सियासी महत्वाकांक्षाओं को संभाले रखने की पुरानी आदत रखने वाली कांग्रेस पार्टी के हालिया सांगठनिक फेरबदल में एक बड़ा पैगाम छिपा है. यह फेरबदल किसी नियुक्ति पत्र पर छपे नामों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस बुनियादी सवाल का जवाब देने की कोशिश है जिसका सामना यह पुरानी पार्टी काफी वक्त से कर रही है.
और ये सवाल हैं कि आखिर कौन जनता के प्यार को वोटों में तब्दील कर सकता है और कौन उस संगठन को दोबारा खड़ा कर सकता है जहां कांग्रेस अपना पुराना दबदबा खो चुकी है?
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की ओर से किए गए इन बदलावों में सचिन पायलट को ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (AICC) का महासचिव बनाकर पंजाब का प्रभारी नियुक्त करना सबसे अलग नजर आता है.
इस नियुक्ति को देखकर तो ये बात साफ कही जा सकती है कि ये महज राज्य की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि पायलट के सब्र, उनकी साख और सियासी तूफानों के बावजूद पार्टी का दामन थामे रखने के हौसले को मिली एक पहचान है.
इस फैसले के ऐलान के कुछ ही मिनटों के भीतर पंजाब कांग्रेस के तमाम गुटों के नेताओं ने इस कदम का तहे दिल से शुक्रिया अदा किया.
पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और गुरदासपुर के सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा ने पायलट को मुबारकबाद दी.
सब्र ही सबसे बड़ा हथियार
सचिन पायलट का एक पसंदीदा जुमला है जिसका इस्तेमाल वे अकसर लंबी बातचीत के दौरान करते हैं. इसका मतलब है कि किसी काम को अंजाम देने के कई रास्ते हो सकते हैं.
पायलट के सियासी सफर में इस हुनर की बार-बार आजमाइश भी हुई है.
सितंबर 2022 की बात है, जब कई लोगों को लग रहा था कि सचिन पायलट आखिरकार राजस्थान के मुख्यमंत्री की कुर्सी के बेहद करीब पहुंच चुके हैं.
तब अशोक गहलोत के कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने के फैसले ने एक नया रास्ता साफ किया था. आलाकमान बदलाव चाहता था और पायलट इस जिम्मेदारी के लिए सबसे स्वाभाविक पसंद नजर आ रहे थे. लेकिन राजस्थान की सियासत ने वहीं एक नया मोड़ ले लिया.
गहलोत के वफादारों ने नेतृत्व परिवर्तन पर चर्चा के लिए बुलाई गई कांग्रेस विधायक दल की बैठक का बहिष्कार कर दिया. इस बगावत ने केंद्रीय नेतृत्व को असहज कर दिया और तुरंत होने वाले सत्ता परिवर्तन के रास्ते बंद कर दिए. किसी भी आम राजनेता के लिए ऐसा मौका बगावत करने या पार्टी छोड़ देने का सबब बन सकता था. मगर पायलट ने इनमें से कोई भी रास्ता नहीं चुना. वे पार्टी के भीतर ही डटे रहे, संगठन के कामों में लगे रहे और अपनी अहमियत बनाए रखी. इस फैसले के लिए बहुत बड़े सियासी अनुशासन की जरूरत थी.
कांग्रेस समर्थकों और उन सामाजिक तबकों के बीच, जहां पायलट की अच्छी पकड़ है, एक मजाक काफी मशहूर है.
नेता अकसर मजाक में कहते हैं कि राहुल गांधी ने लियो टॉल्स्टॉय के 'सब्र और वक्त दो सबसे ताकतवर योद्धा हैं' वाली बात कही थी और लगता है कि शायद सबसे ज़्यादा यकीन सचिन पायलट को ही था.
राजेश पायलट की विरासत से सचिन के अधूरे सफर तक
सचिन पायलट की कहानी को उनके पिता राजेश पायलट की विरासत से अलग करके नहीं देखा जा सकता. पूर्व वायु सेना स्क्वाड्रन लीडर रहे वरिष्ठ पायलट अपनी पीढ़ी के सबसे प्रभावशाली कांग्रेस नेताओं में से एक थे.
प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार में गृह राज्य मंत्री के तौर पर उन्होंने अपनी प्रशासनिक काबिलियत और सियासी आत्मविश्वास की गहरी छाप छोड़ी थी.
कांग्रेस के पुराने जानकार आज भी याद करते हैं कि साउथ ब्लॉक स्थित गृह मंत्रालय से काम करते हुए राजेश पायलट का रसूख उनके औपचारिक पद से कहीं ज्यादा हुआ करता था. वे उन गिने-चुने नेताओं में से थे जो प्रशासनिक समझ के साथ-साथ जन-आवाम से सीधा जुड़ाव रखते थे.
सचिन पायलट महज 26 साल की उम्र में लोकसभा सांसद बने, 32 की उम्र में केंद्रीय मंत्री बने और एक दशक के भीतर ही राजस्थान के उप-मुख्यमंत्री के पद तक पहुंच गए.
उनकी लोकप्रियता सिर्फ सियासत तक महदूद नहीं थी. साल 2009 में जाने-माने अदाकार अभिषेक बच्चन ने खुले तौर पर यह बात कबूली थी कि आर. बाल्की की फिल्म 'पा' में उनके राजनेता किरदार अमोल आर्ते का लुक काफी हद तक सचिन पायलट और मिलिंद देवड़ा से प्रेरित था.
इस किस्से की अहमियत इस बात में है कि उस वक्त पायलट किस बात की नुमाइंदगी करते थे. एक नए जमाने का कांग्रेस राजनेता, जो पढ़ा-लिखा, शालीन, अपनी बात बेबाकी से रखने वाला और हर किसी के लिए सुलभ था. वे एक ऐसी पार्टी का चेहरा लग रहे थे जो अपनी रिवायत और आधुनिकता के बीच पुल बनाने की कोशिश कर रही थी.
इसके बावजूद, पायलट की छवि सिर्फ ऊपरी चमक-धमक तक सीमित नहीं थी. पेन्सिलवेनिया यूनिवर्सिटी से एमबीए और टेरिटोरियल आर्मी में अधिकारी रहने के नाते, उन्होंने सरकार के भीतर एक ऐसे शख्स की पहचान बनाई जो पेचीदा नीतिगत मुद्दों को गहराई से समझ सकता था.
नौकरशाहों ने भी कहा कि सचिन पायलट हमेशा पूरी तैयारी के साथ आते थे, तो वहीं पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए वे हमेशा मौजूद रहे. असली चुनौती बस सही सियासी वक्त की थी.
साल 2026 में पंजाब उनके लिए वही सही वक्त साबित हो सकता है. पायलट के सामने अब आपस में उलझे नेताओं के बीच संतुलन बनाने, कार्यकर्ताओं के भरोसे को बहाल करने और पार्टी को एक ऐसे चुनावी मुकाबले के लिए तैयार करने की जिम्मेदारी है जहां कोई भी दल अपनी जीत को पक्का नहीं मान सकता.
उनकी कामयाबी कांग्रेस के भीतर एक बड़े सवाल का जवाब भी देगी कि क्या आज की राजनीति में सब्र, वफादारी और सांगठनिक लगन की कोई सियासी कीमत बची है या नहीं.
राज्य स्तर के दिग्गजों की तलाश
इस सांगठनिक फेरबदल का असली मकसद कांग्रेस नेतृत्व की उस जमीनी हकीकत को स्वीकार करने में छिपा है जिसने दशकों से भारतीय चुनावों का रुख तय किया है.
राष्ट्रीय मुद्दे भले ही लोगों का ध्यान खींच लें, लेकिन चुनाव आखिरकार राज्य के मजबूत संगठनों, स्थानीय लीडरशिप और बूथ स्तर के नेटवर्क से ही जीते जाते हैं.
इतिहास गवाह है कि कांग्रेस तभी कामयाब हुई है जब आलाकमान को दिल्ली के फैसलों का इंतजार करने के बजाय जमीन पर ताकत दिखाने वाले मजबूत प्रांतीय लीडर्स का साथ मिला.
इंदिरा गांधी की कांग्रेस बहुत हद तक उन मुख्यमंत्रियों और राज्य स्तरीय दिग्गजों पर टिकी थी जो चुनाव जिताने का दम रखते थे.
राजीव गांधी ने एक नई पीढ़ी के नेताओं पर दांव लगाया जो बदलते भारत का चेहरा थे. सोनिया गांधी के अध्यक्ष रहते हुए दिल्ली में शीला दीक्षित, मध्य प्रदेश में माधवराव सिंधिया, राजस्थान में राजेश पायलट और पश्चिम बंगाल में प्रणब मुखर्जी जैसे दिग्गजों ने पार्टी के सियासी वजूद को बनाए रखने में बेहद अहम किरदार निभाया.
मौजूदा फेरबदल इस बात का इशारा करता है कि खरगे और राहुल गांधी उसी पुराने ढांचे को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं. इसी क्रम में ऐसे नेताओं की पहचान की जा रही है जो महज ओहदे संभालने के बजाय मुश्किल राज्यों में कुशल सियासी रणनीतिकार बनकर उभर सकें.
रणदीप सिंह सुरजेवाला को दी गई जिम्मेदारियों से यह साफ होता है कि कांग्रेस चुनौतीपूर्ण राज्यों में तजुर्बेकार सांगठनिक प्रबंधकों को तैनात करने की कोशिश कर रही है.
सुरजेवाला पार्टी के सबसे प्रमुख राष्ट्रीय प्रवक्ताओं में से एक रहे हैं और राहुल गांधी की पीढ़ी के अहम साथी माने जाते हैं.
चुनावी राजनीति तक महदूद रहने वाले कई नेताओं के उलट, सुरजेवाला ने बरसों तक पार्टी के प्रचार, संगठन और पॉलिटिकल मैसेजिंग को संभालने में वक्त बिताया है.
गुजरात के प्रभारी महासचिव के रूप में उनका नया जिम्मा भारतीय राजनीति की सबसे कठिन चुनौतियों में से एक है. यह राज्य पिछले तीन दशकों से बीजेपी का सबसे मजबूत वैचारिक और चुनावी किला रहा है. इसलिए गुजरात में सुरजेवाला का काम तुरंत चुनावी जीत हासिल करना नहीं, बल्कि लगातार हार से टूटे पार्टी ढांचे को दोबारा खड़ा करना, जिला स्तर की लीडरशिप को मजबूत करना और जनता के सामने एक भरोसेमंद विकल्प पेश करना है.
सुरजेवाला का कर्नाटक प्रभारी बने रहना भी उतना ही अहम है. 2029 से पहले यह राज्य कांग्रेस की सबसे बड़ी सियासी संपत्ति माना जा रहा है.
सुखदेव भगत को छत्तीसगढ़ की कमान वापस सौंपने का फैसला हार के बाद पार्टी को दोबारा खड़ा करने की जरूरत को दिखाता है.
झारखंड के एक आदिवासी नेता और सांगठनिक तजुर्बा रखने वाले भगत, हाशिए पर मौजूद तबकों और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच कांग्रेस की पुरानी पकड़ की नुमाइंदगी करते हैं.
भगत की असल परीक्षा संगठन को फिर से जमीन से जोड़ने, अचानक सत्ता गंवाने से मायूस हुए कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाने और पार्टी को वापसी के लंबे रास्ते पर आगे ले जाने की होगी.
महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के सामने फिर से खड़े होने की दो बिल्कुल अलग-अलग चुनौतियां हैं. डॉ. सिरिवेला प्रसाद का महाराष्ट्र का जिम्मा नतीजों को संभालने का है.
कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में महा विकास अघाड़ी (MVA) के साथ मिलकर शानदार प्रदर्शन करते हुए 48 में से 13 सीटें जीती थीं, लेकिन कुछ ही महीनों बाद हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी महज 16 सीटों पर सिमट गई.
प्रसाद, जो 2024 की महाराष्ट्र स्क्रीनिंग प्रक्रिया में शामिल थे, को इस नाकामी की वजहों को समझना होगा, MVA के भीतर कांग्रेस के अपने संगठन को मजबूत करना होगा और यह यकीनी बनाना होगा कि पार्टी उद्धव ठाकरे और शरद पवार के हाथों बने गठबंधन में महज एक छोटा सा हिस्सा बनकर न रह जाए.
पी.वी. मोहन का आंध्र प्रदेश का जिम्मा एक तरह से पार्टी को फिर से जिंदा करने जैसा है. वाई.एस. राजशेखर रेड्डी के दौर में यूपीए का मजबूत गढ़ रही कांग्रेस, 2014 में राज्य के बंटवारे, जगन मोहन रेड्डी के उभार और अपने पुराने सामाजिक जनाधार के बिखरने से पूरी तरह तबाह हो गई थी.
इसके बाद से पार्टी इस राज्य में एक भी लोकसभा या विधानसभा सीट जीतने में नाकाम रही है. वाई.एस. शर्मिला ने पार्टी को थोड़ी पहचान ज़रूर दिलाई है, लेकिन सांगठनिक मजबूती अभी बाकी है.
मोहन का काम इस नाम के पीछे संगठन का ढांचा तैयार करना है. ज़िला इकाइयों को दोबारा जिंदा करना, पुराने कांग्रेस समर्थकों से संपर्क साधना, युवा नेतृत्व की पहचान करना और राज्य के बंटवारे के वादों और विशेष राज्य के दर्जे जैसे मुद्दों पर सियासी जमीन तैयार करना है.
कांग्रेस का दबदबा अब भी कुछ इलाकों में बचा है, लेकिन वह बीजेपी के सांगठनिक विस्तार का मुकाबला करने में पसीने छूट रहे हैं.
बघेल की इस जिम्मेदारी के लिए सिर्फ चुनाव प्रबंधन से काम नहीं चलेगा. उन्हें कार्यकर्ताओं में फिर से भरोसा जगाना होगा, क्षेत्रीय समीकरणों को साधना होगा और उस राज्य में एक दमदार विपक्ष की आवाज उठानी होगी जहां कभी कांग्रेस का एकछत्र राज हुआ करता था. लेकिन चूंकि असम इस वक्त कांग्रेस की पहली प्राथमिकता वाले राज्यों में शामिल नहीं दिखता, इसलिए यह फैसला इस बात का पैगाम भी हो सकता है कि बघेल के सबसे सुनहरे दिन शायद अब बीत चुके हैं.
सिर्फ पद या कोई मकसद भी?
बहरहाल, इस फेरबदल से कुछ असहज करने वाले सवाल भी पीछे छूट जाते हैं.
प्रियंका गांधी वाड्रा बिना किसी तय राज्य की जिम्मेदारी के महासचिव बनी हुई हैं. आवाम से उनके सीधे जुड़ाव, धुआंधार चुनाव प्रचार की काबिलियत और गांधी परिवार के भीतर उनकी प्रतीकात्मक अहमियत को देखते हुए, उनके समर्थकों का मानना है कि संगठन में एक ज्यादा केंद्रित भूमिका से उनकी क्षमताओं का बेहतर इस्तेमाल हो सकता था.
इसी तरह, मुकुल वासनिक जैसे पार्टी के सबसे तजुर्बाकार सांगठनिक प्रबंधकों और पूर्व यूथ कांग्रेस अध्यक्ष को महासचिव पद पर तो बरकरार रखा गया है, लेकिन उन्हें किसी बड़े राज्य का प्रभारी नहीं बनाया गया. जिस पार्टी ने हमेशा से कमान के अस्पष्ट ढांचे से जुझारूपन खोया है, वहां इस तरह की धुंधली जिम्मेदारियां संगठन और कार्यकर्ताओं, दोनों के भीतर असमंजस पैदा कर सकती हैं.
कांग्रेस के सामने इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती नेताओं की कमी नहीं, बल्कि उन्हें जवाबदेह सियासी प्रबंधकों में तब्दील करने की है.
इस पूरे फेरबदल का पैगाम बिल्कुल साफ है. पार्टी अब सिर्फ नुमाइंदगी या क्षेत्रीय संतुलन बनाने के चक्कर में नहीं है. वह ऐसे लोगों की तलाश में है जो जमीन पर नतीजे लाकर दिखा सकें.
2029 की चुनावी जंग से पहले, कांग्रेस को महज नाम के मुसाफिरों की नहीं, बल्कि जमीनी जंग जीतने वाले सच्चे सियासी कप्तानों की सख्त जरूरत होगी.