डरावने समय का ‘न्यू नॉर्मल’

'न्यू नॉर्मल' को हिंदी में क्या कहेंगे? इस सवाल पर विचार करते हुए मुझे सलमान रुश्दी का मिडनाइट्स चिल्ड्रेन याद आया- वहां एक किरदार कहता है- 'सब ठीकठाक है.' सब ठीकठाक है- यानी कुछ है जो गड़बड़ है. 'ठीक' में शामिल 'ठाक' दरअसल किसी विसंगति, किसी विरूपता की ओर इशारा करने का काम करता है.

डरावने समय का ‘न्यू नॉर्मल’

'न्यू नॉर्मल' को हिंदी में क्या कहेंगे? इस सवाल पर विचार करते हुए मुझे सलमान रुश्दी का मिडनाइट्स चिल्ड्रेन याद आया- वहां एक किरदार कहता है- 'सब ठीकठाक है.' सब ठीकठाक है- यानी कुछ है जो गड़बड़ है. 'ठीक' में शामिल 'ठाक' दरअसल किसी विसंगति, किसी विरूपता की ओर इशारा करने का काम करता है. लेकिन सत्तर के दशक में जब सलमान रुश्दी यह उपन्यास लिख रहे थे, तब जो ठीक-ठाक सी गड़बड़ी थी, अब वह डरावने आयाम ग्रहण कर चुकी है. जिसे सामान्य मानते थे- नॉर्मल- वह अब असामान्य हो चुका है- यानी ऐब्नॉर्मल- और उसे 'न्यू नॉर्मल' बनाने की कोशिश की जा रही है.

इसे कुछ उदाहरणों से समझने की कोशिश करें. महंगाई का विरोध एक सामान्य सी बात है. 1998 में प्याज महंगा हुआ तो दिल्ली की बीजेपी सरकार चुनाव हार गई- और उसके बाद से दिल्ली में उसकी वापसी नहीं हो पाई. 1977 में लोगों के भीतर इंदिरा गांधी की सरकार के विरुद्ध जो गुस्सा था, वह सिर्फ़ आपातकाल का नहीं था, महंगे तेल और राशन का भी था.

मनमोहन सरकार के ख़िलाफ़ अरसे तक विपक्ष की भूमिका भूली रही बीजेपी जब तब महंगाई को मुद्दा बनाती रही और तरह-तरह के तमाशों से बनाती रही. उसकी नेत्रियों ने फलों और सब्ज़ियों की माला पहन कर विरोध प्रदर्शन किया.

लेकिन अब महंगाई का विरोध सामान्य नहीं रहा. अब आपको महंगाई का विरोध करने पर देशविरोधी ठहराया जा सकता है. आपसे कहा जा सकता है कि आप मोदी सरकार के विरुद्ध साज़िश कर रहे हैं, एक मज़बूत देश के रूप में भारत के भविष्य की राह में रोड़ा हैं. जो लोग प्याज के तीस और फूलगोभी के 40 रुपये बिकने पर माला पहन कर निकल रहे थे उनको अब महंगाई की बात करना किसान विरोधी लगता है. उनके भीतर यह नई चेतना जागी है कि अर्थव्यवस्था की मज़बूती के लिए महंगाई सहनी पड़ेगी.

इसी तरह मनमोहन सरकार के समय तेल की बढ़ती क़ीमतें बीजेपी नेताओं को जलाती थीं. वे चुटकुले बनाया करते थे. तब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चा तेल आज के मुक़ाबले कई गुना महंगा था और बीजेपी समर्थक इसे तत्कालीन सरकार की नाकामी मानते थे. तब बीजेपी नेता और उनके समर्थक हिसाब लगाते थे कि भारत में 35 रुपये लीटर पेट्रोल बेचा जा सकता है. अब जब पेट्रोल 100 रुपये लीटर पार हो गया है तब वे नया अर्थशास्त्र पढ़ने लगे हैं. अब उनकी वाट्सऐप यूनिवर्सिटी में उन्हें किसी ने बता दिया है कि यूपीए सरकार क़र्ज़ ले-लेकर सस्ता पेट्रोल दे रही थी और अब मोदी सरकार 100 रुपये से ऊपर पेट्रोल बेच कर वही क़र्ज़ चुका रही है और देश को उसका आत्मसम्मान लौटा रही है. यही नहीं, नया तर्क ये है कि पेट्रोल के दाम अगर 100 रुपये से ऊपर चले गए तो इसमें क्या हर्ज है? लोग इससे महंगी शराब ख़रीदते हैं. क्या पेट्रोल के दाम देश के स्वाभिमान से ज़्यादा अहमियत रखते हैं, क्या देश के विकास के लिए आम लोग इतनी क़ीमत नहीं चुका सकते? 

डॉलर के सामने रुपये की बढ़ती हैसियत का मुद्दा तो सब भूल ही चुके हैं. तब डॉलर के मुक़ाबले रुपया 60 का हुआ था तो ऐसा शोर मचा जैसे भारतीय अर्थव्यवस्था तबाह हो गई हो, अब वह 75 के आसपास है, लेकिन यह अर्थव्यवस्था को मज़बूत कर रही है. सच तो यह है कि भारतीय मुद्रा का जो सबसे भयावह अवमूल्यन हुआ, वह नोटबंदी के समय हुआ जब सरकार ही समझाती रही कि रुपये से ख़रीद-बिक्री न करें, नए ऑनलाइन माध्यम अपनाएं और उसके लिए ‘इंसेंटिव' देती रही.

ऐसा नहीं कि यह न्यू नॉर्मल कोरोना के बाद बना है. यह पिछले सात साल से बनता चला आ रहा है जब एक तबके को यक़ीन हो गया है कि नरेंद्र मोदी हिंदूवादी विकास के एजेंडे पर चलते हुए भारत को इक्कीसवीं सदी की महाशक्ति बना डालेंगे. इस नए भारत का यह 'नया सामान्य' कई और असामान्य उदाहरणों से बनता है. इसी नए भारत में संभव है कि गोरक्षा के नाम पर मॉब लिंचिंग करने वालों को सत्ता पक्ष से जुड़े नेता माला पहनाएं, बलात्कार के आरोपियों के पक्ष में जुलूस निकाले जाएं, सिर्फ पहचान के आधार पर किसी अल्संख्यक की हत्या कर दी जाए और फिर हत्यारे का मुक़दमा लड़ने के लिए दूसरे संगठन चंदा जुटाएं, प्रेम विवाह करने वालों को लव-जेहाद के नाम पर प्रताड़ित किया जाए, लोकतांत्रिक ढंग से आंदोलन करने वाले किसानों को खालिस्तानी से लेकर नक्सलवादी तक कहा जाए, सामाजिक कार्यकर्ताओं, प्राध्यापकों, लेखकों और छात्रों को देशद्रोही और दंगाई घोषित कर जेल में डाला जाए और बीच सड़क पर 'गोली मारो सालों को' जैसा भड़काऊ भाषण देने वालों को सूचना प्रसारण मंत्री बना दिया जाए.

इस नए भारत का ही नया नॉर्मल यह है कि लोग ऑक्सीजन की कमी से सड़क पर तड़प-तड़प कर दम तोड़ते रहें और सरकार संसद में बताए कि उसे ऑक्सीजन की कमी से किसी मौत की ख़बर नहीं है. नया नॉर्मल यह है कि नदियों में लाशें फेंकी जाती रहें, नदी किनारे क़ब्रें उग आएं, नए श्मशान और क़ब्रिस्तान बनाने की ज़रूरत पड़ जाए और प्रधानमंत्री देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री की पीठ थपथपाएं कि उन्होंने कोविड का बहुत अच्छा प्रबंधन किया है.

और इसी नए भारत में यह संभव है कि लगातार यह सारे कृत्य-अपकृत्य करने वाली सरकार को जनता के एक बड़े हिस्से का जोशीला समर्थन मिलता रहे. वह कौन सा रसायन है जिसने यह नया भारत बनाया है? इस नए भारत को नोटबंदी की मुसीबत क्यों नहीं चुभती, इस नए भारत को महंगाई और बेरोज़गारी का सवाल क्यों नहीं सालता, इस नए भारत को सरकारों के झूठ क्यों प्रभावित नहीं करते?

इसलिए कि इसे राष्ट्रवाद और धर्म का वह नशा पिलाया गया है जिसके आगे बाक़ी सारे दुख बेमानी हो जाते हैं. मार्क्स ने जब धर्म को अफ़ीम कहा था तो उसके सामने उसका एक सुनिश्चित अर्थ था. उसने कहा था- ‘धर्म उत्पीड़ित प्राणियों की आह है, एक हृदयहीन दुनिया का हृदय है और आत्महीन स्थिति की आत्मा है. ये जनता का अफ़ीम है.' जाहिर है, उसे एहसास था कि धर्म अफ़ीम की ही तरह 'पेन किलर' का काम करता है. लेकिन भारत में आज धर्म की भूमिका बदल गई है. वह एक ताकतवर और बहुसंख्यक समूह के लिए अपनी आक्रामक पहचान बनाने का ज़रिया भी है. जिस तरह अफ़ीम की भूमिका बदल गई है, उस तरह धर्म की भी बदल गई है. दिलचस्प ये है कि राष्ट्रवाद को भी एक भारतीय मनीषी ने बेहोशी की दवा माना था. गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था कि राष्ट्रवाद इंसान द्वारा बनाया गया सबसे ताक़तवर एनिस्थीसिया है.

भारत की बहुसंख्यक जनता आज इसी अफ़ीम और एनिस्थीसिया की चपेट में लगती है. जैसे यह रुमाल उसे न जाने कितने बरसों से सुंघाया जा रहा था और इसे सूंघ कर वह एक ऐसी नींद में सो गई है कि अब अपनी पीठ पर पड़ रहे प्रहारों का भी उसे अनुभव नहीं हो रहा. यह एक नई जड़ता है जो हमें जांबियों में बदल रही है.

सवाल है, इस नए नॉर्मल से कैसे निबटें? इसका कोई साफ़ जवाब नहीं है. यह फिक्र लगातार जताई जा रही है कि इस देश में फ़ासीवाद आ रहा है. लेकिन सच यह है कि फासीवाद बाद में आएगा, फासीवादी मनोवृत्ति एक बड़े हिंदुस्तान में अभी से घर कर चुकी है. नकली गौरव, अहंकार और खोखली महत्वाकांक्षा का मारा एक ऐसा समाज हम बना रहे हैं जो नाम तो भारत का लेता है, लेकिन बसना अमेरिका में चाहता है, फिक्र तो रुपये की करता है, लेकिन कमाना डॉलर चाहता है और बात तो समाज की करता है, लेकिन अपने निजी हितों से आगे नहीं देख पाता.


प्रियदर्शन NDTV इंडिया में एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं...

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