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क्या अमेरिका–ईरान समझौता मीडिल ईस्ट को शांत कर पाएगा, डोनाल्ड ट्रंप की हार हुई या जीत

डॉ. अमर सिंह
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जून 20, 2026 13:07 pm IST
    • Published On जून 20, 2026 13:07 pm IST
    • Last Updated On जून 20, 2026 13:07 pm IST
क्या अमेरिका–ईरान समझौता मीडिल ईस्ट को शांत कर पाएगा, डोनाल्ड ट्रंप की हार हुई या जीत

अमेरिका-ईरान के बीच हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) को क्षेत्रीय तनाव घटाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल माना जा रहा है. हालांकि यह समझौता एक शुरुआत भर है, अंत नहीं. यह युद्ध को फिर शुरू होने से तो रोकता है, लेकिन ईरान की महत्वाकांक्षाओं, इजरायल की कमजोरियों, खाड़ी क्षेत्र की अस्थिरता और मुख्य विवादों को अनसुलझा ही छोड़ देता है. दोनों पक्षों में समझौते पर हस्ताक्षर के तुरंत बाद ही तनाव के संकेत भी दिखाई देने लगे हैं.

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समझौते को अमेरिका की बड़ी रणनीतिक जीत बता रहे है.उनका यह भी कहना है कि अगर ईरान समझौते की शर्तों का पालन नहीं करता तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई से हिचकिचाएगा नहीं. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने समझौते को अगले 50 साल के लिए मध्य पूर्व को मौलिक रूप से बदलने की क्षमता रखने वाला बताया है. वहीं बातचीत में ईरान का प्रतिनिधित्व कर रहे वहां की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबाफ ने समझौते को 'अमेरिकी विफलताओं का दस्तावेज' बताया है. उन्होंने समझौते की अमेरिकी व्याख्या को खारिज कर दिया है. समझौते के कई महत्वपूर्ण मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं, इसलिए इसका मूल्यांकन केवल युद्धविराम के नजरिए से नहीं, बल्कि इसके व्यापक स्त्रातजिक, राजनीतिक और आर्थिक प्रभावों के व्यापक परिप्रेक्ष्य में किया जाना चाहिए.

अमेरिका-ईरान समझौते के प्रमुख बिंदु क्या हैं

अमेरिका और ईरान के बीच हुए इस समझौते के अनुसार दोनों पक्ष सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई रोकने, एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करने और 60 दिन में एक अंतिम समझौते पर बातचीत करने के लिए सहमत हैं. समझौते में होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर खोलने और समुद्री व्यापार की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया गया है. ईरान ने सुरक्षित नौवहन में सहयोग का आश्वासन दिया है, जबकि अमेरिका ईरान पर लगाई गई पाबंदियों में चरणबद्ध ढील देने और जब्त की गई ईरानी परिसंपत्तियों को मुक्त करने की प्रक्रिया शुरू कर सकता है. ईरान ने परमाणु हथियार विकसित न करने के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई है. वह अपने संवर्धित यूरेनियम और निगरानी व्यवस्था पर आगे की वार्ता के लिए सहमति है. समझौते में संयुक्त निगरानी तंत्र की स्थापना, क्षेत्रीय तनाव कम करने और ईरान के आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग का भी उल्लेख है. यदि इन प्रावधानों को सफलतापूर्वक लागू किया जाता है, तो यह समझौता पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है. 

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इस समझौते को लेकर विश्लेषक कई तरह की आशंकाएं जता रहे हैं.
Photo Credit: PTI

इस समझौते से ईरान को क्या मिला 

ईरान इस समझौते का सबसे बड़ा लाभार्थी लग रहा है. अमेरिका और इजरायल द्वारा सैन्य दबाव के बावजूद न तो ईरानी शासन व्यवस्था बदली, न ही उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह खत्म हुआ. होर्मुज जलडमरूमध्य पर उसका नियंत्रण निस्संदेह उसकी सौदेबाजी की ताकत बन गया है. इसके अतिरिक्त, समझौते में प्रतिबंधों में संभावित ढील, जब्तुशुदा संपत्तियों को मुक्त कराना और भविष्य की वार्ताओं में ईरान की केंद्रीय भूमिका से वह युद्ध के बाद अधिक प्रभावशाली होकर उभरा है. अमेरिका और इजरायल युद्ध के प्रारंभ से ही ईरानी शासन को उखाड़ फेंकना और उसके स्थान पर अधिक अनुकूल सरकार स्थापित करना चाहते थे. लेकिन परिणाम इसके बिल्कुल विपरीत निकला. पिछले साल ईरान में इस्लामी शासन के विरुद्ध जो व्यापक जन असंतोष और विरोध-प्रदर्शन हो रहे थे, उससे इस युद्ध ने उबरने का अवसर दे दिया. एक ऐसी सरकार, जो पहले आंतरिक विरोध, विदेशी निवेश की कमी और पाबंदियों के कारण आर्थिक संकट से जूझ रही थी, अब राष्ट्रवाद की लहर पर सवार होकर मजबूत नजर आ रही है. राजनीतिक परिवर्तन या सुधारों की बात फिलहाल पीछे छूट गई है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि युद्ध के बाद भी ईरान वार्ता की मेज पर एक संप्रभु और प्रभावशाली क्षेत्रीय शक्ति के रूप में मौजूद है, न कि एक पराजित राष्ट्र के रूप में. यही कारण है कि अनेक विश्लेषक इस समझौते को ईरान की कूटनीतिक सफलता के रूप में देख रहे हैं.

ईरान से समझौते में अमेरिका को क्या मिला

अमेरिकी नजरिए से यह समझौता किसी स्पष्ट स्त्रातजिक जीत की बजाय एक कठिन समझौते जैसा दिखाई देता है. अमेरिका ने युद्ध की शुरुआत ईरान के परमाणु कार्यक्रम को निर्णायक रूप से रोकने, उसके क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करने और उस पर अधिक दबाव बनाने के उद्देश्य से की थी. लेकिन वह इन उद्देश्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर सका. इसके बावजूद अमेरिका को संघर्ष-विराम स्वीकार करना पड़ा. उसे अपने क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 अरब अमेरिकी डॉलर की योजना और तेल निर्यात पर प्रतिबंधों में छूट पर विचार करना पड़ रहा है. इसके लिए राष्ट्रपति ट्रंप को अपने घर में आलोचनाओं का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि युद्ध से न तो ईरान में सत्ता परिवर्तन हुआ और न ही उसकी क्षमताएं ही पूरी तरह खत्म हुईं. कई विश्लेषकों का मानना है कि इस संघर्ष ने ईरानी नेतृत्व को कमजोर करने के बजाय उसे सशक्त बनाया है, जबकि अमेरिका की वैश्विक विश्वसनीयता, सुरक्षा देने वाला और वर्ल्ड ऑर्डर पर उसके प्रभाव पर सवालिया निशान लगाया है. यदि आगामी वार्ताएं असफल रहती हैं तो ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति पर बहस तेज हो सकती है. 

क्या युद्ध से शांति ला पाएगा इजरायल 

इजरायल इस समझौते को लेकर सबसे अधिक संशयग्रस्त पक्ष के रूप में उभरा है. उसकी प्रमुख मांगें पूरी होती दिखाई नहीं देती हैं. न तो ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह खत्म हुआ है और न ही हिज्बुल्लाह और अन्य ईरान समर्थित संगठनों से उत्पन्न सुरक्षा चुनौतियों का स्थायी समाधान निकल सका है. इसके अतिरिक्त, लेबनान, सीरिया और व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्न अभी भी अनसुलझे हैं. इजरायल वर्तमान में एक स्त्रातजिक दुविधा का सामना कर रहा है.एक ओर वह अमेरिका के साथ मतभेदों का जोखिम उठाकर ईरान और 'ऐक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' के खिलाफ एकतरफा सैन्य कार्रवाई की स्वतंत्रता बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका–ईरान समझौते के माध्यम से क्षेत्रीय तनाव कम करने के प्रयासों को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं कर सकता. इजरायल की 'सुरक्षा के माध्यम से शांति' की नीति अब एक कठिन परीक्षा से गुजर रही है.

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इस समझौते के बाद भी इजरायल ने लेबनान पर हमले बंद नहीं किए हैं. इजरायली हमले के बाद सुरक्षित स्थान की ओर जाता एक लेबनानी परिवार.
Photo Credit: AP

हालांकि इजरायली नेतृत्व ने साफ किया है कि अमेरिका-ईरान के बीच हुए किसी भी समझौते से उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति तय नहीं होगी, बल्कि उसकी सुरक्षा जरूरतें ही उसके निर्णयों का आधार बनी रहेंगी. रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज़ के मुताबिक इजरायली सेना लेबनान, सीरिया और गाजा में स्थापित सुरक्षा क्षेत्रों में जरूरत पड़ने तक अपनी सैन्य उपस्थिति बनाए रखेगी. यह दर्शाता है कि इजरायल अपनी सुरक्षा चिंताओं को अभी खत्म मानने के लिए तैयार नहीं है. इसलिए, कई विश्लेषकों के अनुसार यह समझौता इजरायल को उसके उम्मीद के मुताबिक रणनीतिक उपलब्धियां देने में असफल रहा है.

समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम के लिए क्या है 

ईरान के परमाणु कार्यक्रम का सवाल इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद पहलू है. साल 2018 में अमेरिका के जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) से हटने के बाद ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम का विस्तार किया. मूल समझौते के तहत ईरान को 3.67 फीसदी तक यूरेनियम संवर्धन की अनुमति थी. लेकिन बाद के सालों में उसने संवर्धन स्तर को काफी बढ़ा दिया. अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के मुताबिक 2025 तक ईरान के पास करीब 440 किलोग्राम 60 फीसद संवर्धित यूरेनियम का भंडार था. यह मात्रा नागरिक उपयोग की जरूरतों से कहीं अधिक और हथियार बनाने के काफी करीब है. अमेरिका का दावा है कि इस समझौते से ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोका जा सकेगा, जबकि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को वैध और शांतिपूर्ण अधिकार बताता है. हालांकि, यूरेनियम संवर्धन की सीमा, मौजूदा भंडार का भविष्य, निरीक्षण व्यवस्था और सत्यापन तंत्र जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अभी भी स्थिति साफ नहीं है. IAEA को कई परमाणु स्थलों तक पहुंच पाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि इन जटिल मुद्दों पर विस्तृत सहमति के लिए निर्धारित 60 दिन का समय शायद पर्याप्त न हो. 

क्या होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही आसान हो पाएगी

इस समझौते का एक महत्वपूर्ण पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य नौवहन की बहाली है. यह मार्ग युद्ध से पहले खुला हुआ था. दुनिया का 20 फीसदी तेल का समुद्री परिवहन इसी रास्ते से होता है. ऐसे में इसका रणनीतिक और आर्थिक महत्व बहुत अधिक है. युद्ध के दौरान ईरानी पाबंदियों और अमेरिकी नाकेबंदी ने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार को काफी प्रभावित किया. समझौते के मुताबिक अमेरिका अगले दो महीने में नाकेबंदी खत्म करेगा और अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर होने के 30 दिन के भीतर ईरान के आसपास के इलाकों से अपनी सेना हटाएगा. वहीं ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करेगा. वह जहाजों से कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं वसूलेगा. हालांकि, इस व्यवस्था की स्थिरता को लेकर अभी भी सवाल उठ रहे हैं. होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान के लिए एक महत्वपूर्ण स्त्रातजिक साधन है, जिसके जरिए वह क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है. ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या ईरान वास्तव में जहाजों की आवाजाही की स्वतंत्रता को दीर्घकालिक रूप से सुनिश्चित करेगा. वहीं अमेरिका के लिए भी समझौते के प्रभावी अनुपालन की निगरानी करना और संभावित उल्लंघनों से निपटना आसान नहीं होगा.

ईरान को हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा 

समझौते का एक महत्वपूर्ण प्रावधान ईरान के आर्थिक पुनर्निर्माण और प्रतिबंधों में राहत से जुड़ा है. इसमें अमेरिका और उसके क्षेत्रीय साझेदार 60 दिन में ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर की निवेश और विकास योजना तैयार करेंगे. हालांकि, अमेरिकी प्रशासन ने साफ किया है कि अमेरिका स्वयं इस कोष में प्रत्यक्ष आर्थिक योगदान नहीं देगा. इसके बजाय, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और अन्य क्षेत्रीय साझेदार अमेरिकी स्वीकृति के साथ ईरान में निवेश और विकास परियोजनाओं में भाग ले सकेंगे. ईरान लंबे समय से अपने ऊपर लगी अमेरिकी और पश्चिमी पाबंदियों में ढील और विदेशों में प्रतिबंधित वित्तीय संसाधनों तक पहुंच की मांग करता रहा है. इसे समाप्त करने की समय सीमा अभी तय नहीं हुई है. लेकिन दोनों पक्ष इस विषय पर तत्काल वार्ता के लिए सहमत हैं. प्रतिबंधों और अमेरिकी 'ऑपरेशन इकोनॉमिक फ्यूरी' ने ईरानी अर्थव्यवस्था को गंभीर क्षति पहुंचाई है. इसलिए पाबंदियों से राहत ईरान के लिए समझौते का सबसे बड़ा संभावित लाभ माना जा रहा है, जबकि अमेरिका इसे ईरानी अनुपालन और परमाणु प्रतिबद्धताओं से जोड़कर देख रहा है.

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इस समझौते ने यह बताया है कि शांति लाने का तरीका युद्ध नहीं बल्कि बातचीत है.
Photo Credit: PTI

लेबनान में शांति कब और कैसे आएगी 

इस समझौते ने अमेरिका-ईरान के बीच तनाव तो कम किया है, लेकिन लेबनान और हिज्बुल्लाह का सवाल अभी भी अनसुलझा है. हिज्बुल्लाह इस समझौते में पक्षकार नहीं है, इसलिए उसके सैन्य व्यवहार पर कोई बाध्यकारी नियंत्रण नहीं है. इजरायल ने साफ किया है कि वह अपनी सुरक्षा जरूरतों के अनुसार कार्रवाई जारी रखेगा. उसने कहा है कि वह लेबनान से होने वाले किसी भी हमले का कड़ा जवाब देगा. चूंकि न तो इजरायल और न ही हिज्बुल्लाह इस समझौते के हस्ताक्षरकर्ता हैं, इसलिए लेबनान में स्थायी शांति की कोई गारंटी नहीं है. यही इस समझौते की सबसे बड़ी सीमा और क्षेत्रीय स्थिरता के सामने प्रमुख चुनौती के रूप में उभरता है.

इस समझौते की वास्तविक सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी. परमाणु कार्यक्रम, पाबंदियों में ढील, क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था, लेबनान और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दे अभी भी जटिल और विवादास्पद बने हुए हैं. यह समझौता एक बार फिर यह बताता है कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में केवल सैन्य शक्ति से स्थायी समाधान नहीं हासिल किए जा सकते. इसी वजह से अमेरिका को कूटनीति और बातचीत के लिए आना पड़ा. अगले दो महीने इस समझौते के लिए निर्णायक हो सकते हैं. अगर अमेरिका और ईरान प्रमुख मुद्दों पर आम सहमति बनाने में सफल रहते हैं, तो यह समझौता व्यापक क्षेत्रीय स्थिरता और शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बन सकता है. अगर ऐसा नहीं होता है तो यह समझौता इतिहास में एक अस्थायी विराम के रूप में दर्ज होगा.

(डिस्क्लेमर: लेखक अलीगढ़ के डीएस कॉलेज के रक्षा और स्त्रातजिक अध्ययन विभाग में अस्सिटेंट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है. )

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