विज्ञापन
This Article is From Nov 26, 2014

पहला दिन...

Ravish Kumar
  • Blogs,
  • Updated:
    नवंबर 26, 2014 11:40 am IST
    • Published On नवंबर 26, 2014 11:35 am IST
    • Last Updated On नवंबर 26, 2014 11:40 am IST

"पापा यार, एकदम तुम्हारे जैसा कपड़ा है..." कॉलर वाली कमीज़ पहनते ही छुटंकी थोड़ी खुश हो गई। मुश्किल से फुल बांह वाली कमीज़ का बटन लग सका। कपड़ा नया था और सख़्त भी। सरिता ने किसी तरह तोड़-मरोड़कर सख्ती को ढीला किया, तब जाकर बटन लगा। अब तक वह हमारे खरीदे हुए कपड़ों को पहन रही थी। दादी-नानी, यार-दोस्तों से मिले कपड़े पहन रही थी। उन कपड़ों में तमाम लोगों का दुलार झलकता था। यह किसने दिया है, दादी ने और यह बुआ ने। पापा यार, यह मम्मा ने दिया है। दुकान से लाई है। जूता पापा लाया है। उसके इतने-से जवाब से मन भर जाता था और किसी का दिया हुआ सवारथ हो जाता था, सध जाता था। पांच मिनट के भीतर ऐसे लगा, जैसे उन तमाम पलों पर किसी ने पर्दा डाल दिया हो। ढाई साल में पहली बार वह ऐसे कपड़े पहन रही थी, जिससे कोई भावनात्मक लगाव नहीं था, कोई रिश्ता नहीं था, जो हम नहीं लाए थे। एक लाल रंग के बैग के साथ दो जोड़ी कपड़े आ गए थे। काले रंग का जूता भी। खिलौने की तरह। लग रहा था कि अब डिब्बे से निकलेगा और बिना पांव के ही चलने लगेगा।

धीरे-धीरे छुटंकी भी उन कपड़ों में खुद को अनजान की तरह देखने लगी। उसका उत्साह सहमने लगा। बीच-बीच में नए बने अनमनेपन को भूलकर खुश भी हो जाती थी। "पापा, शर्ट में पैकेट है..." पैकेट नहीं, बेटा पॉकेट है। "पॉकेट है..." शर्ट की जेब में हाथ डालकर लगा कि अब उसके पास भी कुछ भरने के लिए है। ग्रे रंग की पतलून पहनते ही वह पूरी तरह बदल चुकी थी। मेरी छुटंकी आज छुटंकी की तरह क्यों नहीं लग रही थी। बात-बात में कहानी सुना देने की ज़िद कहीं गायब हो चुकी थी। उसकी सरिता दीदी भी वैसे ही हैरान हो रही थी। मेरी स्वीटी कितनी बदल गई है। कैसा तो लग रहा है भइया। छुटंकी अपने इस अजनबीपन से पार पाने के लिए दादी को याद करने लगी। "पापा यार, चल न दादी को लाते हैं।" हां, ठीक है, ले आएंगे। तुम जल्दी से तैयार हो जाओ। तुम्हें अच्छा लग रहा है न। हूं। अच्छा लग रहा है। जवाब इतना हल्का हो गया कि मेरा मन भारी हो गया।

धीरे-धीरे छुटंकी उसी घर के लिए अजनबी हो गई, जो उसका है। शर्ट-पतलून और जूते पहनते ही उसकी स्वाभाविक हरकतें कहीं गुम हो गईं। मैं कोशिश करता रहा कि रोज़ की तरह आज भी मुस्कुरा दे। कुछ शरारत कर दे। सोफे के किनारे को पकड़कर ऐसे खड़ी हो गई, जैसे वह अपने बचपन को छोड़कर जा चुकी हो। एक जोड़ी कपड़े ने उसे इतनी तेज़ी से बदल दिया। उसकी बातों को मैं वीडियो कैमरे से रिकार्ड किए जा रहा था। सरिता और गंगा भी मायूस होने लगीं। घर कितना सूना हो जाएगा। मेरा बच्चा कैसा तो लग रहा है भइया। आहा रे। छुटंकी को भी समझ आ गया था। उसके आसपास की रोज़ की निगाहें कुछ बदली हुई हैं। रोज़ाना का तार आज कुछ टूटा-सा है। वह कभी स्वेटर को खींचने के बहाने रुक जाती, तो कभी पतलून की जेब में हाथ डालने के बहाने।

घर के भीतर किसी और का घर आ गया था। बिल्कुल ही एक नया संस्कार। नया अनुशासन। एक दीवार-सी बनने लगी। उसे अच्छा भी लग रहा था, लेकिन वह उन कपड़ों में अपनापन खोजती दिखी। उसका उछलना-कूदना एक ही झटके में ऐसे बंद हो जाएगा, यकीन नहीं हो रहा था। इसीलिए मुझे वर्दी से चिढ़ है। बच्चा ही नहीं, आदमी भी किसी के जैसा हो जाता है। पहनते ही लगता है कि आपने कपड़े को नहीं, किसी और को पहन लिया है। नारंगी रंग का स्वेटर उसके तमाम रंगों को फीका करने लगा।

लेकिन छुटंकी थोड़ी उस्ताद भी है। जल्दी से दरवाज़े से बाहर आ गई। गोद में उठाया ही था कि सरिता ने टोक दिया। भैया, चलकर जाने दीजिए। कितना तो अच्छा लग रहा है। मटक-मटककर चल रही है। दीदी बाय, मैं जा रही हूं। इतना कहते ही गंगा और सरिता की आंखें भर गईं। लिफ्ट तक पहुंचा तो देखा कि दोनों अब भी दरवाज़े पर हैं। अब मैं भी उन दोनों से इतनी दूरी पर तो था ही कि वे मेरी आंखों को नहीं देख सकती थीं। ऐसे मौकों पर रोकना मुश्किल हो जाता है। झट से छुटंकी को गोदी में उठा लिया। ज़ोर से चिपकू कर लिया।

25 नवंबर, 2014, दिन मंगलवार, मेरी दुलारी दूसरी हो गई। स्कूल चली गई।

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
पहला दिन, स्कूल का पहला दिन, बच्ची का स्कूल में पहला दिन, रवीश कुमार, Ravish Kumar, First Day To School, Daughter Goes To School