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अनुच्छेद 370 हटने से कितना बदला जम्मू-कश्मीर, क्या है आतंकवाद और पर्यटन का हाल

डॉ. अमर सिंह
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अगस्त 06, 2026 12:36 pm IST
    • Published On अगस्त 06, 2026 12:36 pm IST
    • Last Updated On अगस्त 06, 2026 12:36 pm IST
अनुच्छेद 370 हटने से कितना बदला जम्मू-कश्मीर, क्या है आतंकवाद और पर्यटन का हाल

पांच अगस्त 2019 भारतीय लोकतंत्र, राष्ट्रीय सुरक्षा और संघीय राजनीति के इतिहास में एक ऐतिहासिक घटना के रूप में दर्ज है. इसी दिन भारत सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को निष्प्रभावी करते हुए अनुच्छेद 35A को खत्म किया था. इसके साथ ही जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के जरिए राज्य का पुनर्गठन कर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया गया था. केंद्र सरकार ने इस फैसले को राष्ट्रीय एकीकरण, सुशासन, समान नागरिक अधिकारों के विस्तार, आतंकवाद पर प्रभावी नियंत्रण और आर्थिक विकास की दिशा में एक निर्णायक कदम बताया था. वहीं कई राजनीतिक दलों और आलोचकों ने इसे संघीय ढांचे, लोकतांत्रिक प्रक्रिया और जम्मू-कश्मीर की विशिष्ट संवैधानिक पहचान के संदर्भ में सवाल उठाए थे.

अनुच्छेद 370 को भारतीय संविधान के भाग XXI में 'अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधान' के तहत शामिल किया गया था. 11 दिसंबर 2023 को 'भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के संबंध में' मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों वाले संविधान पीठ ने फैसला सुनाया कि अनुच्छेद 370 एक अस्थायी एवं संक्रमणकालीन व्यवस्था थी, इसका उद्देश्य जम्मू-कश्मीर के भारत के साथ संवैधानिक एकीकरण को सुगम बनाना था. अदालत ने पांच अगस्त 2019 के संवैधानिक परिवर्तनों की वैधता को भी बरकरार रखा था.

ऐसे में आज सात साल बाद, यह प्रश्न पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि अनुच्छेद 370 हटाने से वास्तव में जम्मू-कश्मीर में क्या परिवर्तन आया? 

पहले और अब: बदलती सुरक्षा स्थिति

जम्मू-कश्मीर बीते तीन दशकों से सीमा पार आतंकवाद, अलगाववाद, पत्थरबाजी, बंद, हड़तालों और हिंसक विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र रहा है. पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों की गतिविधियों, नियंत्रण रेखा (LoC) के पार से घुसपैठ, स्थानीय युवाओं की आतंकी संगठनों में भर्ती और सुरक्षा बलों पर लगातार हमलों ने क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति को लंबे समय तक प्रभावित किया. यदि 2016 से 2026 के बीच के आंकड़ों का अध्ययन किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की प्रकृति और तीव्रता दोनों में परिवर्तन आया है. साल 2016 में हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी के मुठभेड़ में मारे जाने के बाद घाटी में व्यापक अशांति फैल गई. उस साल 112 आतंकवादी घटनाएं दर्ज हुईं और 267 लोगों की मौत हुई. मरने वालों में 14 नागरिक, सुरक्षा बलों के 88 जवान और 165 आतंकवादी शामिल थे.

इसके अगले दो सालों में स्थिति और भी गंभीर हो गई. वर्ष 2018 में आतंकवादी घटनाओं की संख्या बढ़कर लगभग 206 तक पहुंच गई. इसे इस दशक का सबसे गंभीर दौर माना जाता है. पांच अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 हटाने के बाद सुरक्षा रणनीति में व्यापक परिवर्तन किया गया. अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती, सीमा पर निगरानी बढ़ाना, आतंकवादी नेटवर्क की वित्तीय आपूर्ति रोकना और खुफिया तंत्र को सुदृढ़ करना इस नीति के प्रमुख आधार बने. परिणामस्वरूप 2023 से 2026 के बीच स्थिति में काफी सुधार देखने को मिला. आतंकवादी घटनाओं की संख्या भी घटकर 2024 में 72, 2025  में 35 और  2026 में 9 (जुलाई तक)  सीमित रह गई.

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ये आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि आतंकवाद की तीव्रता में उल्लेखनीय कमी आई है, लेकिन यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि आतंकवाद पूरी तरह खत्म हो गया है. अब घटनाएं 'बड़े पैमाने के आतंकवाद' से 'कम तीव्रता परंतु उच्च प्रभाव वाले आतंकवाद' की ओर बढ़ गई हैं.

खत्म होती अलगाववाद की राजनीति

इसके साथ ही साथ अलगाववादी राजनीति का प्रभाव पहले की तुलना में काफी कमजोर हुआ है. पहले जो व्यापक हड़तालें, बंद, पत्थरबाजी और सड़क पर होने वाली हिंसा घाटी के सामान्य जन-जीवन को बार-बार प्रभावित करती थीं, उनमें उल्लेखनीय कमी आई है. कभी अलगाववादी आंदोलन का प्रमुख राजनीतिक मंच मानी जाने वाली हुर्रियत कॉन्फ्रेंस अब लगभग निष्क्रिय हो चुकी है. उसकी राजनीतिक सक्रियता सीमित हो गई है. इससे यह संकेत मिलता है कि घाटी में अलगाववादी विमर्श का प्रभाव पहले की अपेक्षा काफी कम हुआ है. मुख्यधारा के जिन राजनीतिक दलों ने 2019 में अनुच्छेद 370 के निरसन के बाद गंभीर संवैधानिक और राजनीतिक संकट की आशंका जताई थी, वे भी अब लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं. 

विकास के बड़े काम और चुनौतियां

अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में विकास और आर्थिक गतिविधियों को गति देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने आधारभूत संरचना, पर्यटन, उद्योग, डिजिटल कनेक्टिविटी और निवेश पर विशेष ध्यान दिया. मार्च 2025 में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में जम्मू-कश्मीर के प्रथम आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया था. इसके मुताबिक 2024–25 में वास्तविक जीएसडीपी वृद्धि दर 7.06 फीसद और नाममात्र (Nominal) जीएसडीपी वृद्धि 11.19 फीसद रहने का अनुमान है. प्रदेश की अर्थव्यवस्था का आकार करीब 2.65 लाख करोड़ रुपये आंका गया है. वहीं उधमपुर–श्रीनगर–बारामूला रेल लिंक, चिनाब नदी पर दुनिया के सबसे ऊंचे रेलवे आर्च ब्रिज, नई सुरंगों, राष्ट्रीय राजमार्गों और डिजिटल कनेक्टिविटी ने जम्मू-कश्मीर की संपर्क व्यवस्था को मजबूत किया है. इनसे क्षेत्रीय संपर्क, पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिली है.

जम्मू कश्मीर के नेता पिछले काफी समय से मांग कर रहे हैं कि राज्य का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल किया जाए.

Photo Credit: PTI

जम्मू कश्मीर के आर्थिक संकेत सकारात्मक तो हैं, लेकिन फिर भी घोषित निवेश का बड़ा हिस्सा अभी तक पूर्ण रूप से धरातल पर नहीं उतर सका है तथा औद्योगिक विकास और स्थायी रोजगार सृजन के अपेक्षित परिणाम सीमित रहे हैं. जम्मू-कश्मीर में युवाओं में बेरोजगारी की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक रही है. यह आर्थिक चुनौती के साथ-साथ सामाजिक और राजनीतिक असंतोष का कारण भी बन सकती है. इसलिए भविष्य की एक सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय युवाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण रोजगार के अवसर सृजित करना, निजी निवेश को आकर्षित करना और आर्थिक विकास को अधिक समावेशी, टिकाऊ और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना होगा.

जम्मू-कश्मीर आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार 2024 में करीब 2.36 करोड़ (23.6 मिलियन) पर्यटक जम्मू-कश्मीर पहुंचे, जिनमें लगभग 65,452 विदेशी पर्यटक शामिल थे. यह अब तक का सर्वाधिक पर्यटन आगमन माना जाता है. पर्यटन से होटल उद्योग, परिवहन, हस्तशिल्प, स्थानीय व्यापार और स्वरोजगार को महत्वपूर्ण लाभ मिला है. गुलमर्ग में शीतकालीन खेलों, पहलगाम और सोनमर्ग में आतिथ्य क्षेत्र में निवेश ने भी स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई गति प्रदान की. हालांकि अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद पर्यटन उद्योग को अस्थायी झटका लगा और बड़ी संख्या में बुकिंग रद्द हुईं, पर अब स्थिति सामान्य हो रही है. यह स्पष्ट है कि पर्यटन की दीर्घकालिक स्थिरता अब भी सुरक्षा वातावरण पर निर्भर करती है.

लोगों की लोकतांत्रिक आकांक्षाएं

अनुच्छेद 370 के निरसन के बाद जम्मू-कश्मीर के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले हैं. जहां पहले सार्वजनिक विमर्श का केंद्र अलगाववाद, हिंसा और सुरक्षा संबंधी मुद्दे हुआ करते थे, वहीं आज बड़ी संख्या में युवाओं की प्राथमिकताएं रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पर्यटन, व्यापार, उद्यमिता (स्टार्ट-अप), डिजिटल अर्थव्यवस्था और बेहतर जीवन स्तर की ओर स्थानांतरित हुई हैं. राजनीतिक स्तर पर 2024 के जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में करीब 58.5 फीसद मतदान हुआ. यह पिछले कई दशकों की तुलना में उल्लेखनीय जनभागीदारी का संकेत है. लेकिन इस मतदान को अनुच्छेद 370 के पक्ष या विपक्ष में 'जनमत-संग्रह' के रूप में बताना सही नहीं होगा. इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पुनर्बहाली, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के पुनर्सक्रिय होने और मतदाताओं के लोकतांत्रिक संस्थाओं में बढ़ते विश्वास के रूप में देखना अधिक संतुलित दृष्टिकोण होगा.

आज जम्मू-कश्मीर की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक अपेक्षा पूर्ण राज्य के दर्जे की बहाली है. साल 2024 में विधानसभा चुनाव के बाद निर्वाचित सरकार का गठन अवश्य हुआ है, किंतु केंद्र शासित प्रदेश व्यवस्था के अंतर्गत अनेक प्रमुख प्रशासनिक और विधायी शक्तियां उपराज्यपाल और केंद्र सरकार के पास निहित हैं. इससे मुख्यमंत्री और मंत्रि परिषद की निर्णय-निर्माण क्षमता और जनता के प्रति उनकी लोकतांत्रिक जवाबदेही सीमित हो जाती है. परिणामस्वरूप, निर्वाचित सरकार स्थानीय आकांक्षाओं के अनुरूप स्वतंत्र और प्रभावी शासन प्रदान करने में पूर्णतः सक्षम नहीं हो पाती है. इससे राज्य के दर्जे की बहाली की मांग और अधिक प्रासंगिक हो जाती है. लोकतंत्र का वास्तविक उद्देश्य केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि निर्वाचित प्रतिनिधियों को प्रभावी शासन करने का अधिकार देना भी है. इसलिए राज्य का दर्जा बहाल करना लोकतांत्रिक जवाबदेही को सुदृढ़ करने की दिशा में बड़ा कदम होगा.

जम्मू कश्मीर की बड़ी चुनौतियां क्या हैं

अनुच्छेद 370 के निरसन के सात साल के अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा परिदृश्य में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है. बड़े पैमाने पर पत्थरबाजी और बंद की घटनाओं में भारी कमी आई है, अलगाववादी नेटवर्क कमजोर हुए हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पुनः सक्रिय हुई है. आधारभूत संरचना, संपर्क, पर्यटन, डिजिटल कनेक्टिविटी और सार्वजनिक निवेश के क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज की गई है. इसके बावजूद, इन उपलब्धियों को स्थायी शांति और राजनीतिक स्थिरता का अंतिम संकेतक नहीं माना जा सकता.आगे की नीति का केंद्र केवल सुरक्षा प्रबंधन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक सशक्तीकरण, आर्थिक विकास और सामाजिक विश्वास-निर्माण होना चाहिए. पूर्ण राज्य के दर्जे की बहाली, युवाओं के लिए रोजगार और कौशल विकास, निजी निवेश को प्रोत्साहन और कश्मीरी पंडितों की सम्मानजनक और सुरक्षित पुनर्वापसी जैसे कदम दीर्घकालिक स्थिरता के लिए आवश्यक हैं. सीमा पार आतंकवाद और हाइब्रिड युद्ध जैसी उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए सुरक्षा तंत्र को निरंतर सुदृढ़ करना भी समान रूप से महत्वपूर्ण रहेगा.

(डिस्क्लेमर: लेखक अलीगढ़ के डीएस कॉलेज के रक्षा और स्त्रातजिक अध्ययन विभाग में अस्सिटेंट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है. )

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