राष्ट्र और राष्ट्रवाद का मसला आते ही टीवी की बहसों में जान आ जाती है. एंकरों की भाषा जनरलों से भी ज़्यादा आक्रामक हो जाती है. ऑफिस में बॉस और सड़क पर ट्रैफिक से जूझते हुए घर पहुंचने के बाद आपको भी टीवी पर कुछ तो गरमा-गरम चाहिए. कुछ चाहिए की ये तलब शिक्षा या चिकित्सा जैसे विषयों की चर्चा से कहां पूरी होती है. एक सिर एक बदले पचास सिर का नारा सुनते ही आपमें जान आ जाती होगी. पत्रकारों में भी भय समा गया है, उनसे कोई पूछ नहीं रहा है, फिर भी ट्वीट कर अपने राष्ट्रवाद का प्रदर्शन करने लगते हैं जबकि उन्हीं चैनलों पर दिन भर कुछ ऐसे कार्यक्रम चलते रहते हैं जिनका संबंध राष्ट्र निर्माण से कितना होता है, आप बेहतर जानते होंगे. पत्रकारिता से निराश होते दर्शकों के बीच सेना, सीमा और पाकिस्तान एक अच्छा मौका देता है, अपनी साख का लाइसेंस नया करने का. इसलिए हम एंकर ज़ोर-ज़ोर से राष्ट्र के प्रहरी बन जाते हैं.
टीवी चैनलों की भाषा में बात की जगह बारूद की मांग है, 'एक सिर के बदले पचास सिर' का एलान है, 'कब तक सहेगा हिन्दुस्तान' जैसे जुमले देखकर संपादक की शर्मिंदगी समझ आती है, वो भूल गया है कि सर्जिकल स्ट्राइक के वक्त उसे कितना गर्व हुआ था. हम पत्रकारों को सही में किसी दवा की ज़रूरत है, शायद बाबा रामदेव के अत्याधुनिक लैब में इसकी कोई दवा हो. आज भारत के मिलिट्री ऑपरेशन के महानिदेशक ने पाकिस्तान के मिलिट्री महानिदेशक से हॉटलाइन पर बात की. इस बातचीत के बाद जो प्रेस रिलीज दी गई है उसकी भाषा में टीवी चैनलों की बारूदी भाषा की तरह नहीं है. प्रेस रिलीज में कहा गया है कि भारत की सेना के डीजीएमओ ने कृष्णा घाटी सेक्टर में 1 मई को हुई घटना पर गंभीर चिंता ज़ाहिर की है. इसी जगह पर नियंत्रण रेखा के भारतीय हिस्से में पाकिस्तान की टुकड़ी ने घुसकर भारतीय गश्ती दल पर हमला किया और दो जवानों के शवों को क्षत-विक्षत कर दिया. पाकिस्तान की सेना ने पीछे से पूरा सपोर्ट दिया. भारतीय सेना के डीजीएमओ ने नियंत्रण रेखा के करीब पाकिस्तान की बैट ट्रैनिंग शिविरों की मौजूदगी पर भी चिंता जताई है. डीजीएमओ ने यह भी जता दिया कि ऐसी अमानवीय कार्रवाई किसी भी शालीनता के पार है और यह कड़ी निंदा और माकूल जवाब के लायक है.
जिन्हें इस मसले से निपटना है, उनकी भाषा में गंभीर चिंता और चिंता है. जिन्हें इस मसले से नहीं निपटना है उन एंकरों और चैनलों की भाषा देखिये. क्या आपको अपनी सरकार में वाकई भरोसा नहीं है कि वो कुछ नहीं करेगी. क्या सरकारों को अब टीवी चैनलों के बनाए बदहवास जनमत के अनुसार चलना होगा. पाकिस्तान ने जो किया है, उसका न तो बचाव किया जा सकता है और न ही चुप रहा जा सकता है. भारत-पाकिस्तान संबंधों में ऐसा पड़ाव हर महीने दो महीने बाद आ जाता है, जहां पहुंच कर कई बार समझ नहीं आता कि अब क्या किया जाए. यही वजह है कि हम एंकर बड़बड़ाने लगते हैं. टीवी तोप बन जाता है. हमारी राजनीति भी टीवी की ज़ुबान में बात करने लगती है. टीवी आपके नेताओं को ही नहीं लड़वा रहा है, आपको भी वैसा ही बना रहा है.
एंकर नेताओं को लड़ा भी रहे हैं और बोल भी रहे हैं जब तक शहीदों की चिता जल रही है तब तक राजनीति नहीं होनी चाहिए. आप उस एंकर की भाषा में इस राजनीति की मासूमियत तो देखिये. यूपीए बनाम एनडीए के समय में आतंकवादी हमलों और जवाबी कार्रवाई के आंकड़े उभर आए हैं. दोनों सरकारों में तुलना होने लगी है कि कौन बेहतर था. 2011 से 13 के बीच यूपीए के समय 270 बार सीज़फायर का उल्लंघन हुआ था. 2014-16 के बीच एनडीए के समय 349 बार सीज़फायर का उल्लंघन हुआ है. 2011-13 के बीच यूपीए के समय सीज़फ़ायर के उल्लंघन में 17 जवान शहीद हुए. 2014-16 के बीच एनडीए के समय 27 सुरक्षा बल शहीद हुए.
इस तरह आतंकवादी हमले में 2011 से 13 के बीच 108 सैनिक शहीद हुए जबकि एनडीए के समय यानी 2014-16 के बीच 180 सुरक्षा बल शहीद हुए हैं. ये आंकड़े साउथ एशिया टेररिज़्म पोर्टल से लिये गए हैं. हाल ही में कुपवाड़ा में एक सैन्य शिविर पर आतंकी हमला हुआ. कैप्टन आयुष यादव और दो जवान शहीद हो गए. आतंकवादियों ने बैंक की कैश वैन पर हमला कर 50 लाख रुपये लूट लिये और जम्मू कश्मीर पुलिस के पांच जवानों को मार दिया. तब इस तरह का उबाल क्यों नहीं आया. जम्मू-कश्मीर के हालात ये हैं कि अनंतनाग लोकसभा क्षेत्र में उपचुनाव के लिए चुनाव आयोग को 70,000 सुरक्षा बल की मांग करनी पड़ती है. कुछ दिन पहले श्रीनगर लोकसभा क्षेत्र में उपचुनाव हुआ था उसमें करीब 90,000 वोट ही पड़े थे. अनंतनाग लोकसभा उपचुनाव रद्द कर दिया गया है.
मंगलवार को दिल्ली में जम्मू कश्मीर के गवर्नर एन एन वोहरा ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह के साथ मुलाकात की. गवर्नर वोहरा ने गृह मंत्री को आश्वासन दिया कि हालात पर जल्द ही काबू पा लिया जाएगा. क़रीब 10 दिन पहले घाटी के हालात पर जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से मुलाक़ात की थी. महबूबा ने भी हालात जल्दी सुधरने की बात की. सोमवार को भी गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने एक उच्चस्तरीय बैठक की थी, जिसमें NSA अजीत डोभाल के अलावा IB चीफ़, CRPF के डीजी और गृह सचिव शामिल हुए थे.
पाकिस्तान क्या भारत को उकसा रहा है. हाल ही में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष बाजवा ने सीमा का दौरा किया और कहा कि जम्मू कश्मीर में चल रही गतिविधियों को पाकिस्तान राजनीतिक समर्थन देगा. क्या नवाज़ शरीफ़ की सत्ता पर पकड़ कमज़ोर पड़ती जा रही है, तुर्की के राष्ट्रपति भारत दौरे पर जिस वक्त प्रधानमंत्री से मिल रहे थे, उसी वक्त सिर काटने की ये खबर आई थी. मुझे पता है कि अभी बम बारूद और बदला जैसे जुमलों के अलावा किसी और लहज़े में सुनने का लोगों का मूड नहीं है फिर भी हम अजय शुक्ला और सुशांत सरीन के साथ समझने का प्रयास करेंगे कि उनके जायज़ गुस्से के अलावा सरकार को क्या करना चाहिए था जो नहीं कर रही है. अगर सरकार को हमला करना ही है तो उसे टीवी के एंकरों को विश्वास में लेकर फैसला कर लेना चाहिए, बातचीत की बात करने वालों के बहाना नहीं बनाना चाहिए. वैसे भी बहुमत में वो नहीं हैं जो बातचीत की बात करते हैं, उनकी संख्या इतनी है कि वे पार्षद का चुनाव भी नहीं जीत सकते. कई एंकरों को सुना, वो सरकार को नहीं घेर सकते तो बातचीत की बात करने वालों को घेरने लगे हैं.
OPINION
This Article is From May 02, 2017
प्राइम टाइम इंट्रो : जवानों की शहादत पर बदली भाषा- क्या सरकार को दबाव में आना चाहिए?
पत्रकारिता से निराश होते दर्शकों के बीच सेना, सीमा और पाकिस्तान एक अच्छा मौका देता है, अपनी साख का लाइसेंस नया करने का. इसलिए हम एंकर ज़ोर-ज़ोर से राष्ट्र के प्रहरी बन जाते हैं.
- मई 03, 2017 00:06 am IST
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