भारत की सीरियसता को गंभीर खतरा, कामरा-फारूकी के शो बंद किए गए

भारत एक सीरीयस प्रधान देश है. हम भारतीयों की सीरीयसता की ख़ास बात यह है कि हम हर बात को गंभीरता से लेते हैं. हंसने से पहले और हंसने के बाद सीरीयस होना, हमारी सीरीयसता का अभिन्न अंग है. हंसना दो सीरीयसताओं के बीच एक छोटा सा ब्रेक है.

भारत एक सीरीयस प्रधान देश है. हम भारतीयों की सीरीयसता की ख़ास बात यह है कि हम हर बात को गंभीरता से लेते हैं. हंसने से पहले और हंसने के बाद सीरीयस होना, हमारी सीरीयसता का अभिन्न अंग है. हंसना दो सीरीयसताओं के बीच एक छोटा सा ब्रेक है. जब सारी बीमारी गोबर से ही दूर हो रही है तो फिर कॉमेडी की ज़रूरत नहीं है. सॉरी, अस्पताल की कोई ज़रूरत नहीं है. गोबर के रहते अस्पतालों के शिलान्यास हो रहे हैं और कॉमेडी शो कैंसिल हो रहे हैं. ये है हमारी सीरीयसता का लेवल. आप किसी भी शादी में चले जाइये. ज़्यादातर लोग सीरीयस मिलेंगे, जिन्हें नहीं मिला है वो भी सीरीयस होंगे और जिन्हें मिला है वो तो होते ही हैं. आप जानते हैं कि क्या मिला है और क्या नहीं मिला है. डांस फ्लोर पर जाने की दिली इच्छा सबकी होती है लेकिन डांस नहीं आने के कारण सब सीरीयस रहते हैं. ताकि स्पष्ट संकेत चला जाए कि लड़के के पिताजी सीरीयस हैं. वे डांस करना ठीक नहीं समझते. करोलबाग से खरीदी गई सौ रंगों की शेरवानी पहनकर नए फैशन को गले लगा रहे हैं मगर डांस फ्लोर पर नाच रही समधन को देख नए फैशन का ताना मार रहे हैं. इतनी सीरीयसताओं के बीच किसी को हंसाने की ज़रूरत नहीं है.

बेंगलुरू में आख़िर वो कौन लोग थे जो टिकट कटा कर मुनव्वर फारुक़ी और कुणाल कामरा के शो देखना चाहते थे? क्या उन्हें अपनी हालत पर ख़ुद से हंसी नहीं आती जो मुंबई से कॉमेडियन बुलाकर हंसना चाहते हैं? यह वक्त हंसने का नहीं है. बेरोज़गारी और महंगाई से त्रस्त इस देश में हंसना और हंसाना अय्याशी है. सभ्य लोग नहीं समझेंगे तो इसका मतलब नहीं कि गुंडे समझाने का काम छोड़ देंगे. कॉमेडी करने वालों का जीवन अच्छा ख़ासा सीरीयस हो गया है. उन पर मुकदमे हो रहे हैं. उनके शो कैंसिल हो रहे हैं. गुंडे पीछे पड़े हैं वो अलग से. वे अपनी जान बचाने के लिए वकीलों के पीछे पड़े हैं, वो अलग से. यह सब तो तब हो रहा है जब भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. अगर नहीं सोचने के मूड में हैं तो कोई बात नहीं, जब मूड में होंगे तभी सोचिए कि अगर भारत दुनिया का सबसे छोटा लोकतंत्र होता तब क्या होता. तब कोई बेंगलुरु नहीं होता, कोई मुंबई नहीं होती. केवल एक ऑडिटोरियम होता जिसमें कॉमेडी कैंसल कराने वाले मंच से हंसा रहे होते और कॉमेडी कलाकार सामने बैठकर रो रहा होता. अपने वीर दास समझदार निकले. बल्कि वीर से पहले वे छह लाख भी समझदार निकले जो इस बड़े लोकतंत्र को छोटा समझ गए, और दूसरे देश की नागरिकता ले ली.

मेरा मकसद भारत में गंभीरता की नई सहेली सीरीयसता की प्रासंगिकता को स्थापित करना है. हम सब भारतीय हैं लेकिन सीरीयस हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने भी कई मौकों पर अपने भाषणों में गंभीरता पर ज़ोर दिया है. उन्हें चिन्ता है कि नई पीढ़ी गंभीर ज्ञान से दूर न हो जाए, उन्हें चिन्ता है कि जिन्होंने कबीरदास को गंभीरता से नहीं पढ़ा वे समाज में कलह का माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इन दोनों के बीच एयर इंडिया को बेच देने की गंभीरता की आवाज़ भी आपको सुनाई देगी.

कुछ राजनीतिक दल, जिन्होंने संत कबीरदास जी को गंभीरता से नहीं पढ़ा वो समाज में शांति और विकास नहीं, कलह और अशांति का माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं.

शांति वही कायम कर रहे हैं जो कॉमेडी शो कैंसल करा रहे हैं. कबीरदास होते तो उनका शो भी कैंसल हो जाता. शांति कायम करने वाले कहते कि कबिर दास पंडित मौलवी और धर्म का मज़ाक उड़ा रहे हैं. कबीर दास पर अशांति फैलाने का आरोप लगता है. पाखंड तोड़ने के आरोप में वे जेल में होते. ऐसा पहली बार होता. कृपया पाखंड को न तोड़ें. जैसा है वैसा ही रहने दें.

अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि जिन्होंने संत कबीरदास जी को गंभीरता से नहीं पढ़ा वो समाज में कलह फैलाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन प्रधानमंत्री की केवल इस बात को गंभीरता से न लें. क्योंकि आप तय नहीं कर पाएंगे कि कौन सी बात किसे बुरी लग जाए और कबीरदास के कारण आप जेल भेज दिए गए.

फिलहाल मेरी नज़र यूपी के चौबेपुर की इस बकरी पर है जो मुझे कुणाल और मुनव्वर से ज़्यादा समझदार लगती है. यह बकरी जिसका कोई नाम नहीं है, सरकारी फाइल लेकर भाग गई है. कर्मचारी पीछे पीछे भाग रहे हैं. बकरी यहां फैज़ल के रूप में है और मुनव्वर और कुणाल का बदला ले रही है. इन फाइलों के नाम पर कितनों का जीवन चर डाला गया होगा, आज बकरी ने इस फाइल को चरने का फैसला किया है. यूपी के चौबेपुर के इस बकरी का कोई शो कैंसल करा कर देख ले. क्योंकि यह बकरी बेंगलुरू में नहीं है और बकरी ने कुणाल का शो भी नहीं देखा है. अमर उजाला ने बकरी की ख़बर छाप दी है. बकरी का कॉमेडी शो सारे संसार में पहुंच गया है.

इसमें ख़बर ये नहीं है कि बकरी फाइल लेकर भाग गई. ख़बर यह है कि खंड विकास अधिकारी ने इसे बेहद गंभीर मामला बताया है. जिन जिन लोगों को बकरी का वीडियो देखकर हंसी आई थी उनसे मेरी गुज़ारिश है कि वे गंभीर हो जाएं क्योंकि खंड विकास अधिकारी ने इसे गंभीर मामला घोषित कर दिया है. इसलिए कहता हूं कि भारत एक सीरीयस प्रधान देश है. मुनव्वर फारुक़ी का शो कैंसल करते वक्त अधिकारी ने लिखा कि मुनव्वर फारुक़ी एक विवादित व्यक्ति हैं. विवादित तो प्रधानमंत्री भी हैं, क्या अधिकारी ऐसा पत्र लिख सकते हैं. विवादित होना क्या लोकतांत्रिक होना नहीं है, लोकतंत्र में बिना अलग बात कहे कोई कैसे लोकतांत्रिक हो सकता है. सरकार से अलग राय रखने वाल हर व्यक्ति विवादित है. अगर ऐसा है तो जिस अधिकारी ने यह पत्र लिखा है उन्हें एक काम देना चाहिए कि वे साहब, दुनिया में धर्म को लेकर जितने भी चुटकुले हैं, उसका प्रिंट आउट निकालें और फाइल तैयार करें और अपने तत्काल प्रभाव से उन सभी चुटकुलों को रद्द कर दें. लेकिन फाइल फेंके नहीं.

रद्द करने के बाद अधिकारी जी वो फाइल इस बकरी को दे दें ताकि ये बकरी धर्म को लेकर बने चुटकुलों की फाइल को लेकर कहीं भाग जाए और उसे चर जाए. कुणाल और मुनव्वर को यह बकरी पाल लेनी चाहिए. यही हमारी कॉमेडी की अगली पीढ़ी है. जेन-ज़ी है. इसके बाद अब अगली पीढ़ी नहीं आएगी क्योंकि Z के बाद अल्फाबेट ही ख़त्म है. इसलिए अल्फा यानी A से गिनती होने लगी है.

माफी चाहूंगा मुझे बकरी में कुणाल और मुनव्वर दिख गए. मैं ये क्षमा कुणाल और मुनव्वर से नहीं, बकरी से मांग रहा हूं. यह बताने के लिए उस व्यक्ति की हालत भी बकरी जैसी होने वाली है जिसने CBSE की 12वीं की परीक्षा में समाजशास्त्र के पर्चे में यह प्रश्न पूछा है. इस प्रश्न के लिए CBSE ने ग़लती स्वीकार की है और ज़िम्मेदार व्यक्ति के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की बात कही है. सवाल पूछा गया कि किस सरकार के तहत 2002 में गुजरात में अप्रत्याशित स्तर पर मुस्लिम विरोधी हिंसा हुई थी? क्या यह सवाल पूछना मना है? जब यह बात NCERT की 12वीं की किताब इंडियन सोसायटी के चैप्टर ‘The Challenges of Cultural Diversity' में पढ़ाई जाती है तो उससे सवाल पूछना ग़लत कैसे हो सकता है? इस पैराग्राफ में यही लिखा है कि हर धर्म को दंगों का सामना करना पड़ा है और दंगों को लेकर कोई भी सरकार खुद को बेदाग नहीं कह सकती. 1984 में दिल्ली में सिख विरोधी दंगा कांग्रेस सरकार के अधीन हुआ और 2002 में बीजेपी सरकार के अधीन गुजरात में मुस्लिम विरोधी दंगा हुआ. यह चैप्टर तो छपा हुआ है तो सवाल पूछने वाले ने कौन सी बड़ी गलती कर दी. अगर मुझे मानने की इजाज़त है तो मेरा मानना है कि इस समय सवाल पूछने वाला और ग़लती स्वीकार करने वाला CBSE दोनों की हालत बकरी जैसी नहीं है. फिर भी इनकी हालत की तुलना बकरी से की जा सकती है. लेकिन चौबेपुर की यह बकरी इन दोनों से अलग है. बल्कि संकट की घड़ी में यह बकरी ही इन दोनों के काम आ सकती है. प्रश्न वाली फाइल लेकर भाग सकती है. लेकिन मुनव्वर फारुकी इस पोस्टर के साथ यहां खड़े रह सकते हैं कि 2002 के दंगों में उनके दस्तावेज़ जल गए. तस्वीर पुरानी है लेकिन इस पर अभी किसी बकरी की नज़र नहीं पड़ी है.

अब देखिए CBSE ने उस बात के लिए अपनी गलती मान ली, जिसे NCERT अपनी किताब में पढ़ाता है. कुणाल कामरा और मुनव्वर फारुक़ी तो कहेंगे कि कॉमेडी चल रही है. अगर यह ग़लती है तो NCERT की है, फिर CBSE क्यों माफी मांग रहा है? क्या प्रधानमंत्री ने यह प्रश्न देख लिया है? अधिकारी जनता को फाइलों में बकरी बनाते हैं और बकरी फाइल लेकर भाग जाती है.

29 मई की हेडलाइन देखिए. आज फिर महंगा हुआ पेट्रोल डीज़ल, दिल्ली में 94 रुपए के करीब. मुंबई में 100 रुपये के पार. यानी मई में 94 रुपया होना महंगा था तो दिसंबर में 94 रुपया होना सस्ता कैसे हो गया. आज की हेडलाइन देख लीजिए क्या लिखा है. किसी ने नहीं लिखा कि पेट्रोल अब भी महंगा है. अमर उजाला और टाइम्स आफ इंडिया ने लिखा है कि दिल्ली में पेट्रोल 8 रुपये सस्ता, और बाक्स में दाम लिखा है 96 रुपया प्रति लीटर. क्या ये सस्ता होना हुआ है?

क्या कोई दो भारत है? मैं भारत में हूं और वीर दास की तरह अमरीका में नहीं हूं. वीर दास होते तो इस खबर पर ज़रूर कहते कि एक भारत है जिसे 94 रुपया लीटर पेट्रोल बहुत महंगा लगता है और एक भारत है जिसे 96 रुपया लीटर पेट्रोल सस्ता लगता है. वीरों की धरती से निकले वीर दास ने इसी तरह की कुछ बात अमरीका में कही तो भारत में मुकदमा हो गया. जब तक यहां हैं एक भारत श्रेष्ठ भारत का नारा जपिए. जब अमरीका जाइयेगा तब दो भारत देखिएगा.

वीर कह रहे हैं कि मैं ऐसे भारत से आता हूं जो घर में ज़ोर ज़ोर से ठहाके लगाता है लेकिन कॉमेडी क्लब की दीवार ढहा देता है. ख़ुद पर हंस लीजिए लेकिन दूसरों पर मत हंसिए वर्ना केस हो जाएगा. मुझे लगता है कि दो भारत की बात करने वाले वीर दास, कुणाल कामरा और मुनव्वर फारुक़ी पर मुकदमा करने के बजाए उन्हें क्विज़ शो में भेजा जाना चाहिए.

यह क्विज़ शो सरकार चलाती है. एक भारत श्रेष्ठ भारत क्विज है. प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर यह शुरू हुआ था क्योंकि सेवा करते हुए उनके बीस साल पूरे हुए थे. इसलिए यह क्विज़ 17 सितंबर से 15 अक्तूबर के बीच ही चला. सेवा समर्पण क्विज़ सीरीज़ इसमें पांच लाख तक इनाम जीतने की व्यवस्था थी. कुणाल, मुनव्वर और वीर मिस कर गए. कामेडी से अच्छा है कि ये लोग क्विज़ में हिस्सा लें.

अमित शाह ने एक बयान दे दिया कि आज़ाद भारत में नरेंद्र मोदी के जैसा बेहतरीन प्रधानमंत्री प्रशासक कोई नहीं हुआ. डेक्कन हेराल्‍ड ने उनका यह बयान छापा लेकिन आप देखिए कि कॉमेडी कैसे की जाती है. ज़रूरी नहीं है कि बेंगलुरु में जाकर की जाए, वैसे यह अखबार बेंगलुरु में आता है. अमित शाह के बयान के नीचे उस भारत की सच्चाई छाप दी है जिसमें भारत की भूखमरी, गरीबी वगैरह के आंकड़े हैं. इसमें एक भारत तो है पर श्रेष्ठ भारत नहीं दिखाई देता है. लगता है इस अखबार में कोई वीर दास है जो रोज़ इस तरह से बयानों की पोल खोलता रहता है.

दिल्ली में इसी तरह की कॉमेडी वायु प्रदूषण को लेकर चल रही है. दो दो सरकारें हर सुनवाई में सीरीयस होकर सुनने जाती हैं. सुप्रीम कोर्ट से डांट खाती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दिल्ली में वायु प्रदूषण के कारण मां-बाप घर से काम कर रहे हैं और बच्चे स्कूल जा रहे हैं. दिल्ली सरकार ने स्कूल फिर से स्कूल बंद कर दिए. क्या सुप्रीम कोर्ट को पता नहीं कि कुणाल कामरा और मुनव्वर फारुकी के कई सारे कॉमेडी शो कैंसल हो गए हैं, जब उन्हें कॉमेडी करने की इजाज़त नहीं है तो बाकी लोग लिबर्टी क्यों ले रहे हैं. यह कॉमेडी है बता कर सुप्रीम कोर्ट सरकार को मुसीबत में क्यों डाल रहा है. क्या पता सरकार ही कैंसिल हो जाए. सरकार ने वैक्सीन सर्टिफिकेट पर प्रधानमंत्री की तस्वीर लगाकर कितने आरोप झेले, काश वो मध्य प्रदेश के इस अधिकारी की बात सुन लेती तो एक बोतल से ही काम हो जाता, सर्टिफिकेट की ज़रूरत ही नहीं पड़ती.

सच सच बताइये, आपने अभी सुना न कि दारु पीने वाला व्यक्ति झूठ नहीं बोलता. सच का शराब से कितना गहरा संबंध है. अब आते हैं बिहार. हम आज के शो के ज़रिए बताना चाहते हैं कि भारत में कॉमेडी केवल कुणाल और मुनव्वर की कैंसिल हुई है बाकी सब जगह कॉमेडी खुलेआम चल रही है.

जैसे बिहार विधानसभा में शराब की बोतल देखे जाने से हड़कंप मचा हुआ है. बिहार में कॉमेडी पर कोई रोक नहीं है लेकिन शराब पर प्रतिबंध है. बोतल पकड़े जाने की आशंका में हर आदमी दूसरे पर शक कर रहा है कि बोतल लेकर तो नहीं आ रहा है. लोग रात भर जाग रहे हैं कि पड़ोसी ने अहाते में बोतल तो नहीं फेंक दी है. बोतल दिख जाने की आशंका में हर आदमी बोतल हुआ जा रहा है. बोतल का मतलब बिहार में बोतल के अलावा भी है. बेवकूफ के समानार्थी के तौर पर बोतल का इस्तमाल होता है. विधानसभा के प्रांगण में बोतल मिल गया. इस तरह से हंगामा हुआ, जैसे मंगल ग्रह का एक टुकड़ा आ गिरा हो. सदन के बाहर और भीतर हंगामा मच गया कि बोतल मिल गई है. मुख्यमंत्री बहुत गुस्से में हैं कि विधानसभा में बोलत मिल गया है. बोलत को भी सोचना चाहिए था उसके मिलने की जगह जब दुनिया भर में है तो वह विधानसभा में क्यों मिली है.

बिहार में शराब पीने से भी खतरनाक शराब की बोतल का मिलना हो गया है. सोचिए अगर नदी के पानी के साथ कोई बोतल बहती चली आए, जैसे कोरोना के समय लाशें बहती चली आई थीं तब कितना हड़कंप मचेगा. सबने कहना शुरू कर दिया कि यह लाश मेरे राज्य की नहीं है. जबकि वह लाश भारतीय नागरिक की थी. क्या इन बोतलों के साथ भी यही होगा? उसे शराब का नहीं माना जाएगा? उसे बिहार का नहीं माना जाएगा?

ऐसे प्रेमी जो पत्र लिखकर बोतल में डालकर नदी के उस पार अपनी प्रेमिका को भिजवाना चाहते हैं उन्हें मेरी सलाह है कि बोतल शराब की नहीं होनी चाहिए. सरसों तेल की शीशी अगर अफोर्ड कर सकते हैं तो उसमें पत्र को डालकर नदी में प्रवाहित करें. बिहार में बोतल पर बैन है, प्रेम पर नहीं.

मध्य प्रदेश के अधिकारी को लगता है जो दारू पीता है वह झूठ नहीं बोलता लेकिन बिहार में मामला दूसरा है. लोग पीने के लिए झूठ बोल रहे हैं तो पीने के बाद सच कैसे बोल दें. शराब पीने के आरोप में हज़ारों लोग जेल में हैं. पुलिस खूब शराब पकड़ रही है लेकिन शराब बेचने के मामले में पुलिस भी पकड़ा रही है. पुलिस जिस शराब को पकड़ती है उसे अवैध घोषित करती है लेकिन उसी शराब को कोई वैध समझ कर पी जाता है और दोष चूहों पर आ जाता है कि चूहे शराब पी गए.

अक्तूबर 2018 की यह खबर बताती है कि बिहार में चूहे इतना पीने लगे हैं कि उन्हें लीवर सिरोसिस होने का ख़तरा है. चूहे शराब ही नहीं बीयर भी पी रहे हैं. चूहों को बताया जाना चाहिए कि बिहार में शराब बंदी है. मुझे बताया जाए कि चूहों को पीता देखने वाले पीते थे या नहीं पीते थे. दर्जनों बोलत शराब जब चूहे पी रहे थे तब क्या पुलिस के गोदाम में कोई हलचल नहीं हुई. क्या चूहों ने पीने के बाद इंग्लिश में पुलिस को कुछ नहीं कहा होगा, I Cant believe कि चूहों ने पीकर यूं ही छोड़ दिया होगा. I mean english नहीं बोली होगी.

बकरी फाइल लेकर भाग जा रही है और चूहे बोतल खाली कर दे रहे हैं. ऐसा लगता है कि बकरी और चूहों की दुनिया में कोई सरकार बन गई है. भारत एक सीरीयस प्रधान देश है. यहां लोग बारिश में भी गंभीरता के साथ गमलों में पानी देते हैं.

एक तस्वीर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ट्वीट की है. छतरी से यह बात प्रमाणित होती है कि बारिश हो रही है. फिर यह बात कहने का जोखिम कौन उठाए कि बारिश हो रही है तो फिर मुख्यमंत्री पौधों को पानी क्यों दे रहे हैं. क्या पौधों ने बारिश को कैंसिल कर दिया है? जिस पार्क में पौधा लगा रहे हैं उसका नाम स्मार्ट पार्क है, हमारे मुख्यमंत्री जी भी कम स्मार्ट नहीं हैं. छतरी के नीचे पानी दे रहे हैं. इस तस्वीर में केवल बारिश है जो स्मार्ट नहीं है.

कुणाल कामरा और मुनव्वर फारुकी की कॉमेडी से आप भाग सकते हैं लेकिन आपके साथ जो कॉमेडी हो रही है उससे आप नहीं भाग सकते हैं. क्योंकि आपके साथ कॉमेडी करने वाले वही लोग हैं जो कुणाल और मुनव्वर की कॉमेडी कैंसिल कर रहे हैं.

एक वीडियो केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर के दफ्तर ने ट्वीट किया था. यह जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट का प्रमोशनल वीडियो है. इसमें एयरपोर्ट के लिए जिस स्टिल पिक्चर का इस्तमाल हुआ है वह बीजिंग का एयरपोर्ट है और बन चुका है. इस स्टिल पिक्चर को कई ट्वीट में देखा गया है. आप इसे कॉमेडी की किस श्रेणी में रखना चाहेंगे. ऑल्ट न्यूज़ के ज़ुबेर ने जब इसकी तरफ इशारा किया तो इसे लेकर कई जगहों पर खबर भी छपी है. अनुराग ठाकुर ने इस पर ट्वीट के ज़रिए कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.

इस तरह की कॉमेडी यानी चूक पहले भी कई बार हो चुकी है. झुग्गी सम्मान यात्रा के नाम पर दिल्ली बीजेपी के पोस्टर में नीली कमीज़ में झांक रहे तमिल के बहुत बड़े लेखक हैं. पेरुमल मुरुगन नाम है और वे दिल्ली में नहीं रहते हैं. बीजेपी कहती है कि ग़लती से तस्वीर लग गई. 

मुरुगन ने तो कहा है कि वे खुद झुग्गियों से जुड़े हैं इसलिए खुश हैं. मगर एक ऐसा लेखक उस पार्टी के पोस्टर पर आ जाए जिसके समर्थकों ने कभी उसके लेखों के खिलाफ कई बातें कही हों तो यह कॉमेडी है. ऐसा लगता है कि बीजेपी ने मुरुगन को मंच से उतारा तो मुरुगन बीजेपी के पोस्टर में आ गए हैं. मुझे पूरा भरोसा है कि एक दिन स्टैन स्वामी की तस्वीर भी नेताओं के पोस्टर में आ जाएगी, सवाल पूछने.

जनवरी 2015 में इन्हीं पेरुमल मुरुगन के उपन्यास लेकर जब विवाद हुआ था तब उन पर कुछ संगठनों ने हमला बोल दिया था. उपन्यास पर बैन लगाने की मांग होने लगी थी. इन सभी चीज़ों से तंग आकर पेरुमल मुरुगन ने फेसबुक पर लिखा था.

लेखक पेरुमल मुरुगन मर चुका है. वह भगवान नहीं है कि दोबारा पैदा हो. उसे पुनर्जन्म में विश्वास भी नहीं है. वह एक साधारण शिक्षक है. वह पी मुरुगन के रूप में ज़िंदा रहेगा. उसे अकेला छोड़ दें.

उन्हीं मुरुगन की तस्वीर बीजेपी के पोस्टर में आ गई. इस खबर से एक और खबर याद आई कि लखनऊ में कोई बाबा विवेक कुमार हैं. उन्होंने एक लड़की को भूत का डर दिखा कर उससे करीब नौ लाख रुपये झपट लिए. लखनऊ पुलिस सीरीयस हो गई और बाबा को पैसे लौटाने पड़े. बाबा के साथ यह कॉमेडी बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए लेकिन की जा रही ह. छह साल बाद मुनव्वर फारुकी ने भी कॉमेडी छोड़ते वक्त लिखा कि नफतर जीत गई, आर्टिस्ट हार गया. I am done! Good Bye! 

देश कॉमेडी को लेकर इतना गंभीर हो गया है कि गंभीरता कॉमेडी लगने लगी है. आपको याद होगा सांसदों की कार से जब लाल बत्ती उतारी गई तब कहा गया कि वीआईपी संस्कृति खत्म हो गई है. उस फैसले को महान और ऐतिहासिक दोनों बताया गया था. 2017 का साल था. उस साल बत्ती कल्चर के खत्म होने को लेकर खूब खबरें छपी. किसी अधिकारी की कार पर बत्ती दिख जाती तो हड़कंप मच जाता. अखबार छापने लगता और अधिकारी बत्ती उतारने लग जाते. इस फैसले को क्रांतिकारी बताया गया. ऐसे बताया जाता था जैसे अधिकारी अब सामान्य हो गए हैं. देश में जनता ही वीआईपी है.

ये उस साल के उस भारत की बात है. अब मैं इस साल के इस भारत की बात बताता हूं. लोकसभा में सरकार से सवाल पूछा गया है कि क्या एयरपोर्ट के एंट्री और एग्जिट गेट पर सांसदों को लाने-ले जाने, उनके सामान को ढोने और बोर्डिंग टिकट देने को लेकर एयर लाइन कंपनियों को कोई सुझाव दिया गया है, क्या सांसद को अपनी पसंद की सीट चुनने का अधिकार है? नागरिक उड्ड्यन मंत्रालय ने जो जवाब दिया है उसे ध्यान से सुनें. इसके लिए सभी एयरलाइन कंपनियों को दिशानिर्देश जारी कर दिए गए हैं. विमान कंपनियों को सलाह दी गई है कि दिशानिर्देश के मुताबिक सांसदों को पसंद की सीट दी जाए, बशर्ते उपलब्ध हो.

क्या ये वीआईपी कल्चर नहीं है? क्या ये कॉमेडी नहीं है कि एक तरफ लाल बत्ती हटाई जा रही है ताकि किसी गाड़ी को दूसरी गाड़ी की तुलना में विशेष सुविधा न मिले, दूसरी तरफ सांसदों को पसंद की सीट के लिए दिशानिर्देश दिए जा रहे हैं. हवाई अड्डे के गेट पर उनके आने जाने के समय विशेष प्रोटोकोल की बात हो रही है. बिहार विधानसभा में तो एक मंत्री जीवेश मिश्रा आज इस बात से नाराज़ हैं कि उन्हें रोक कर एसपी, डीएम की कार आगे कैसे चली गई. आज उन्होंने कह दिया कि तय हो कि कौन बड़ा है, सरकार मंत्री बड़ा है या एसपी डीएम बड़ा है.


आप भी अपने बारे में तय कर लीजिए कि आप क्या हैं, आज ही तय कीजिए कि आप जनता हैं या नहीं. जनता हैं तो सरकार आपसे बड़ी है या आप सरकार से बड़े हैं. मंत्री जी तय किए जाने को लेकर बहुत सीरीयस हो गए हैं. बिहार विधानसभा में बैठक भी हो गई है. बोतल से सहमा बिहार यह तय करने में सक्षम है कि कौन बड़ा है. एसपी बड़ा है या मंत्री बड़ा है, डीएम बड़ा है या सरकार बड़ी है, लेकिन इस बात को लेकर कोई झगड़ा नहीं है कि शो किसका कैंसल करना है, कुणाल का या फारुकी का. कुणाल कामरा ने लिखा है कि सबको बराबर से कुचला जा रहा है. 

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भारत में सीरीयसता का प्रसार हो रहा है. यह अच्छी बात है कि हम हर बात को लेकर गंभीर हो रहे हैं. केवल गंभीर होने वाली बात को लेकर गंभीर नहीं हो रहे हैं.