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This Article is From Dec 07, 2017

ग़ज़ब ढा रहे हैं ओपिनियन पोल के व्यापारी...

सुधीर जैन
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    दिसंबर 07, 2017 13:35 pm IST
    • Published On दिसंबर 07, 2017 13:35 pm IST
    • Last Updated On दिसंबर 07, 2017 13:35 pm IST
गुजरात विधानसभा चुनाव में ओपिनियन पोल के व्यापारियों ने कमाल ही कर दिया. मतदान में दो ही दिन बचे हैं, और तरह-तरह के चुनाव सर्वेक्षणों के ज़रिये धड़ल्ले से चुनाव प्रचार चल रहा है. इन सर्वेक्षणों की उपयोगिता और नैतिकता को लेकर खुलकर कोई नहीं बोल पाता. मीडिया में ही ये बातें हो सकती हैं, लेकिन ग़ज़ब यह है कि मीडिया में ही चौतरफा इन सर्वेक्षणों के ज़रिये प्रचार की होड़ मची है. इस बार होड़ इतनी जबर्दस्त है कि कोई यह देखने को भी तैयार नहीं कि अलग-अलग एजेंसियों के आकलन में ज़मीन-आसमान का अंतर है. कोई बता रहा है कि गुजरात में कांटे की टक्कर है. यानी कोई भी हार या जीत सकता है, और कोई बता रहा है कि फलां पार्टी तीन चौथाई से ज़्यादा सीटें जीत रही है. सो, अलग-अलग सर्वेक्षणों में आधे-दोगुने तक का फर्क है. विज्ञान के नाम से होने वाले इस अनुमान में इतने हैरतअंगेज़ फर्क पर क्या सोच-विचार नहीं होना चाहिए...?

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क्या यह विज्ञान का मखौल नहीं : आरोप से बचने के लिए हर झूठ को विज्ञान का लबादा ओढ़ना पड़ता है. चुनावी सर्वेक्षणों को भी शोधकार्य, यानी विज्ञान बताया जाता है. चुनावी आंकड़ों के इस सांख्यिकीय विश्लेषण को सैफोलॉजी कहते हैं, और यह काम करने वाले खुद को विज्ञानी कहते हैं. वे खुद को सांख्यिकी और राजनीति विज्ञान का विशेषज्ञ कहलाना चाहते हैं. उनकी मुद्रा किसी भौतिक विज्ञानी या रसायनशास्त्री से कम नहीं होती. लेकिन दिक्कत यह है कि उनके आकलन विज्ञान के आकलन की तरह शुद्ध नहीं होते. उनके तराजू पता नहीं कैसे हैं कि एक दुकान से चुनावी माहौल तुलवाओ तो एक किलो वज़न आता है और दूसरी दुकान पर वह डेढ़ किलो निकलता है. विज्ञान में तो ऐसा नहीं होता. सांख्यिकी भी अपने अनुमान के गलत होने की जो सीमा बताती है, वह तीन चार फीसदी से ज़्यादा नहीं होती.

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सैफोलॉजी की पैदाइश से ही अविश्वसनीयता : चुनावी नतीजों के बाद उनका विश्लेषण फिर भी एक वैज्ञानिक काम हो सकता है. जब सैफोलॉजी को जन्म दिया गया था, तब मुख्य रूप से चुनावी नतीजों का ही विश्लेषण हुआ करता था. राजनीतिक दलों को आगे की रणनीति बनाने में ऐसे विश्लेषण काम आते थे. लेकिन 1824 में पहली बार इस्तेमाल हुए ओपिनियन पोल के 112 साल बाद, यानी 1936 में बाकायदा सैफोलॉजी शुरू हो गई. सन 1824 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के लिए पहली बार चुनावी सर्वेक्षण हुआ था और गलत साबित हुआ था, लेकिन तब से आज तक के इन दो सौ सालों में ये चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विरोध में हवा बनाने में बहुत कारगर साबित होते आए हैं, इसीलिए पूरी दुनिया में सैफोलॉजी का इस समय इतना चरचराटा है कि सिर्फ भारत में ही दसियों कंपनियां और एजेंसियां हैं, जो चुनावी सर्वेक्षणों के पूर्णकालिक व्यापार में हैं. लगभग सभी एजेंसियों को खुद को विशेषज्ञ सेवाप्रदाता मानने में गुरेज़ नहीं है, और वे किसी न किसी मीडिया प्रतिष्ठान के लिए ठेके पर काम करती दिखाई देती हैं. वैसे हो यह भी सकता है कि इन एजेंसियों के लिए मीडिया प्रतिष्ठान ठेके पर काम करने लगे हों. या ये दोनों ही किसी और के लिए.

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खासा खर्चीला काम है : यह ढका--छिपा नहीं है कि मतदाताओं के मूड को भांपने के नाम से जो सर्वेक्षण प्रचारित होते हैं, उनकी विश्वसनीयता दिखाने के लिए यह बताना ज़रूरी होता है कि कितने मतदाताओं का मूड भांपा गया. हमारा देश ज़रा ज़्यादा ही बड़ा है, सो, लोकसभा चुनाव में 85 करोड़ और अपने देश के एक मझोले प्रदेश में चार-छह करोड़ मतदाता होते हैं. वैज्ञानिक शोधपद्धति के हिसाब से विविधताओं वाले देश में सर्वेक्षण के लिए एक लाख और मझोले प्रदेश में 25,000 मतदाताओं का इंटरव्यू तो चाहिए ही चाहिए. ये इंटरव्यू भी ऐसा-वैसा नहीं, बल्कि भरी-पूरी विशेषज्ञता वाला होता है. विदेशों में तो इन साक्षात्कारकर्ताओं की बाकायदा एक अकादमिक योग्यता तय है. उनके पास वैज्ञानिक शोधकार्य का अनुभव भी होना चाहिए. उन्हें सामाजिक शोधपद्धति का ज्ञान होना चाहिए, वगैरह-वगैरह. खैर, अपने यहां हो सकता है कि ये सर्वेक्षण कंपनियां हफ्ते-दो-हफ्ते की ट्रेनिंग देकर अप्रशिक्षित लोगों का कौशल विकास कर लेती हों. फिर भी कुल मिलाकर यह काम पड़ता बहुत खर्चीला है. इस बारे में ज़्यादा जानकारी सुलभ नहीं है कि सर्वेक्षणों के लिए यह भारी-भरकम खर्चा उठाता कौन है...?

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ऐसे सर्वेक्षणों की उपयोगिता का सवाल : जिस तरह दुनिया की कोई चीज़ फिज़ूल नहीं होती, उसी तरह मानकर चलना चाहिए कि ये सर्वेक्षण भी काम के ही होंगे. वरना बार-बार झूठ साबित होने के बाद भी आज तक इतने काम के क्यों बने रहते...? थोड़ी देर के लिए अगर नैतिकता-अनैतिकता को भुला दें, तो इसमें कोई शक है ही नहीं कि चुनावी काम में किसी की हवा बनाने या बिगाड़ने में ये चुनावी सर्वेक्षण बड़े कारगर होने लगे हैं. वैसे इस बारे में NDTV के इसी स्तंभ में पिछले दो साल में अलग-अलग चुनावी मौकों पर दो विशेषज्ञ आलेख लिखे जा चुके हैं. एक उस समय लिखा गया था, जब बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान ओपिनियन पोल के ज़रिये हवा पैदा करने की कोशिश हो रही थी. उस आलेख में ओपिनियन पोलों पर ओपिनियन दी गई थी. दूसरा आलेख तब लिखा गया था, जब इसी साल उत्तर प्रदेश में चुनाव से 10 महीने पहले ही ओपनियन पोल के नगाड़े बजने शुरू हो गए थे. यानी चुनाव के 10 महीने पहले जब मतदाता का मूड बनता ही नहीं, उस समय मूड भांपना शुरू हो गया था. इन दोनों आलेखों के अलावा भी लेखक ने एक अन्य आलेख में ओपिनियन पोल को लेकर अपने विचार व्यक्त किए थे.

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मूड भांपना या मूड बदलना : मतदाता का मूड भांपा क्यों जाता है, और इससे किसे फायदा होता है - मतदाता को या राजनीतिक दलों को... इन सवालों पर अभी खुलकर सोच-विचार शुरू नहीं हुए हैं. ऐसे सवालों पर जब भी विचार शुरू होंगे, यह ज़रूर देखा जाएगा कि कहीं वोटर का मूड भांपने की बजाय उसका मूड बदलने का मकसद तो नहीं होता...? और यह भी कि मतदाताओं का मूड बदला किस प्रक्रिया से जाता है...? यह सवाल भी कि इस प्रक्रिया में अपने फायदे के चुनावी मुद्दे कितनी आसानी से मतदाताओं के दिमाग में डाले जाते हैं...?

सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

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