह से लोगों से मिलना और समर्थन हासिल करना मुश्किल होता जा रहा है. इसलिए हमारा सुझाव है कि लड़ाई जारी रखने के लिए एक वैकल्पिक रणनीति अपनानी चाहिए. हमें लगता है कि हमें कुछ समय के लिए हथियार डाल देने चाहिए और विकल्पों के बारे में सोचना चाहिए.''

तेलुगु बनाम आदिवासी नेतृत्व

यह ज्यादातर तेलुगु नेतृत्व वाले माओवादी आंदोलन के बहुसंख्यक आदिवासी कैडर के विद्रोह का एक बहुत ही दुर्लभ प्रदर्शन था. हालांकि बस्तर में 99 फीसदी माओवादी कैडर आदिवासी थे, इसके बाद भी उस समय तक पार्टी की सबसे ताकतवर सेंट्रल कमेटी (सीसी) में स्थानीय आदिवासियों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं था. साउथ बस्तर की सेक्रेटरी सुजाता (जिन्होंने बाद में तेलंगाना पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया था), माओवादी नेता किशनजी की विधवा हैं, उनसे गुजारिश की गई कि वो इस चिट्ठी को सीसी तक ले जाएं. हिड़मा, जो शीर्ष आदिवासी माओवादी नेता थे.वह उस समय दंडकारण्य स्टेट कमेटी का हिस्सा थे (उन्हें उसी साल बाद में सीसी में शामिल किया गया), उनसे अनुरोध किया गया कि वो इस चिट्ठी के बारे में दूसरी डीवीसी की राय लें. हिड़मा बीते साल सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए. 

छत्तीसगढ़ में आत्मसमर्पण के लिए जाते माओवादी कैडर.

छत्तीसगढ़ में आत्मसमर्पण के लिए जाते माओवादी कैडर.

बदकिस्मती से सीसी ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया. यह उसी समय की बात है जब दिसंबर 2023 में छत्तीसगढ़ में बीजेपी के सत्ता में आने के ठीक बाद गृह मंत्री विजय शर्मा ने शांति वार्ता की पेशकश की थी. भले ही चिट्ठी खारिज कर दी गई, लेकिन उसने अपना काम कर दिया था. हिड़मा को दंडकारण्य की करीब सभी डीवीसी का समर्थन मिला, जो लोगों के करीब रहते थे और रणनीति में बदलाव की उनकी इच्छा को दर्शाते थे. जब तक बड़े नेता शामिल न हों, माओवादियों की ऐसी चिट्ठियां ज्यादातर कुरियर के जरिए आती-जाती हैं. इसमें लंबा समय लगता है. हाल ही में सरेंडर करने वाले सीसी के सदस्य वेणुगोपाल के मुताबिक, उस चिट्ठी को सीसी में कुछ समर्थन मिला था. मई 2025 में अपनी मौत से ठीक पहले जनरल सेक्रेटरी नांबला केशव राव का मन बदलने में भी इसका हाथ था.

शांति वार्ता की संभावनाओं की तलाश

नांबला केशव राव ने दूसरे सीसी सदस्यों को लिखना और शांति वार्ता की संभावनाएं तलाशने के लिए मध्यस्थों से संपर्क करना शुरू कर दिया था. इस बात को माओवादी पार्टी का मौजूदा नेतृत्व झूठ बताकर खारिज करता है. हिड़मा, जो सीसी में स्थानीय आदिवासियों का एकमात्र प्रतिनिधि थे (अब रामदेर नाम के एक और स्थानीय आदिवासी को शामिल किया गया है), वन अधिकारों और स्वायत्तता के आदिवासी मुद्दों पर बातचीत में ज्यादा दिलचस्पी रखते थे. जब 'बातचीत के बारे में बातचीत' से सरकार की ओर से कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला, तो वेणुगोपाल ने एक और सीसी सदस्य रूपेश के साथ सरेंडर कर दिया, जिसने 'उस चिट्ठी' का समर्थन किया था. लेकिन हिड़मा नए नेतृत्व के साथ चले गए. उसने लड़ाई जारी रखने की कसम खाई.

इस बीच, राज्य में बीजेपी सरकार होने की वजह से नए जोश के साथ और ज्यादा कैंप लगाने की रणनीति, सरेंडर कर चुके माओवादियों और स्थानीय आदिवासी लड़ाकों की मदद से बहुत सफल साबित हो रही थी. इस आक्रामक अभियान में माओवादी पार्टी ने अपने कई तेलुगु सीसी नेताओं को खो दिया. उन्होंने शांति वार्ता की मांग करने के लिए अपने समर्थकों को सक्रिय किया, लेकिन वे तब पीछे हट गए जब वेणुगोपाल और रूपेश ने दावा किया कि उन्होंने सरकार से तीन मांगों पर बातचीत की है. इन मांगों में 'आदिवासी मुद्दों' पर बातचीत की हिड़मा की मांगें शामिल नहीं थीं. अपने आखिरी दिनों में हिड़मा ने आदिवासी समाज के एक मध्यस्थ को एक और चिट्ठी भेजी थी. उसमें उन्होंने कहा था कि वह सरेंडर करने को तैयार हैं, लेकिन 'वन अधिकारों और आदिवासी स्वायत्तता' के मुद्दों पर बातचीत चाहता है.

आदिवासियों के हिस्से में क्या आया

हिड़मा के समर्थकों का आरोप है कि हिड़मा की लोकेशन मौजूदा माओवादी नेतृत्व ने ही पुलिस को लीक की थी,जिन्होंने उसे मरवा दिया, जब उसने 'सरेंडर से पहले आदिवासी मुद्दों पर कुछ बातचीत' की मांग की. इस कहानी की सच्चाई चाहे जो हो, यह बात साफ दिखती है कि चार दशक लंबे इस दुस्साहस में आदिवासियों को एक बार फिर सभी पक्षों ने धोखा दिया.आदिवासियों ने इसके लिए सबसे बड़ी कीमत चुकाई और बदले में उन्हें लगभग कुछ नहीं मिला.

डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो लोकतांत्रिक मीडिया के प्रयोग सीजीनेट स्वर और छत्तीसगढ़ में नई शांति प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है. 

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