मोदी जी के मंत्री कैमरे को गाली देते हैं, मोदी जी को 55 कैमरे कवर करते हैं

गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा गाली भी देते हैं और कैमरे भी बंद करा सकते हैं. इन दोनों काम के लिए प्रधानमंत्री मोदी के कैबिनेट में अलग से मंत्रालय तो नहीं है. लेकिन गृह राज्य मंत्री ने अपने काम को विस्तार दिया. अपने मंत्रालय को बड़ा करते हुए पत्रकारों को गंदे लोग कहा, गाली दी और कैमरे बंद कर दिए. 

गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा गाली भी देते हैं और कैमरे भी बंद करा सकते हैं. इन दोनों काम के लिए प्रधानमंत्री मोदी के कैबिनेट में अलग से मंत्रालय तो नहीं है. लेकिन गृह राज्य मंत्री ने अपने काम को विस्तार दिया. अपने मंत्रालय को बड़ा करते हुए पत्रकारों को गंदे लोग कहा, गाली दी और कैमरे बंद कर दिए. 

काशी में 55 कैमरे पवित्र हो गए थे क्योंकि वे सवाल नहीं कर रहे थे, लखीमपुर खीरी में एक सवाल क्या कर दिया, कैमरे वाले गंदे लोग हो गए. यही फर्क है प्रधानमंत्री और उनके मंत्री में. उनके मंत्री कैमरा बंद करा देते हैं लेकिन प्रधानमंत्री के लिए दूरदर्शन 55 कैमरे लगवा देता है. गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा मीडिया को गंदे लोग क्यों कह रहे हैं, उन्हें क्यों गाली दे रहे हैं? जबकि प्रधानमंत्री जो बाइडन की डेमोक्रेसी समिट में कहते हैं कि स्वतंत्र न्यायपालिका और फ्री मीडिया लोकतंत्र के लिए बेहद ज़रूरी हैं. पांच दिन भी नहीं हुए इस बयान को और मंत्री जी गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी मीडिया को गंदे लोग कह रहे हैं, कैमरा बंद करवा रहे हैं.

मेरी नज़र मीडिया को धमका रहे गृह राज्य मंत्री की कोट पर भी पड़ गई. देख रहा था कि टेलर ने कैसा सिला है. थोड़ी लूज़ फिटिंग है लेकिन ठीक है. इतना चलता है लेकिन जैसे गाली दे रहे हैं, गंदे लोग बोल रहे हैं वो नहीं चलता है. एसआईटी को लेकर सवाल पूछते ही पत्रकार पर हावी हो गए, कैमरा बंद कराने लगे, क्या मंत्री जी ये सब प्रेस की स्वतंत्रता के लिए कर रहे हैं? इन्हीं सब कारणों से प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में भारत दुनिया में 142वें नंबर पर है.

एसआईटी की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में तैयार हुई है न कि मीडिया की निगरानी में. इस एसआईटी ने कोर्ट से गुज़ारिश की है कि मंत्री जी के बेटे पर दुर्घटना की जगह हत्या का आरोप लगाए जाएं क्योंकि किसानों को साज़िश के तहत मारा गया है. हम भी समझते हैं कि यह एक रिपोर्ट है. लेकिन मंत्री संवैधानिक पद पर हैं. उन पर जांच को प्रभावित करने के आरोप लग सकते हैं जब दूसरे सामान्य लोगों पर लगते हैं तो मंत्री पर क्यों नहीं लगेगा. क्या प्रधानमंत्री अब अजय मिश्रा टेनी को बर्ख़ास्त करेंगे या इसलिए नहीं करेंगे कि अब करेंगे तो लोग प्राइम टाइम को क्रेडिट देने लगेंगे. कि प्राइम टाइम के कारण बर्खास्त करना पड़ गया है.

इस वीडियो को देखकर अजय मिश्रा का एक पुराना बयान याद आ गया जिसमें उन्होंने कहा था कि लोग जान लें कि वे सांसद और विधायक बनने से पहले क्या थे. क्या मंत्री जी ऐसा कुछ थे जैसा इस वीडियो में वे प्रदर्शन कर रहे हैं?

लोकसभा की वेबसाइट पर उनका बायोडेटा है. पढ़ कर मैं भावुक हो गया कि मैंने उनके बारे में क्या क्या सोच लिया था, वही सब बाहुबली etc. लेकिन उन्होंने तो लिखा है कि सामाजिक असमानता से द्रवित होकर राजनीति में आ गए और बीजेपी के ज़िला महासचिव बने. सोचिए जो लोगों की गरीबी से द्रवित होकर राजनीति में आ गए उनके बारे में लोग जानते ही नहीं कि विधायक और सांसद बनने से पहले क्या थे. किस तर्क से मान लिया जाए कि इस पद पर रहते हुए मंत्री जी जांच को नहीं प्रभावित करेंगे. राहुल गांधी ने अजय मिश्रा टेनी की बर्खास्तगी को सवाल पर स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया है. ताकि एसआईटी रिपोर्ट आने के बाद चर्चा हो.

प्रेस तो यही पूछ रहा था कि आपके बेटे आशीष मिश्रा पर एसआईटी की रिपोर्ट में हत्या के आरोप लगाए गए हैं, विपक्ष इस्तीफे की मांग कर रहा है लेकिन मंत्री जी कैमरे वाले को गंदे लोग कह रहे हैं. कोई फैसला नहीं दे रहा है लेकिन आरोप लगा है, आप मंत्री हैं तो सवाल तो होगा. सवाल इसलिए भी होगा कि जिस जीप से किसानों की हत्या की गई, जो हत्या साज़िश के तहत की गई कि किसानों को मारना है, वो जीप मंत्री अजय मिश्रा के नाम से रजिस्टर्ड है. मंत्री जी शामिल नहीं हैं लेकिन नैतिक जिम्मेदारी तो बनती है जब एसआईटी ने साज़िश की बात कह दी तो इस्तीफा मांगने का सवाल कैसे गलत हो सकता है. इस तरह से किसानों को कुचल कर मार दिया गया, एक पत्रकार श्याम सुंदर की हत्या हुई है. मंत्री जी पत्रकारों को ही गंदे लोग बोल रहे हैं.

प्रधानमंत्री एसआईटी की रिपोर्ट के कारण भले मिश्रा को बर्खास्त न करें लेकिन इस बात के लिए तो सोच सकते हैं कि मंत्री ने पत्रकारों को गाली दी है. भोपाल की सासंद साध्वी प्रज्ञा ने चुनाव में गांधी के हत्यारे को देशभक्त कर दिया, प्रधानमंत्री ने तुरंत कहा कि कभी माफ नहीं करेंगे और साध्वी प्रज्ञा सांसद बन गईं. आज तक किसी को पता नहीं कि साध्वी प्रज्ञा को उन्होंने किस तरह से माफ नहीं किया.

काशी में 55 कैमरों का कितना महत्व था, खीरी में एक कैमरे को बंद करा दिया गया. करोड़ों जनता महंगाई में डूबी है उसके लिए एक कैमरा नहीं है, प्रधानमंत्री दो मिनट के लिए गंगा में डुबकी लगाते हैं उसके लिए 55 कैमरे लगाए गए हैं.

प्रसार भारती के प्रमुख शशि शेखर वेमपति के ट्वीट ने देश को बता दिया कि प्रधानमंत्री के काशी विश्वनाथ के दौरे को कवर करने के लिए 55 कैमरे लगाए गए हैं. 55 कैमरों के इस तपोवन में प्रधानमंत्री जहां से गुज़रते थे, कई एंगल से फिल्माया जाता था ताकि गुज़रने के दृश्य को क्षण क्षण बदल कर दिखाया जा सके. हर पल लगे कि कुछ नया देख रहे हैं और नया के नाम पर कवरेज़ में एक्शन बना रहे. एक्शन में जान डालने के लिए जिमी जिब्स लगाए जिनकी मदद से कैमरे ऊपर से नीचे या नीचे से ऊपर उठते हुए, करीब जाकर पीछे हटते हुए प्रधानमंत्री को कवर करते रहे और इन सबको उसी वक्त घर घर पहुंचाने के लिए सात सैटेलाइट अपलिंक वैन लगाए गए. ड्रोन कैमरों की मदद से वीडियो बनाकर मीडिया को दिया जा रहा था ताकि आप घर बैठे आकाश की ऊंचाई से देखने का सुख प्राप्त कर सकें. RF कैमरे भी लगाए गए थे. प्रसार भारती के प्रमुख ने केवल कैमरों और अपलिंक वैन की संख्या बताई बाकी की नहीं. यह जानने का विषय है कि दूरदर्शन ने इस कवरेज पर कितना खर्च किया. यह आप कभी नहीं जान पाएंगे कि इसके अलावा गोदी मीडिया के कितने कैमरे दिन रात काम कर रहे थे।उनका खर्चा कितना रहा होगा.

हम यह सवाल इसलिए कर रहे हैं क्योंकि जब कोरोना आया तो केंद्र और राज्य सरकारों ने पेट्रोल और डीज़ल पर टैक्स बढ़ा दिए. पेट्रोल के दाम 100 रुपये लीटर से अधिक हो गए और उसके कारण दूसरी चीज़ों के दाम बढ़ गए. सरकार का ही आंकड़ा है कि पिछले पांच साल में सभी सरकारों ने पेट्रोल और डीज़ल पर टैक्स से 32 लाख करोड़ कमाए हैं. 2018 से 2021 के बीच ही 18 लाख करोड़ की वसूली हुई है. जनता जब रो रही थी कि बहुत महंगा है तो मंत्री कह रहे थे कि महामारी के कारण सरकार के सामने पैसे की चुनौती है, विकास और टीके के लिए टैक्स लिया जा रहा है. जनता ने मान लिया और रोते रोते टैक्स दिया. तो क्या इस पैसे से सरकारी आयोजन भव्य होना चाहिए जिस तरह से प्रधानमंत्री के कार्यक्रम हो रहे हैं. क्या उनके कार्यक्रम इस महंगाई के दौर में विलासिता की सीमा को पार नहीं कर रहे हैं?

आप नोट नहीं कर रहे हैं लेकिन प्रधानमंत्री के किसी भी सरकारी कार्यक्रम को देखिए, कितने खर्चीले और शाही हो चुके हैं. सरकारी कार्यक्रम के नाम पर बसों में भर भर कर लोग लाए जा रहे हैं, आयोजन स्थल को भव्य बनाया जा रहा है, वायु सेना के विमानों से उड़ान भरने को कहा जा रहा है. अगर यूपी और केंद्र सरकार यही बता दे कि प्रधानमंत्री के इन कार्यक्रमों पर अब तक कितना खर्च हुआ है तो आपको पता चलेगा कि आप जो पेट काट कर पेट्रोल के दाम दे रहे है उस टैक्स के पैसे से क्या हो रहा है. जिन कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री विकास और विरासत की बात करते हैं क्या उन्हें वहां विलासिता नहीं दिखती है? अनुराग द्वारी की रिपोर्ट थी कि मध्य प्रदेश में प्रधानमंत्री के चार घंटे के कार्यक्रम के लिए 23 करोड़ खर्च हुए. 13 करोड़ का बजट लोगों को कार्यक्रम में लाने ले जाने के लिए था. जिस वक्त जनता महंगाई से परेशान है, कमाई नहीं है उस वक्त प्रधानमंत्री के सारे कार्यक्रम विलासिता से भरे क्यों नज़र आते हैं? Do you get my point.

प्रधानमंत्री के घरेलू दौरों का खर्चा रक्षा बजट से आता है लेकिन राज्यों में जो सरकारी कार्यक्रम होते हैं उनके खर्चे का अनुमान भी किसी को नही है. खासकर चुनावी राज्यों में. बंगाल के बाद यूपी में उनके दौरों और कार्यक्रमों की संख्या बढ़ गई है. आखिर इन खर्चों का हिसाब क्यों नहीं दिया जाता है? जिस तरह से pmindia.gov.in की साइट पर प्रधानमंत्री के कुछ विदेश दोरौं का केवल विमान का खर्चा दिया गया है. अन्य खर्चे शामिल नहीं होते हैं. इस पर जानकारी दी गई है कि 2019 में 13 से 19 नवंबर के बीच उनकी ब्राज़ील यात्रा का बिल 20 करोड़ है. उसी साल 21 से 28 सितंबर के बीच अमरीका की यात्रा पर 23 करोड़ से अधिक खर्च हुए थे.

ध्यान रखिए कि एसपीजी का बजट अलग से होता है, वो 400 करोड़ के आस पास है. इसके अलावा मंत्रिपरिषद का भी बजट होता है. कैबिनेट और राज्य मंत्रियों की सैलरी, अन्य भत्ते पूर्व प्रधानमंत्रियों पर होने वाले खर्चे इसमें शामिल होते हैं. 2020-21 के बजट में मंत्रिपरिषद का बजट 766 करोड़ प्रस्तावित था जिसे बढ़ा कर संशोधित बजट में 939 करोड़ कर दिया गया. 2021-22 के बजट में तो 1160 करोड़ प्रस्तावित है. मंत्रियों के लिए पैसे की कोई कमी नहीं है. क्या प्रधानमंत्री बता सकते हैं कि चुनावी राज्यों में मंत्रियों के हवाई खर्चे का हिसाब कितना बढ़ जाता है? कोरोना काल में मंत्रिपरिषद का बजट क्यों बढ़ रहा है?

अखबारों के ज़रिए ये खबरें आप तक पहुंच गई होगी कि महंगाई कितनी बढ़ गई है. अक्टूबर में ही महंगाई पिछले पांच महीनों में सबसे अधिक हो गई थी 12.25 प्रतिशत लेकिन नवंबर में तो यह उससे भी अधिक हो गई. 2 प्रतिशत बढ़कर 14.23 प्रतिशत हो गई. पिछले साल इसी महीने 2.29 प्रतिशत थी. एक जानकार का कहना है कि 1991 के बाद इतनी महंगाई नहीं देखी गई. तीस साल में यह रिकार्ड है. ये हेडलाइन कह रही है कि भारत में 1991 के बाद से इतनी महंगाई कभी नहीं देखी गई. भारत की अलग अलग भाषाओं के अख़बारों की हेडलाइन बता रही है कि पिछले एक साल से जनता की जेब से लेकर बचत पर क्या असर पड़ा है.

अब यह पुराना हो गया कि महंगाई आसमान छू रही है, नया यह होना चाहिए कि महंगाई अंतरिक्ष में चली गई है. आठ महीने से थोक महंगाई दर दो अंको में है. 4 नवंबर को पेट्रोल और डीज़ल पर उत्पाद शुल्क में कटौती की गई थी उसके बाद भी नवंबर की महंगाई दरों पर कोई असर नहीं दिखता है. पेट्रोल अभी भी भारत के तमाम शहरों में 95 रुपया लीटर बिक रहा है. मुंबई में 109 रुपये लीटर है. महंगाई के असर को कवर करने लिए एक चैनल को कम से कम 110 कैमरे चाहिए. हमारे पास तो इतने कैमरे नहीं हैं. प्राइम टाइम एक ही कैमरे से रिकार्ड करता हूं और कानन पात्रा रिकार्ड करते हैं. लेकिन क्या जनता के पैसे से चलने वाला दूरदर्शन अपने 55 कैमरों से जनता की तकलीफ को कवर कर सकता है? प्रधानमंत्री जी जनता नी सेवा मां लागेला छे, आ जनता ने कवर करवा माटे दूरदर्शनें केटला कैमरा लगाव्या छे? गुजराती में पूछ रहा हूं.

हम एनिमेशन से तो 55 कैमरे बना ही सकते थे, ताकि उनसे आपको दिखा सके कि खाने पीने की चीज़ों के दाम 13 महीनों में सबसे अधिक हैं. कई महीनों से दाम बढ़ते ही जा रहे हैं. इस बार भी खाने पीने की चीजें और ईंधन के दाम महंगे हुए हैं. यही कैमरे जब बैंकों में रखे आपके पैसे पर नज़र ड़ालते हैं तो पता चलता है कि बचत दर निगेटिव हो चुकी है. फिक्स डिपोज़िट के भरोसे जीवन काटने वालों की मासिक आमदनी घट गई है. इन 55 कैमरों की मदद से आप डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की कीमत भी देख सकते हैं. रुपया लगातार कमज़ोर होता जा रहा है और एक डालर की कीमत 75 रुपये 88 पैसे हो गई है. 22 जून 2020 के बाद यह सबसे बड़ी गिरावट है. इन 55 कैमरों से आप यह भी देखिए कि शहरों में बेरोज़गारी की दर कितनी बढ़ गई है. अब आप खुद ही सोफे से उठकर इन 55 कैमरों के सामने खड़े हो जाइये और इन्हीं में प्रवेश कर जाइये ताकि जनता ही गायब हो जाए.

बीमा का ही प्रीमियम कितना महंगा होता जा रहा है. ऊपर से जीसटी के कारण यह महंगाई और भी मारक हो जाती है. रसोई गैस का दाम और स्कूल की फीस, अस्पतालों और दवाओं के बिल. हर चीज़ महंगी हो चुकी है. वहां पर 55 कैमरे नहीं हैं. बैंकों में बचत के भरोसे जीने वाले रिटायर्ड लोगों का जीवन मुश्किल हो गया है.

नीति आयोग की एक नई रिपोर्ट के अनुसार भारत में सबसे ज़्यादा गरीब यूपी, बिहार और झारखंड में रहते हैं. यूपी की आबादी का 37.79 प्रतिशत ग़रीब है. यह आंकड़ा करीब 8 करोड़ के आस-पास बैठता है. लेकिन यूपी सरकार ने मुफ्त अनाज वितरण का जो विज्ञापन दिया है उसमें यही लिखा हुआ है कि 15 करोड़ ग़रीबों को मुफ्त अनाज दिया जा रहा है. केंद्र सरकार कहती है कि यूपी में 9 करोड़ गरीब हैं और यूपी की सरकार कहती है कि उसके राज्य में 15 करोड़ गरीब हैं. मेरी बात मुख्यमंत्री से होती है न प्रधानमंत्री से तो बता नहीं सकता कि कितने गरीब हैं.

यूपी चुनाव का एक फायदा हुआ है. प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण योजना नवंबर में बंद होने जा रही थी मगर घोषणा होने के बाद भी शुरू कर दी गई. अब यह योजना मार्च 2022 तक चलेगी. यूपी सरकार ने इसमें अपनी तरफ से भी काफी कुछ जोड़ दिया है. इसके तहत महीने में दो बार मुफ्त अनाज मिलेगा. औऱ यह राशन केवल गरीबों को नहीं बल्कि सभी कार्डधारकों को मिलेगा. इसके तहत एक किलो दाल, एक लीटर तेल एक किलो नमक फ्री मिलेगा. सरकार महंगाई के राजनीतिक असर को जानती है इसलिए नून तेल बांट रही है. झोला भी दिया जा रहा है ताकि मुफ्त नून तेल के साथ मुफ्त में दाता की तस्वीर भी मिल सके. इसके बाद भी लोग महंगाई से परेशान हैं. 

अनुराग द्वारी के पास 55 कैमरे नहीं हैं. केवल एक कैमरा है. उसी एक कैमरे से उनकी रिपोर्ट जो बात बता रही है वो आप 55 कैमरे से नहीं जान सकते. प्रधानमंत्री ने देश की ग़रीब जनता के लिए मुफ्त अनाज की योजना लांच की है. उस योजना में भी भाई लोगों ने फर्ज़ी एंट्री कर कथित रूप से घोटाला कर लिया है. FIR में निकुंज शर्मा का नाम आया है और जांच हो रही है.

एक कैमरे से जो वास्तविकता आपके सामने रखी जा सकती है उसे आप 55 कैमरे लगाकर भी छिपा नहीं सकते. महंगाई के कारण भारत की जनता हर दिन गरीब होती जा रही है. उसकी बचत कम होती जा रही है. यह सब कुछ 55 कैमरों की नज़र से दूर घट रहा है लेकिन उन्हीं कैमरों के सामने बैठे लोगों के बीच घट रहा है. उम्मीद है कि सब कुछ दिखाई दे रहा होगा.

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गंगा में डुबकी लगाने का सीधा प्रसारण होता रहे, महंगाई में डूबे लोगों की हालत का प्रसारण ही न हो यह बात प्रसारित की जानी चाहिए जो कि हमने की है.