अमेरिका-ईरान के बीच हुए समझौते (एमओयू) पर 14 जून को डिजिटल दस्तखत हुए थे.इसके पांच दिन बाद 19 जून को इसे औपचारिक मंजूरी दी गई. इस एमओयू को एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी के रूप में पेश किया गया, खासकर ऐसे समय जब पश्चिमी एशिया में स्थिरता की जरूरत है. इस 14-सूत्रीय समझौते का मकसद सैन्य तनाव को रोकना, ईरान और इजरायल के बीच और टकराव को टालना, समुद्री रास्तों को सुरक्षित रखना, कूटनीतिक बातचीत को बढ़ावा देना और एक और क्षेत्रीय युद्ध के जोखिम को कम करने के लिए तंत्र बनाना है. युद्ध के विनाशकारी नतीजों को देखते हुए, कई लोगों ने इस समझौते का स्वागत किया है. इसे तेजी से खतरनाक होते क्षेत्रीय माहौल में एक बहुत जरूरी राहत के रूप में देखा जा रहा है.
इसके बाद भी किसी भी कूटनीतिक समझौते की असली परीक्षा उसके इरादों में नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत से निपट पाने की उसकी क्षमता में होती है. हालांकि यह एमओयू तनाव कम करने के लिए ढांचा बनाने में तो सफल रहा है, लेकिन सुरक्षा के लिहाज से यह उतना भरोसेमंद नहीं लगता. इसे इजरायल-लेबनान की उत्तरी सीमा पर साफ तौर पर देखा जा सकता है. वहां भूगोल, सैन्य ढांचे और ऐतिहासिक अनुभव खतरे की धारणा को ऐसे आकार देते हैं, जिसे यह समझौता नजरअंदाज करता हुआ दिखता है.
अमेरिका-ईरान समझौते पर क्या सोचते हैं इजरायली
मैं उसी दिन इजरायल पहुंची थी, जिस दिन एमओयू पर डिजिटल दस्तखत किए गए थे. शिक्षाविदों, पूर्व सैन्य अधिकारियों, स्थानीय अधिकारियों, नीति विशेषज्ञों और उत्तरी इजरायल के निवासियों के साथ बातचीत में एक बात खास तौर पर निकलकर सामने आई.उनमें कूटनीति को लेकर थोड़ा विरोध था. ज्यादातर लोगों ने इलाके में बड़े युद्ध को रोकने की कोशिशों को जरूरी और सही माना. हालांकि इस बात पर भी आम सहमति थी कि यह समझौता असुरक्षा की असली वजहों की बजाय उसके लक्षणों को संबोधित करता है. यह चिंता भी बार-बार जताई गई कि भले ही एमओयू दुश्मनी को कम कर दे, लेकिन यह असुरक्षा के उस माहौल को ठीक करने का बहुत कम काम करता है, जिसने उत्तरी इजरायल को दशकों से कमजोर बना रखा है.
इजरायली लोगों के इस संदेह को समझने के लिए, हमें सबसे पहले इजरायल-लेबनान सीमा के भूगोल को समझना होगा. कई अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से अलग इजरायल की उत्तरी सीमा समतल जमीन नहीं है. दक्षिणी लेबनान में पहाड़ियां, पहाड़ की चोटियां, घाटियां और ऊंचाई पर बसे गांव हैं. वहां से उत्तरी इजरायल का काफी हिस्सा दिखाई देता है. मैंने इजरायल के सबसे उत्तरी कस्बों में से एक कफर गिलाडी की यात्रा की. इस दौरान इस भूगोल के रणनीतिक महत्व का पता तुरंत चल गया. सीमा पर बने ऑब्जर्वेशन पॉइंट पर खड़े होकर, लेबनान के कफर किला, अल-अदीसेह और मारून अल-रस जैसे गांवों को साफ-साफ देखा जा सकता है. ये गांव इजरायली इलाके के ऊपर ऊंची जगहों पर बसे हैं. इन ऊंची जगहों से उत्तरी इजरायल का बड़ा हिस्सा, जिसमें आम लोगों की बस्तियां, खेती की जमीन, सड़कें और रणनीतिक बुनियादी ढांचे शामिल हैं दिखाई देते हैं.

दक्षिणी लेबनान के एक गांव पर इजरायली हमलों के बाद से वहां से उठता धुंआ.
ईरान-अमेरिका की चर्चा में कहां है इजरायल का भूगोल
कूटनीतिक चर्चाओं में भूगोल को अक्सर नजरंदाज कर दिया जाता है. इसके बाद भी यह सुरक्षा के सबसे स्थायी कारकों में से एक बना हुआ है. ऊंची जमीन निगरानी रखने, खुफिया जानकारी जमा करने, छिपने और निशाना साधने में फायदा देती है. युद्धविराम समझौते पर दस्तखत होने के बाद भी ये फायदे खत्म नहीं होते. वे जमीन की बनावट में ही बने रहते हैं.
यह सच्चाई मेटुला, किर्यत श्मोना और कफर गिलाडी जैसे समुदायों के लिए बहुत अहम है. इन समुदायों ने उत्तरी सीमा पर बार-बार हुए युद्ध को सबसे अधिक झेला है. किर्यत श्मोना में 20 हजार से अधिक लोग रहते हैं. यह कस्बा अक्सर हिज्बुल्लाह के रॉकेट और मिसाइलों की जद में रहा है. मेटुला शहर लेबनान की सीमा से सीधा सटा हुआ है. कफर गिलाडी, जो इजरायल के ऐतिहासिक 'किबुत्जिम' (सामूहिक बस्तियों) में से एक है, वह रणनीतिक रूप से उस संवेदनशील जगह पर स्थित है, जिस पर दक्षिणी लेबनान से नजर रखी जा सकती है. तनाव बढ़ने के दौरान, वहां से बड़े पैमाने पर लोगों को हटा दिया गया, इससे इनमें से कई गांव अस्थायी रूप से 'घोस्ट टाउन' (सुनसान बस्तियों) में बदल गए. स्कूल बंद हो गए, कारोबार ठप हो गए, खेती-बाड़ी का काम रुक गया और निवासियों को सुरक्षा के लिए दूसरी जगहों पर जाना पड़ा.
इजरायल के लोगों का बड़ा डर क्या है
इस विस्थापन ने लोगों की सुरक्षा के बारे में सोच को पूरी तरह से बदल दिया. वहां के कई निवासियों के लिए सुरक्षा को कूटनीतिक बयानों से नहीं, बल्कि इस बात से मापा जाता है कि क्या वे हमले के डर के बिना सामान्य जीवन जी सकते हैं. यही वजह है कि तनाव कम करने की दिशा में व्यापक समर्थन होने के बाद भी अमेरिका-ईरान समझौते को बहुत सावधानी के साथ देखा जा रहा है.
दक्षिणी लेबनान में हिज्बुल्लाह की सैन्य मौजूदगी को देखते हुए यह चिंता और भी गंभीर हो जाती है. इजरायली सुरक्षा आकलन लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1701 के प्रावधानों के बावजूद, हिज्बुल्लाह ने सीमावर्ती इलाकों में निगरानी चौकियां, हथियारों के गोदाम, लॉन्च साइट, कमांड सेंटर और लॉजिस्टिकल इंफ्रास्ट्रक्चर बना रखे हैं. इजरायली अधिकारियों ने कफार किला, अल-अदीसेह और मारून अल-रस जैसे गांवों की पहचान ऐसी जगहों के रूप में की है, जहां हिज्बुल्लाह ने सीमा के पास निगरानी क्षमता और ऑपरेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाए रखा था.
इजरायल की उत्तरी सीमा के गांवों का रणनीतिक महत्व क्या है
इन गांवों का महत्व उनकी आबादी के आकार से कहीं ज्यादा है. उनकी रणनीतिक अहमियत उनकी भौगोलिक स्थिति से आती है. ऊंचे इलाकों में बसे होने के कारण, वहां से इजरायली इलाकों पर दूर तक नजर रखी जा सकती है. इसलिए इजरायली सैन्य योजना में इनकी अहम भूमिका रही है. इजरायली अधिकारियों का कहना है कि इन गांवों और उनके आस-पास हिज्बुल्लाह की सैन्य गतिविधियों ने उन्हें एक बड़े ऑपरेशनल माहौल का हिस्सा बना दिया है, जिसका मकसद निगरानी रखना, खुफिया जानकारी जुटाना और उत्तरी इजरायल पर हमले करना है.
इजरायल के लिए खतरा केवल रॉकेट और मिसाइल ही नहीं हैं. इजरायल की सुरक्षा योजनाएं बनाने वाले अधिकारी अक्टूबर 2023 से हिज्बुल्लाह की खास 'रदवान फोर्स' पर अधिक ध्यान दे रहे हैं. यह एक खास तरह की टुकड़ी है, जिसे जासूसी, घुसपैठ और सीमा पार हमले के लिए प्रशिक्षित किया गया है. आम रॉकेट हमलों के उलट, रदवान फोर्स को लेकर चिंता इस बात की है कि वे सीमा के पास बसे इजरायली इलाकों में घुसपैठ कर सकते हैं. इजरायल की रणनीतिक सोच में भूगोल और सैन्य क्षमता आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं. ऊंचे इलाकों में बसे गांव, निगरानी चौकियां, जमीन के नीचे बना ढांचा और खास हमलावर टुकड़ियां मिलकर एक ऐसी सुरक्षा चुनौती पैदा करती हैं, जिसे केवल युद्धविराम से हल नहीं किया जा सकता.

ईरान के साथ समझौता ज्ञापन पर दस्तखत करते अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप.
क्या इजरायल की चिंताएं कागजी हैं
ये चिंताएं केवल कागजी नहीं हैं. सात अप्रैल 2023 की घटना से कुछ महीने पहले अप्रैल में मैंने उत्तरी इजरायल की यात्रा की थी. इस दौरान मुझे सीमा पार बनी कई ऐसी सुरंगों को देखने का मौका मिला, जिनके बारे में इजरायली अधिकारियों का कहना था कि वे हिज्बुल्लाह ने बनाई थीं. उन सुरंगों का पता 'ऑपरेशन नॉर्दर्न शील्ड' के दौरान लगाया गया था. इस बड़े संघर्ष पर किसी का भी राजनीतिक नजरिया कुछ भी हो, इन सुरंगों से पता चलता है कि सीमा का इलाका सुरक्षा के लिहाज से कितना संवेदनशील और तनावपूर्ण बन गया था. इनसे यह भी पता चला कि इजरायल की चिंताएं केवल दिखाई देने वाले सैन्य ढांचे तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें जमीन के नीचे बने नेटवर्क और घुसपैठ के रास्ते भी शामिल हैं. इन रास्तों और नेटवर्क का इस्तेमाल दक्षिणी लेबनान के भौगोलिक हालात का फायदा उठाने के लिए किया जा सकता है.
इसी माहौल में कई इजरायली नागरिक अमेरिका-ईरान के बीच हुए समझौते की व्यावहारिकता का आकलन करते मिले. इस समझौते में तनाव कम करने और इलाके में बड़े संघर्ष को रोकने के मकसद से कई अहम प्रावधान शामिल हैं. हालांकि,इजरायल की सुरक्षा से जुड़े कई अहम मुद्दों पर इसमें बहुत कम स्पष्टता है. समझौते में इस बात के संकेत बहुत कम हैं कि लितानी नदी के दक्षिण में हिज्बुल्लाह के सैन्य ढांचे से किस तरह निपटा जाएगा, क्या रदवान फोर्स की खास टुकड़ियों को सीमा के पास के इलाकों से हटाया जाएगा, नियमों के पालन की निगरानी कैसे की जाएगी या नियमों के उल्लंघन की स्थिति में उन्हें लागू करने के लिए क्या तरीके अपनाए जाएंगे.
क्या युद्ध विराम से इजरायल सीमा पर कम होगा तनाव
यह कमी इसलिए भी काफी अहम है क्योंकि यह क्षेत्रीय कूटनीति में एक बड़ी चुनौती को दिखाती है.युद्धविराम का जुड़ाव व्यवहार से होता है, जबकि सुरक्षा ढांचे का क्षमताओं से. पहला कम समय के लिए हिंसा कम कर सकता है और दूसरा इसे दोबारा होने से रोकने की कोशिश करता है. दक्षिणी लेबनान का इतिहास बताता है कि लागू करने वाले असरदार तरीकों की कमी अच्छे इरादों वाले समझौतों को भी धीरे-धीरे कमजोर कर सकती है.संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 1701 का अनुभव इजरायल की रणनीतिक सोच पर अभी भी हावी है. साल 2006 के लेबनान युद्ध के बाद अपनाए गए इस प्रस्ताव का मकसद 'ब्लू लाइन' और 'लितानी नदी' के बीच एक सुरक्षा बफर बनाना था. इजरायल की सरकारों का तर्क रहा है कि प्रस्ताव की शर्तों के बावजूद हिज्बुल्लाह ने धीरे-धीरे अपनी सैन्य क्षमताएं फिर से हासिल कर लीं.कोई इन आकलन को पूरी तरह माने या न माने,बड़ा सबक यही है कि भरोसेमंद जांच और लागू करने के तरीकों के बिना समझौते अक्सर अपने मकसद को हासिल करने में नाकाम रहते हैं.
यह ऐतिहासिक स्मृति मौजूदा समझौता ज्ञापन पर शक करने की बड़ी वजह बनती है. यह समझौता संघर्ष रोकने की कोशिश तो करता है, लेकिन दक्षिणी लेबनान के भूगोल को बुनियादी तौर पर नहीं बदलता. उत्तरी इजरायल के सामने वाले गांव वहीं हैं, जहां वे हमेशा से थे. सैन्य हिसाब-किताब तय करने वाले भौगोलिक फायदे वैसे ही बने हुए हैं. दशकों से अविश्वास बढ़ाने वाले बुनियादी ढांचे पूरी तरह खत्म नहीं किए गए हैं. यह समझौता ऐसा करने के लिए कोई विस्तृत रोडमैप भी नहीं सुझाता है.

अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते पर इजरायल का नागरिक समाज आशंकाएं जता रहा है.
क्या इजरायल के लोगों का भरोसा जीत पाएगा समझौता
इसका नतीजा एक विरोधाभास है. यह समझौता ज्ञापन क्षेत्रीय तनाव को कम करने और बड़े युद्ध को रोकने में तो सफल हो सकता है. लेकिन यह उन समुदायों को भरोसा दिलाने में नाकाम हो सकता है जो संघर्ष से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. मेटुला, किर्यत श्मोना और कफर गिलाडी के निवासियों के लिए, शांति का मतलब केवल लड़ाई न होना नहीं है. इसका मतलब यह भरोसा है कि जिन हालात ने उन्हें अपने घर छोड़ने करने पर मजबूर किया था, उन्हें बुनियादी तौर पर ठीक कर दिया गया है.
अमेरिका-ईरान के बीच हुआ समझौता एक अहम कूटनीतिक कामयाबी है. इसे मान्यता मिलनी चाहिए. एक और क्षेत्रीय युद्ध को रोकना एक ऐसा लक्ष्य है, जिसे हासिल करने की कोशिश की जानी चाहिए. हालांकि, कूटनीति सुरक्षा व्यवस्था का विकल्प नहीं हो सकती. लंबे समय तक स्थिरता बनाए रखने के लिए केवल तनाव कम करना काफी नहीं है, इसके लिए उन सैन्य, भौगोलिक और रणनीतिक वास्तविकताओं पर ध्यान देना जरूरी है जो इजरायल की उत्तरी सीमा पर असुरक्षा की भावना को बनाए रखती हैं. जब तक दक्षिणी लेबनान के ऊंचे इलाकों वाले गांव सैन्य रणनीतियों का अहम हिस्सा बने रहेंगे, जब तक हिज्बुल्लाह के ऑपरेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर से ठीक से नहीं निपटा जाएगा और जब तक इसे लागू करने के तरीके साफ नहीं होंगे, तब तक इस समझौते से केवल कुछ समय के लिए शांति तो मिल सकती है, लेकिन पक्की सुरक्षा नहीं. इसलिए, नीति-निर्माताओं के सामने चुनौती केवल युद्धविराम बनाए रखने की नहीं है, बल्कि एक ऐसा ढांचा तैयार करने की है जो उन वास्तविकताओं से निपट सके जो पश्चिम एशिया की सबसे अस्थिर सीमाओं में से एक को परिभाषित करती हैं. यह समझौता संघर्ष में कुछ समय के लिए ठहराव लाता है. लेकिन क्या यह असुरक्षा की समस्या का भी समाधान भी करेगा? इस सवाल का जवाब आना अभी बाकी है.
(डिस्क्लेमर: लेखिका मध्य पूर्व एशिया के मामलों की जानकार हैं. उन्होंने इंडिया एंड दी गल्फ: ए सिक्योरिटी प्रस्पेक्टिव शीर्षक से किताब लिखी है. वो ग्रेटर वेस्ट एशिया फोरम, इंडिया की संस्थापक सदस्य हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)