यूपी के अस्पतालों में मरीज पस्त, उधर हुक्मरान राजनीति में मस्त

आम ग़रीब लोग कितनी कम सुविधा को विकास मान लेते हैं, खुद मुख्यमंत्री ऐसी जगह पर मलहम पट्टी तक न लगवाएं

24 जून को अमेरिका के फ्लोरिडा में एक इमारत के गिर जाने से 98 लोगों की मौत हो गई. जून से सितंबर आ गया लेकिन अभी तक इस घटना को लेकर अमेरिका के अख़बारों में खोजी पत्रकारिता हो रही है. हर दूसरे दिन कुछ न कुछ रिपोर्ट आती है. पता चलता है कि 100 लोगों के जीवन का क्या महत्व है. इमारत के रख-रखाव में हुई लापरवाही को वहां का समाज और प्रेस कितनी गंभीरता से ले रहा है. 2019 में गुजरात के सूरत में तक्षशिला आर्केड में आग लगने से 22 बच्चे जल कर मर गए थे. उसके बाद क्या हुआ आप खबरों को इंटरनेट में खंगाल कर देखिए. भारत में मार्च और अप्रैल के महीने में ऑक्सीजन के बिना लोग मर गए लेकिन कह दिया गया कि आक्सीजन की कमी से कोई नहीं मरा है. कोरोना की दूसरी लहर के समय अस्पतालों की हालत पर थोड़ी बहुत चर्चा हुई लेकिन उसके बाद चर्चा समाप्त हो गई. अस्पतालों में सुधार के दावे कर लिए गए और मान लिया गया. 2019 में बिहार में चमकी बुखार से 160 से अधिक बच्चे मर गए थे. बिहार के समस्तीपुर के सदर अस्पताल में 10 अगस्त को RT-PCR जांच घर का उदघाटन हुआ. उस दिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने छह जांच केंद्रों का आनलाइन उदघाटन किया लेकिन एक महीने बाद भी समस्तीपुर का जांच केंद्र चालू नहीं हुआ है.

इस शानदार जगह में RT-PCR का बोर्ड वोर्ड टंग गया है. अंदर ज़मीन पर टाइलें लगा दी गई हैं और मशीनें रख दी गई हैं. कुछ उपकरण डब्बे में ही बंद हैं. हमारे सहयोगी हरेश्वर ने बताया कि लैब बंद है. उद्घाटन के बाद इसका दरवाज़ा नहीं खुला है. मुख्यमंत्री ने आदेश दिया है कि बिहार में हर दिन दो लाख टेस्ट होना चाहिए लेकिन यह सेंटर बंद है. जब पूरा काम नहीं हुआ था तब इसका उदघाटन क्यों किया गया है. अस्पताल का बाहर से हाल आप देख रहे होंगे. आम ग़रीब लोग कितनी कम सुविधा को विकास मान लेते हैं. खुद मुख्यमंत्री ऐसी जगह पर मलहम पट्टी तक न लगवाएं. कोरोना के दो साल हो चुके हैं फिर भी समस्तीपुर में RTPCR की जांच का सिस्टम नहीं बन पाया है. यहां से सैंपल पटना एम्स जाता है. जांच के लिए मायक्रो बायोलोजिस्ट की भी नियुक्ति नहीं हुई है. मार्च 2021 की संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट बताती है कि पटना एम्स में फैकल्टी के 305 पद मंज़ूर हैं लेकिन 136 पद ख़ाली हैं. नॉन टीचिंग के 1131 पद खाली हैं. एक वही अस्पताल है जो ठीक से चल रहा है लेकिन उसकी हालत भी खराब है. 

कोरोना की लहर आई तो दुनिया भर में अनगिनत बार कहा गया कि स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करना ही होगा. कोरोना ने बता दिया है कि हमारी स्वास्थ्य सेवाएं कितनी ख़राब हैं लेकिन फिर भी राजनीति की प्राथमिकता में स्वास्थ्य हेल्थ कार्ड से अधिक नहीं है. बिहार में भी वायरल बुखार के कारण अस्तपाल भरे पड़े हैं. अस्पतालों की विश्व स्तरीय सुविधाएं देखने लायक हैं.

वायरल बुखार ने यूपी में भी उत्पात मचाया है. अभी कोरोना की दूसरी लहर में यहां गंगा के किनारे लाशों को दफनाने और कफन तक हटा देने की खबरों के बीच ऐसे भी बयान आए कि स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार किया गया है. वो सुधार भी बुख़ार की भेंट चढ़ गया है.

कई तस्वीरें यूपी के अलग-अलग अख़बारों में छपी हैं. बदहवास भाग रहे मां-बाप की तस्वीरें बता रही हैं कि यूपी की जनता के भीतर ही जनता के लिए कोई सहानुभूति नहीं बची है. हर मामूली बीमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल रही है लेकिन रस आ रहा है सांप्रदायिक बयानों में. जिस राज्य की आधी से अधिक आबादी दो वक्त के राशन के लिए प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण योजना पर निर्भर है उसे अब्बाजान का चूरन दिया जा रहा है. 
हमारे सहयोगी कमाल ख़ान की एक रिपोर्ट बहुत पुरानी नहीं है. कुछ दिनों पहले की है. दिन तो कई गुज़र गए लेकिन अस्पतालों को लेकर छपने वाली हेडलाइन बता रही है कि इलाज न मिलने के कारण बच्चे कैसे मर रहे हैं. 9 सितंबर के हिन्दी अखबारों में फिरोज़ाबाद से ही खबर छपी है कि स्ट्रेचर नहीं मिला तो पिता कंधे पर लाया बेटे का शव. अस्पतालों में स्ट्रेचर तक नही है. वायरल का प्रकोप कोरोना की तरह भयानक नहीं है फिर भी इसके इंतज़ाम का ये हाल है और कोई बात नहीं कर रहा है. बच्चों की जान की जगह अब्बाजान की बात हो रही है ताकि हिन्दू मुस्लिम नेशनल सिलेबस लांच हो जाए और घर घर में इसी की चर्चा होने लगे. यह प्रदेश राजनीति का मुर्दाजान बन चुका है. ग़रीब मां बाप अपने बच्चों की मौत पर सर पटक कर रोने के लिए मजबूर हैं. 

अखबार हमेशा पुराना पढ़ा कीजिए. पिछले साल बरेली, आगरा, फिरोज़ाबाद में वायरल फैलने की खबरें छपी हैं. तुलना करने पर ही पता चलेगा कि 2019 से लेकर अब तक स्वास्थ्य व्यवस्था में क्या सुधार हुआ है. यूपी के स्वास्थ्य मंत्री जय प्रताप सिंह लंबे समय से पद पर हैं. हमने उनके ट्वीटर हैंडल को खंगाला इस उम्मीद में कि वायरल बुखार को लेकर कई सारी जानकारियां होंगी. अगस्त से लेकर आज तक डेंगू बुखार पर स्वास्थ्य मंत्री का एक भी ट्वीट नहीं मिला. वे अपने जन्मदिन पर ट्वीट करते हैं. मुख्यमंत्री योगी की रैलियों का ट्वीट करते हैं. अपनी विधानसभा में जो राहत कार्य किया है उसके बारे में ट्वीट करते हैं और प्रधानंमत्री के ट्वीट को री-ट्वीट करना नहीं भूलते हैं. यह भी हो सकता है मंत्री जी दिन रात काम कर रहे हों लेकिन उन्हें ट्विटर पर अपने काम का प्रदर्शन करना ठीक नहीं लगता हो. 

आयुष्मान भारत की वेबसाइट पर डेटा दिया गया है कि यूपी के फिरोज़ाबाद में 108 हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर हैं. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ इस एक ज़िले में 100 से अधिक लोगों की मौत हो गई है जिसमें ज्यादातर बच्चे हैं. हमारे सहयोगी सौरव शुक्ला फिरोज़ाबाद में हैं. सौरव की आंखों के सामने ही पांच साल की एक बच्ची की मौत हो गई. उसके माता पिता भर्ती कराने के लिए चिल्लाते रह गए.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ के कई बयान मिलेंगे कि यूपी में इतने नए मेडिकल कालेज खोले जाएंगे. उन बयानों में यह सब डिटेल नहीं होता है कि डाक्टर कितने नियुक्त हैं, रोगों के विशेषज्ञ कितने हैं. मेडिकल कालेजों की संख्या ही बताई जाती है.

एक खबर अप्रैल 2017 की है. अमर उजाला ने लिखा है कि योगी सरकार ने यूपी में 6 नए एम्स और 25 नए मेडिकल कालेज बनवाने का काम शुरू कर दिया है. क्या आप बता सकते हैं कि 6 नए एम्स कौन कौन से हैं. क्या ये बयान हेडलाइन के लिए ही था. गोरखपुर और रायबरेली एम्स का तो पता चलता है लेकिन बाकी चार कहां गए. इसमें से भी रायबरेली एम्स को 2009 में मंज़ूरी मिली थी और गोरखपुर एम्स को 2016 में मंज़ूरी मिली थी. इसके दो साल बाद सितंबर 2019 में नवभारत में ख़बर छपी है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि राज्य में 2020 तक 15 नए मेडिकल कॉलेज खोले जाने की योजना बनाई जा रही है. सीएम योगी ने कहा कि उनकी सरकार के शासनकाल में एक दर्जन से ज्यादा नए मेडिकल कॉलेज और दो एम्स का निर्माण कार्य आगे बढ़ा है. यहां मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि दो एम्स के निर्माण का काम बढ़ा है लेकिन छह एम्स वाली बात गायब है जो 2017 की खबर में कही गई थी. 25 जुलाई 2021 के हिन्दुस्तान टाइम्स में बयान छपा है कि जल्दी ही यूपी के सभी 75 ज़िलों में मेडिकल कालेज होगा. ये सब बयान है. जुलाई 2021 के हिन्दुस्तान में खबर छपी है कि यूपी में 2016 से 2020 के बीच 32 नए मेडिकल कालेज खोलने की स्वीकृति मिली है इसमें से आठ मेडिकल कालेज चालू हो पाएं हैं यानी मेडिकल कालेज खोलने की संख्या 25 से होती हुई 30 होती है और 75 होती है लेकिन चालू हैं आठ. ये सब इनकी खबरों के आधार पर कह रहा हूं. 

जुलाई महीने में प्रधानमंत्री मोदी ने भी कह दिया कि यूपी में 2017 तक 12 मेडिकल कालेज ही थे. स्क्रोल वेबसाइट ने इस पर फैक्ट चेक किया है. 22 जुलाई 2016 को लोकसभा में स्वास्थ्य राज्यमंत्री ने एक रिपोर्ट पेश की थी. फगन सिंह कुलस्ते मंत्री थे. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 2016 तक यूपी में 38 मेडिकल कालेज थे. फिर ये बार बार 12 मेडिकल कालेज की संख्या कहां से आ रही है. लोकसभा में सरकार का जवाब और प्रधानमंत्री का बयान अलग क्यों है. 

2016 में प्रधानमंत्री के ही मंत्री लोक सभा में बता रहे हैं कि यूपी में 38 मेडिकल कालेज हैं तो फिर प्रधानमंत्री 12 कहां से बता रहे हैं. CAG ने 2018 में यूपी का health audit किया था. इसमें लिखा है कि 11 ज़िला अस्पतालों को चेक किया गया है. सिर्फ लखनऊ और गोरखपुर के ज़िला अस्पताल में ICU सेवाएं उपलब्ध थीं. इसका मतलब यह हुआ कि 9 ज़िला अस्पतालों में ICU नहीं था. इसमें इलाहबाद, आगरा, सहारनपुर, बलरामपुर, बदायूं, बांदा जैसे बड़े शहर शामिल हैं. बिना ICU के आप किसी इमारत को अस्पताल कह सकते हैं. यह सवाल थोड़ा मुश्किल है. अब्बाजान और बाबूजी से पूछ कर बताइएगा. वैसे यूपी में डैड डैडी भी होते होंगे उनसे भी पूछ सकते हैं. उनको न मालूम हो तो प्राइम टाइम देख सकते हैं.

CAG ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि Indian Public Health Standard के अनुसार
अस्पताल में जितने बेड हैं उसका 5 से 10 प्रतिशत बेड ICU होना चाहिए. CAG ने पाया कि लखनऊ में केवल दो प्रतिशत और गोरखपुर ज़िला अस्पताल में तीन प्रतिशत बेड ही ICU थे. यानी कम थे. इन दो अस्पतालों के ICU में वेंटिलेटर नहीं था, इंफ्यूज़न पंप, अल्ट्रा साउंड नहीं था. बेहतर इलाज के लिए ज़रूरी है कि हर बेड के साथ एक नर्स हो लेकिन लखनऊ ज़िला अस्पताल में एक नर्स पर छह से से सात बेड पाए गए. 

2018 के बाद से क्या इस समय ज़िला अस्पतालों में हालात सुधर गए हैं? CAG की अगली रिपोर्ट का इंतज़ार करना होगा.अस्पताल और कालेज बने हैं या नहीं बने हैं, बने हैं तो उनकी क्वालिटी कैसी है इसे लेकर यूपी को चिन्ता करनी चाहिए. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का एक बयान यूपी की अलग ही प्राथमिकता तय कर रहा है. प्रधानमंत्री मोदी आज तक नहीं बता सके कि तालिबान आतंकवादी है या क्या है. कम से कम यही बता दें कि योगी जी का अब्बाजान कहना सांप्रदायिक है या नहीं. आए दिन ऐसे बयानों के ज़रिए गोदी मीडिया को खुराक दिया जा रहा है. ताकि हिन्दू मुस्लिम नेशनल सिलेबस की विधिवत चर्चा होती रहे.

इस देश में अस्सी करोड़ लोग मुफ्त अनाज पर आश्रित हैं. उनकी क्षमता इतनी नहीं है कि दो वक्त का अनाज खरीद कर खा लें. 80 करोड़ ये गरीब बता रहे हैं कि हमारी आर्थिक तरक्की अधूरी रह गई है. उसने लोगों को गरीब बनाया है. उन तक अनाज का पहुंचना सरकार की कुशलता नहीं बल्कि उसकी आर्थिक नीतियों की असफलता है. राजनीति ने कितनी चालाकी से मुश्किल से मिल रहे दो वक्त के अनाज का बंटवारा हिन्दू मुस्लिम तर्ज कर कर दिया. फिर लोग बताएं कि दो सौ रुपये सरसों तेल क्यों हुआ है. क्या कोई अब्बाजान तेल पी जाते हैं. 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अब्बाजान वाले बयान ने सबको आहत किया है. इस तरह के बयानों से एक समुदाय टारगेट होता है. समाज में दिल दुखाने वाला यह बयान देकर किसे खुश किया जा रहा है. जिसे खुश होना चाहिए वो तो अस्पतालो के बाहर मारा मारा फिर रहा है. उसके बच्चे मर जा रहे हैं और अस्पताल में भर्ती नहीं करा पा रहा है. क्या एक मुख्यमंत्री को इस तरह का बयान देना चाहिए? हर किसी के अब्बाजान उसकी जान होते हैं. एक समुदाय को लगातार अपमानित करने की राजनीति वाले प्रदेश के लोगों को सोचना चाहिए कि इससे क्या मिला. यूपी में पांच साल से योगी जी मुख्यमंत्री हैं. कम से कम एक श्वेत पत्र ही पेश कर देते कि कौन से अब्बाजान हैं जो राशन खा जाते थे और तस्करी करते थे. कितना राशन बांग्लादेश और नेपाल जाता था. बांग्लादेश टेक्सटाइल के क्षेत्र में भारत से कहीं आगे निकल गया है, उससे होड़ करने के लिए सरकार को दस हज़ार करोड़ का पैकेज जारी करना पड़ा है. वह बांग्लादेश कब से राशन के अनाज की तस्करी से अपना काम चलाने लगा. 

रविवार को इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक विज्ञापन को लेकर चर्चा होती रही कि यूपी के विज्ञापन में कोलकाता के फ्लाईओवर और पांच सितारा होटल की तस्वीर लग गई है. अखबार ने अपने मार्केटिंग विभाग की गलती की बात कही है लेकिन क्या अब इस तरह के विज्ञापन अखबार अपने स्तर पर तैयार करने लगे हैं या सरकारी विभाग की तरफ नियुक्त विज्ञापन एजेंसी बना कर भेजती है. क्या अखबार सरकार का जनसंपर्क विभाग बन गया है? पारदर्शिता के इस तथाकथित युग में आप इतनी बुनियादी बात नहीं जान पाते हैं कि इस विज्ञापन के पीछे किसकी जवाबदेही है. यह पहला मौका नहीं है. एक बार गृह मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट में भारत पाकिस्तान सीमा की जगह मोरक्को और स्पेन की तस्वीर छप गई थी. PIB ने प्रधानमंत्री मोदी के चेन्नई दौरे की तस्वीर को फोटो शाप कर दिया था. छत्तीसगढ़ में रमन सिंह सरकार के एक मंत्री ने वियतनाम के पुल की तस्वीर को राज्य के विकास की तस्वीर के रूप में पेश कर दिया था. कुछ लोगों को पता चल गया है कि झूठ से बड़ा सच कुछ नहीं है.  


अब आते हैं पेगासस कांड पर. पेगा जासूस के पीछे मेगा जासूस कौन है. क्या केंद्र सरकार यह मानती हुई लग रही है कि जासूसी के लिए किसी साफ्टवेयर का इस्तेमाल हुआ है. आज तुषार मेहता ने कहा कि हम हलफनामे के जरिए ये जानकारी सार्वजनिक नहीं कर सकते. अगर मैं कहूं कि मैं किसी विशेष सॉफ्टवेयर का उपयोग नहीं कर रहा हूं या इसका उपयोग नहीं कर रहा हूं तो यह आतंकवादी तत्वों को तकनीक का काट लाने का मौका देगा. सरकार ने पिछली सुनवाई में कहा कि हलफनामा देंगे लेकिन आज कहा कि हलफमाना नहीं देंगे. कोर्ट और याचिकाकर्ताओं ने साफ किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी बारीकियों की जानकारी नहीं चाहिए. उन्हें जानना है कि क्या जासूसी हुई, क्या नागरिकों के अधिकार का उल्लंघन हुआ. हलफनामा देने से इंकार करने पर अदालत नाराज़ हो गई और चीफ जस्टिस ने कहा कि सरकार बार बार घूमकर वहीं पहुंच जा रही है. कोर्ट उन दावों से चिंतित है कि लोगों के फोन हैक किए गए थे. अगर सरकार अपना रुख़ साफ नहीं करेगी तो अदालत के पास आदेश जारी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा. 

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विपक्ष के नेताओं को नोटिस भेजने के मामले में ED का जवाब नहीं है. आज इस विभाग ने आम आदमी पार्टी के नेता को नोटिस भेजा है. मुख्यमंत्री केजरीवाल ने कहा है कि पिछले सात साल में एक बीजेपी नेता का नाम बताएं जिसके खिलाफ ED ने नोटिस भेजा हो. ED को नाम बताना चाहिए.