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This Article is From May 15, 2015

राज्यसभा के अरुण जेटली का राज्यसभा पर ही सवाल

Ravish Kumar
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  • Updated:
    मई 15, 2015 14:15 pm IST
    • Published On मई 15, 2015 13:37 pm IST
    • Last Updated On मई 15, 2015 14:15 pm IST
राज्यसभा को लेकर वित्तमंत्री अरुण जेटली ने एक गंभीर सवाल उठा दिया है। बजट सत्र की समाप्ति पर उन्होंने पत्रकारों से कहा कि मैं यह समझ सकता हूं कि दो सदनों की व्यवस्था में कभी-कभार अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सदन प्रत्यक्ष से चुने गए सदन के विवेक पर सवाल उठा सकता है। यह कभी-कभार हो सकता है, लेकिन बिल दर बिल नहीं, सत्र दर सत्र नहीं हो सकता। संसदीय लोकतंत्र में यह एक गंभीर सवाल है कि क्या बिल दर बिल निर्वाचित सदन के फ़ैसले को अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सदन चुनौती दे सकता है।

मुझे जेटली के इस सवाल पर हैरानी नहीं हुई। संविधान सभा में भी इस मसले पर खूब बहस हो चुकी है, लेकिन पहले उनकी बेचैनी को समझना चाहिए। शुरू से ही मोदी सरकार राज्यसभा में बहुमत न होने को लेकर रेखांकित करती रही है। हाल ही में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि राज्यसभा में बहुमत नहीं है इसलिए राम मंदिर के लिए कानून नहीं बना सकते। बीजेपी की तो यही लाइन है कि राम मंदिर के मामले में कोर्ट का फैसला ही अंतिम होगा। अचानक राम मंदिर के राज्यसभा में बहुमत की बात कहां से आ गई। वैसे अगर सरकार चाहे तो भूमि अधिग्रहण बिल की तरह राम मंदिर के लिए भी राज्यसभा और लोकसभा की साझा बैठक बुलाकर राम मंदिर के संबंधित किसी अज्ञात विधेयक को पास कर सकती है।

अरुण जेटली ने एक गंभीर मुद्दा तो उछाला है। पर उनसे कुछ सवाल पूछे जाने चाहिए। कभी-कभार लोकसभा के विवेक पर सवाल उठाने की छूट से उनका आशय क्या है। क्या वे राज्यसभा की भूमिका को सीमित करने की बात कर रहे हैं। फिर वे सीधे क्यों नहीं कहते कि राज्यसभा ही नहीं होना चाहिए, जिसके वे सदस्य हैं। संविधान सभा में जो बहस हुई उसका मूल ही था कि सेकेंड चेंबर नहीं होना चाहिए इससे कानून बनाने की गति धीमी होगी।

अगर जेटली यह कहते हैं कि सत्र दर सत्र या बिल दर बिल राज्यसभा लोकसभा के विवेक पर सवाल न करें तो वह क्या करें। उसके सदस्य क्या करें। क्या वे खुद ऐसे सदन का सदस्य होना चाहेंगे, जिसकी कोई सक्रिय भूमिका न हो। क्या वे मानते हैं कि विपक्ष में रहते हुए उन्होंने राज्यसभा में लोकसभा के विवेक पर बेवजह सवाल खड़े किए। क्या वे मेरिट पर सवाल करते थे या लोकसभा के फैसलों को राजनीतिक कारणों से रोका करते थे। यही राय अगर एक साल पहले यूपीए के किसी नेता ने कही होती तो बीजेपी या जेटली की क्या राय होती। क्या वे इस गंभीर बहस में शामिल होते या तब की सरकार को संविधान विरोधी, लोकतंत्र विरोधी ठहराते।

यह सही है कि उच्च सदन भी अब निम्न सदन यानी लोकसभा की तरह राजनीतिक कारणों से काम करने लगा है। वहां भी विवेक का पैमाना राजनीतिक कारण ही है। पर इस स्थिति में लाने में तो सबकी बराबर भूमिका है। यहां तो साठ साल वाला तर्क नहीं चलेगा। राज्यसभा गार्जियन की भूमिका नहीं निभा रही है। अगर जेटली राज्यसभा या राज्यों में विधान परिषदों की समाप्ति को लेकर बहस ही करना चाहते हैं, किसी फैसले पर पहुंचना चाहते हैं तो संविधान सभा की बहस से उन्हें काफी कुछ सहारा मिल सकता है, लेकिन उन्हें बताना तो चाहिए कि जिस राज्यसभा में वे खुद कई कानूनों का विरोध करते रहे हैं उसी सदन में उनके कानून का विरोध होने पर धीरज क्यों जवाब दे रहा है।

राज्यसभा राज्यों की प्रतिनिधि संस्था है। मंत्रिपरिषद राज्यसभा के प्रति ज़िम्मेदार नहीं होता है। अगर राज्यसभा में सरकार का बहुमत नहीं है तब सरकार पर सदन का नियंत्रण ज़रूर हो जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि अरुण जेटली को यही महसूस हो रहा है। फिर भी पर्याप्त प्रावधान हैं कि अगर दोनों सदनों में टकराव की नौबत आ गई तो संयुक्त अधिवेशन बुलाया जा सकता है। ऐसा तीन बार हो चुका है, लेकिन संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि यह दस बार नहीं हो सकता है।

अब आते हैं संविधान सभा में सेकेंड चेंबर यानी राज्यसभा या विधान परिषद को लेकर हुई बहस पर। पर एक सावधानी बरतियेगा। अक्सर नेता अपने हिसाब से संविधान सभा की बहस की असहमति और सहमति का हवाला दे देते हैं। बहस के दौरान जताई गई असहमति को आप फैसले के ऊपर नहीं रख सकते क्योंकि वो फैसला मतदान या सर्वसम्मति से हुआ होता है। कई राजनेता ऐसा करते हैं पर ज़िम्मेदार नागरिक को ऐसा नहीं करना चाहिए।

6 जनवरी 1949 भी गुरुवार का दिन था और 13 मई 2015 भी गुरुवार जब अरुण जेटली ने राज्यसभा के विवेकाधिकार पर सवाल उठाए। इंटरनेट की दुनिया में ऐसे संयोगों की खूब पूछ होती है इसलिए लिख दिया वर्ना इसका बहस से कोई लेना-देना नहीं है। संविधान सभा के सामने सवाल था कि क्या राज्यों में विधान परिषद होनी चाहिए।


पश्चिम बंगाल की रेनुका रे विधान परिषद और दोहरे सदन की अवधारणा के ही खिलाफ थीं। उनका कहना था कि अगर उच्च सदन को यही परीक्षण करना है कि कानून जल्दबाज़ी में तो नहीं बना है तो इसके लिए राज्यपाल और राष्ट्रपति को पर्याप्त अधिकार है कि वे सदन से बिल पर दोबारा विचार करने के लिए आग्रह कर सकते हैं। दूसरे सदन से कानून बनाने की गति धीमी हो जाएगी जबकि भारत को आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में तेज़ी से कानून बनाने की ज़रूरत है। इसलिए हमें अभी ही तय कर लेना चाहिए कि संविधान में दूसरे सदन की व्यवस्था ही न हो। इससे कोई लाभ नहीं है।

एक और सदस्य ओ वी अलगेसन विरोध करते हुए कहते हैं कि सरदार वल्लभ भाई पटेल ने भी प्रांतीय संविधान कमेटी की रिपोर्ट पेश करते हुए कहा है कि एक ही सदन होना चाहिए। मेरा तो मानना है कि यह कुछ और नहीं बल्कि नेताओं के लिए वृद्धावस्था पेंशन है। अजीब संयोग है जो राय 1949 में थी वही राय आज भी सुनने को मिल जाती है। राज्य सभा तो रिटायर लोग ही जाते हैं। लेकिन हम कैसे मान लें कि अरुण जेटली रिटायर राजनेता है, जो पेंशन के लिए वहां हैं !

इस बहस के जवाब में डाक्टर बी आर अंबेडकर कहते हैं कि सेकेंड चेंबर के पक्ष में मेरी कोई ठोस राय नहीं है। कई मामलों में यह बेहतर भी हो सकता है। यह बहस फ्रांस की संविधान सभा के समय से चल रही है। अंबेडकर किसी आबे सैये के एक कथन का हवाला देते हैं कि अगर उच्च सदन निम्न सदन( लोकसभा) से सहमत हो जाए तो यह व्यर्थ ही है लेकिन अगर सहमत न हो तो बेकार ही है। आप पाठक इस चुटकी को समझ गए होंगे। लेकिन डाक्टर अंबेडकर कहते हैं कि फ्रेंच संविधान सभा ने इस राय को कभी स्वीकार नहीं किया। वहां भी सेकेंड चेंबर है। यह ज़रूर है कि संविधान में सेकेंड चेंबर की व्यवस्था तो है मगर प्रयोग के तौर है। इसीलिए हमने संविधान के मसौदे में सेकेंड चेंबर को स्थायी नहीं माना है। इसे समाप्त करने का प्रावधान भी दिया है। फिलहाल समझौते के तौर पर इसे संविधान में स्वीकार कर लिया जाना चाहिए।

अगर हम संविधान सभा की बहसों का यहां वहां से ज़िक्र करने की जल्दबाज़ी ने करें तो इस पर विचार करना चाहिए कि राज्य सभा की भूमिका पर सवाल क्यों उठाया गया। लोकसभा में भी कई सरकारों ने बिना बहुमत के काम किया है। बहुमत न होने का रोना भी रोया है, लेकिन किसी ने नहीं कहा कि बहुमत भले न हो मगर जो सरकार में है उनके विवेक पर सदन को कभी-कभार ही सवाल करना चाहिए। सत्र दर सत्र नहीं करना चाहिए। यह भी कहां लिखा है कि लोकसभा का विवेक ही अंतिम है या होना चाहिए। कानून को लेकर न्यायपालिका से भी तो टकराव हो सकता है। फिर चुनाव के बाद जनता अपने विवेक को लोकसभा के भरोसे छोड़ देगी।

यह साफ नहीं है कि जेटली राज्यसभा का मूल्यांकन किस तरह से करते हैं। क्या उन्हें बहुमत का एकाधिकार चाहिए या फिर वे असहमतियों को जगह न देने की वकालत कर रहे हैं। एक तरफ जहां प्रधानमंत्री संघवाद की वकालत करते रहते हैं दूसरी तरफ उनके वित्तमंत्री राज्यों की प्रतिनिधि संस्था राज्यसभा पर सवाल कर रहे हैं।

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